किसमें होगी स्वामी प्रसाद मौर्य की एंट्री- सपा या भाजपा?

जीत की ढ़ेर सारी कयासों के बीच बहुजन समाजवादी पार्टी खेमे को स्वामी प्रसाद मौर्या के रूप में एक बड़ा झटका लगा है। हालांकि सुप्रीमों मायावती इस मुद्दे को अलग ही रंग देने में जुट गई हैं। जी हां परिवारवाद का रंग। जिसकी वजह है विधानसभा चुनावों का करीब होना। क्योंकि मायावती नहीं चाहती हैं कि चुनाव के बेहद करीब आकर उनके तमाम जीत के दंभ भरने वाले आंकड़ों पर पानी फिर जाए। हालांकि अब सोशल मीडिया पर अनुमान का दौर शुरू हो गया है।

मायावती पर बरसी सपा, बोली जनता के पैसों से बढायी अपनी माया

Swami Prasad Maurya to connect with BJP and Samajwadi Party

कोई स्वामी को सपा के पाले में जोड़कर देख रहा है तो कोई भाजपा के साथ रखकर चुनावी लिहाज से नफा या नुकसान झांकने की कोशिश कर रहा है। लेकिन सब कुछ बाया कल्पनाओं से ही है। बहरहाल इस मामले में हमने हकीकत को सियासी पार्टियों के जहन से खोजकर आपके बीच लाने का प्रयास किया।

सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी से वन इंडिया की बातचीत

स्वामी प्रसाद मौर्या जी नेता जी के करीबी रहे हैं। और राजनीति में किसी भी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। ''राजनीति में किसी भी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता'' इस बात से साफ है कि समाजवादी पार्टी बाहें पसारकर स्वामी प्रसाद मौर्या का स्वागत करने मेें जुटी है।

केशव प्रसाद मौर्या से वन इंडिया की बातचीत

BJP यूपी प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या ने वन इंडिया के द्वारा पूछे गए सवाल कि सोशल मीडिया पर लोग स्टेटस अपलोड कर रहे हैं कि स्वामी भाजपा का दामन थाम सकते हैं, इसकी क्या संभावनाएं हैं। जिस पर जवाब देते हुए भाजपा की ओर से प्रदेश अध्यक्ष केशव ने कहा कि इस तरह के स्टेटस तो सपा के लिए भी अपलोड हो रहे हैं। जब आएंगे तो देखा जाएगा।

सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव के करीबी रहे स्वामी का पलायन की मजबूत संभावनाएं फिलवक्त सपा की ओर ही दिख रही हैं। यदि इन संभावनाओं की तर्ज पर सब कुछ होता है तो इसमें कोई दोराय नहीं कि बीजेपी के लिए यह चिंताजनक बात है। सूत्रों की मानें तो बीजेपी भी स्वामी को अपने खेमे में लाने के लिए शायद ही कोई कोरकसर छोड़े। हां मामला शर्तों पर निर्भर करेगा। कहने का आशय यह है कि जहां ज्यादा शर्तें मानी जाएंगी वहां स्वामी का पलायन होगा। वहीं विश्लेषकों का यह भी कहना है कि 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले जो फेरबदल हो रही है वह मुकाबला त्रिकोणीय नहीं बल्कि महज दो पार्टियों के बीच ही सीमित करता जा रहा है।

स्वामी प्रसाद मौर्या ने पार्टी छोड़ने से पहले कहा कि "मै बडे़ ही भारी मन से पार्टी छोड़ रहा हूं। पार्टी अध्यक्ष मायावती पैसे लेकर विधानसभा चुनाव में टिकट बेच रहीं हैं। उन्होंने अंबेडकर के सपनों को भी बेच दिया।" इस बयान का विधानसभा चुनावों पर असर दिखना तय है। लेकिन किस तरह से और क्या ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

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