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कॉफी हाउस: कभी बहस बिना अधूरा था हर प्याला

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अवध की शाम हमेशा से लोगों के दिल को लुभाती आई है। इसीलिए इस शहर की खासियत के बारे में 'शाम-ए-अवध' जैसे अल्फाज कहे गए हैं। लेकिन अवध की शाम और उससे जुड़ी खास जगहों पर अब आधुनिकता की झलक साफ देखने को मिल रही है, इनमें से कुछ तो आधुनिकता के थपेड़ों में खो गई हैं, या फिर उनका पुराना चर्चित मिजाज ही बदल गया है।

लखनऊ की धड़कन कहे जाने वाले हजरतगंज में स्थित इंडियन कॉफी हाउस की रंगीन शाम कभी लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय थी। नजारा कुछ ऐसा रहता था, मानो हर शाम दिवाली हो। इस जगह पर बैठना और कॉफी पीना लोग अपनी शान समझते थे।

इतिहास के पन्नों से

कॉफी हाउस के इतिहास के पन्ने खंगाले तो सामने आता है कि इसकी नींव सन् 1936 में पड़ी। सन् 1936 से 1957 तक इंडियन कॉफी हाउस का प्रबंध कॉफी बोर्ड के नियत्रंण में था। सन् 1957 में ही कॉफी बोर्ड ने इस योजनाओं में कुछ नयापन दिखाने का प्रयत्न शुरू कर दिया था, जिसके तहत 1956 में ही कॉफी हाउस को बंद कर दिया गया।

इतना ही नहीं, सितंबर 1957 से अक्टूबर 1958 तक कॉफी बोर्ड द्वारा संचालित 41 कॉफी हाउस भी बंद करा दिए गए, जिससे एक साथ 835 मजदूर बेरोजगार हो गए। इस समस्या का समाधान शीघ्र करने के लिए 11 प्राथमिक समितियों का गठन किया गया, जिसका नाम इंडियन कॉफी वर्क्‍स को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड रखा गया।

इस सोसाइटी में लखनऊ का कॉफी हाउस भी सम्मिलित था। साथ ही ऑल इंडिया कॉफी वर्क्‍स को-ऑपरेटिव सोसाइटी फेडरेशन के सदस्य भी शामिल थे। एक वक्त था, जब कॉफी हाउस में प्रतिष्ठित चित्रकार, राजनैतिक लेखक ही ज्यादातर आया करते थे।

विधानसभा भवन से नजदीक होने के कारण ज्यादातर प्रमुख नेता यहीं आकर गंभीर से गंभीर मुद्दों पर बातचीत करते थे। डॉ. राम मनोहर लोहिया, राज नारायण, फिरोज गांधी, पूर्व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीज एवं पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर समेत अनेक हस्तियों ने अपना ज्यादातर वक्त इसी कॉफी हाउस में गुजारा है।

पल-पल बदलती राजनीति

कहा जाए तो लखनऊ के कॉफी हाउस ने पल-पल बदलती राजनीति को बड़े करीब से देखा है। आज कॉफी हाउस भले ही अपनी पुरानी पहचान खो गया हो और इसका नजारा शहर के दूसरे रेस्टोरेंट की तरह हो गया हो, जो इतिहास से सरोकार रखते नजर नहीं आते, लेकिन यही कॉफी हाउस 1958 के समय लखनऊ में अपनी एक अनोखी पहचान रखता था।

यहां के बटलरो का पहनावा व अंदाज ने लोगों को काफी आकर्षित करता था। ऐसे में 1964 से 1965 में पटना व गोरखपुर में इसकी दो शाखाएं भी शुरू की गईं, लेकिन यह इसकी सफलता कि अंतिम सीढ़ी थी।

सन् 1969 से 1970 तथा 1976 से 1981 तक ऑल इंडिया कॉफी फेडरेशन फैलाया गया, लेकिन 1996 तथा1998 तक आते-2 कॉफी हाउस की स्थिति गिरती गई। पानी व बिजली का कनेक्शन ही काट दिया गया, जिस कारण ग्राहकों का भी आना-जाना कम हो गया।

फिर से अपनी जिंदगी में नई सांसें भरते हुए मई 2000 में कॉफी हाउस दोबारा खुला, लेकिन बीच में कई बार विवादों के कारण भी सुर्खियों में आया। वहीं अब यहां पहले वाली बात नजर नहीं आती। शहर के नए चमचमाते होटलों, रेस्टोरेंटों की तरह इसका मिजाज भी बदल चुका है।

कॉफी में सियासत

अब यहां कॉफी की चुस्कियों के साथ सियासत की गरमा-गरम बहस नहीं होती और सियासतदान यहां झांकना तक पसंद नहीं करते, बल्कि दूसरे रेस्टोरेंट की तरह यहां भी व्यावसायिकता साफ नजर आती है।

यकीनन, ये वक्त का तकाजा है और शायद कॉफी हाउस की सांसें चलाने के लिए जरूरी भी, लेकिन आधुनिकता का लबादा ओढ़े हुए आज का कॉफी हाउस अपने चर्चित इतिहास को कहीं न कहीं अपने ही अंदर दफन कर चुका है और अब यहां आने वाले नवयुवकों सहित अन्य लोगों को भी नहीं पता कि वह किस अहम जगह पर बैठे हैं, उनके लिए ये जगह भी दूसरे रेस्टारेंट की ही तरह है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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