उत्तर प्रदेश में अब मलिन बस्तियों में नहीं जन्मेंगे बच्चे
लखनऊ (सुयश मिश्रा)। अब शायद मलिन बस्तियों में कभी किसी बच्चे का जन्म न हो। पैदा होते ही बच्चे के रोने की आवाज़ शायद अब मलिन बस्तियों में नहीं सुनायी देगी। क्योंकि मलिन बस्तियों में तैनात आशा बहुएं गर्भवती महिला को अस्पताल तक ले जाने का काम करेंगी। जी हां! क्योंकि अब सरकार की नई योजना के तहत शहरों में भी आशा बहुओं की तैनाती होगी। शहरी क्षेत्रों की मलिन बस्तियों में 6800 आशा बहुओं की भर्ती की जाएगी।
पढ़ें- वायु प्रदूषण देश के लिए कैंसर...रोका नहीं तो हो जायेगा जानलेवा

यह आशाएं नेशनल हेल्थ मिशन की योजनाओं को शहरी मलिन बस्तियों तक ले जाएंगी। जिससे उन्हें लाभ मिलेगा। हर योजना के लिए तय मानदेय के तहत आशा बहुओं को प्रतिमाह 4 हजार रुपए बतौर मानदेय दिया जाएगा। सभी जिलों के मुख्य चिकित्साधिकारियों को आशा बहुओं के चयन के लिए तय की गई कमेटियों का गठन करने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रमुख सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अरविन्द कुमार ने शहरी आशाओं के लिए नई गाइडलाइन जारी कर दी है। तकरीबन 200 से 500 घरों के बीच एक आशा बहू को तैनात किया जायेगा।
क्या होगी आशाओं की योग्यता?
आशाओं की योग्यता कम से कम इण्टरमीडिएट होगी। स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ दंपत्तियों को शिक्षित करने में लगीं महिलाओं को आशा बहू के रूप में सीधी तैनाती दी जाएगी। जिला मुख्य चिकित्साधिकारी की अध्यक्षता में गठित चयन समिति इनकी सीधी भरती करेगी करेगी।
प्रसूताओं की देखभाल के साथ अस्पताल ले जाने का जिम्मा
मलिन बस्तियों में मातृ और 1 साल की उम्र के शिशु की देखभाल करने की जिम्मेदारी आशा बहुओं पर होगी। ये प्रसूता को सरकारी अस्पताल तक लाएंगी और प्रसव के बाद मां और शिशु दोनों को घर पहुंचाएंगी।
आशाओं को मिलेगी 102 की सेवा
इन आशाओं को 102 एम्बुलेंस सेवा का लाभ मिलेगा। इससे वह प्रसूताओं को घर से अस्पताल तक लाने व पुन: घर पहुंचाने में कोई परेशानी नहीं होगी। आशाओं को इस कार्य के लिए 600 रुपए मानदेय के रूप में दिया जायेगा।












Click it and Unblock the Notifications