झारखंड की सियासत का नया 'टाइगर', कैसे जयराम महतो ने सुदेश महतो के राजनीति करियर पर लगा दिया ब्रेक?

झारखंड विधानसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के प्रमुख जयराम महतो, जिनको लोग 'टाइगर' के नाम से जानते हैं, इस चुनाव में राज्य में ओबीसी कुड़मी समुदाय के नए चेहरे के रूप में उभरे हैं। जेएलकेएम ने झारखंड में 71 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से उन्होंने केवल एक सीट जीती, लेकिन कम से कम 14 सीटों पर चुनाव परिणाम को प्रभावित किया, जिसका लाभ इंडिया ब्लॉक को हुआ।

चुनाव परिणाम ने घोषित होने के बाद ये साफ हो गया है कि जयराम महतो ने आजसू प्रमुख सुदेश महतो के राजनीतिक करियर पर ब्रेक लगा दिया है। नतीजों पर दोनों नेताओं के आत्मविश्वास में विरोधाभास स्पष्ट था। एक ओर जहां जयराम महतो ने कहा, ''सपने देखना चाहिए, युवाओं को सपने बड़े देखना चाहिए... विधायक बनने से मेरे साथ-साथ युवाओं के रास्ते भी खुल गए हैं।'' वहीं सुदेश ने कहा, "हम जनता द्वारा दिए गए जनादेश का सम्मान करते हैं और हेमंत सोरेन जी को बधाई देते हैं। हम अपनी पार्टी और एनडीए के भीतर इस चुनाव परिणाम की समीक्षा करेंगे।"

Jairam Mahato Sudesh Mahto

आजसू के पारंपरिक आधार को जयराम महतो की पार्टी ने किया खत्म

जयराम कुर्मी या महतो समुदाय से आते हैं, जो राज्य की आबादी का लगभग 14 प्रतिशत है। उनकी पार्टी के उदय ने आजसू के पारंपरिक आधार को खत्म कर दिया है। जयराम की जेएलकेएम ने झारखंड विधानसभा की कुल 81 सीटों में से 71 सीटों पर चुनाव लड़ा था। कई सीटों पर जेएलकेएम के उम्मीदवारों को 15,000 से ज्यादा वोट मिले, जो जीतने वाले उम्मीदवार और दूसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार के बीच जीत के अंतर के करीब था। कई अन्य सीटों पर यह दूसरे स्थान पर रहा।

इस बीच आजसू का वोट शेयर भी 2019 में 8.2 प्रतिशत से घटकर 2024 में 3.54 प्रतिशत रह गया है, जो महतो वोटों के जेएलकेएम के पक्ष में जाने का संकेत है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी जयराम ने गिरिडीह संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा था और 3.5 लाख वोट हासिल किए थे। हालांकि, वे आजसू उम्मीदवार चंद्र प्रकाश चौधरी से हार गए थे।

'झारखंड का लड़का' जयराम महतो, किन-किन सीटों पर बिगाड़ा खेल

जयराम को 'झारखंड का लड़का' के नाम से जाने जाते हैं। जयराम ने डुमरी निर्वाचन क्षेत्र से झामुमो की बेबी देवी को हराकर जीत हासिल की। उन्होंने 94,496 वोट प्राप्त किए और बेबी देवी को 10,945 वोटों के अंतर से हराया। आजसू पार्टी की यशोदा देवी 35,890 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं।

डुमरी सीट कभी जेएमएम और उसके नेता जगरनाथ महतो का गढ़ हुआ करती थी, जिन्होंने झारखंड बनने के बाद से इस सीट से एक भी चुनाव नहीं हारा। कोविड से जुड़ी जटिलताओं के कारण जगरनाथ की मृत्यु के बाद, यह सीट उनकी पत्नी बेबी देवी के पास थी, जिन्होंने 2023 के उपचुनाव में जीत हासिल की।

डुमरी में विभिन्न जातियों के युवाओं के साथ-साथ कुड़मी आबादी जयराम के पीछे खड़ी दिख रही है। झारखंड में कुड़मी समुदाय के मतदाता 15% हैं। सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना 2011 के आंकड़ों से वाकिफ सूत्रों ने बताया कि राज्य में ओबीसी कुड़मी आबादी 8.6% है।

रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड में लगभग 4 करोड़ की अनुमानित आबादी को देखते हुए, 8.6% पर भी, कुड़मी महतो की राज्य में 34 लाख की आबादी हो सकती है। उनमें से 20 लाख वोट देने के पात्र होंगे। एक विशेषज्ञ ने कहा, "अब आने वाले चुनावों में कुड़मी वोटों का झुकाव चुनावों को प्रभावित कर सकता है और जयराम महतो ने कई निर्वाचन क्षेत्रों में आग फिर से जला दी है।"

कैसे जेएलकेएम ने विधानसभा चुनाव को किया प्रभावित?

विधानसभा चुनाव में जेएलकेएम ने 71 उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें जयराम दो सीटों डुमरी और बेरमो से चुनाव लड़े थे। डुमरी में जहां जेएमएम को नुकसान हुआ, वहीं बेरमो में जेएमएम की सहयोगी कांग्रेस को फायदा हुआ।

बेरमो में जयराम को 60,871 वोट मिले और वह कांग्रेस के कुमार जयमंगल से 29,375 वोटों से हार गए, जबकि भाजपा के रविंदर पांडे 58,352 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे। बेरमो की तरह जेएलकेएम ने कई निर्वाचन क्षेत्रों में वोट काटे, जिसका बड़ा फायदा इंडिया ब्लॉक को हुआ।

कम से कम 13 सीटों - सिल्ली, बोकारो, गोमिया, गिरिडीह, टुंडी, इचागढ़, तमार, चक्रधरपुर, चंदनक्यारी, कांके, छतरपुर, सिंदरी और खरसावां - पर जेएलकेएम को मिले वोट जीत के अंतर से ज्यादा थे। इस साल की शुरुआत में हुए लोकसभा चुनाव में जयराम ने गिरिडीह निर्वाचन क्षेत्र से 3.47 लाख वोट हासिल किए थे, जिससे यह त्रिकोणीय मुकाबला बन गया था, वे 20,000 वोटों के अंतर से तीसरे स्थान पर आए थे।

वोट कटवा कहने पर क्या बोले थे जयराम महतो?

हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा, "जब कोई नई पार्टी उभरती है तो यह चुनौतीपूर्ण होता है। लेकिन अगर कोई नई राजनीतिक पार्टी चुनौतियों से डरकर नहीं उभरती है, तो मुझे लगता है कि लोकतंत्र सीमित हो जाएगा। लोग हमें 'वोट-कटवा' कहते हैं, लेकिन यह तभी लागू होता है जब हमें बिल्कुल वही वोट मिलते हैं... हम अपनी पहचान बना रहे हैं और ज्यादा वोट पा रहे हैं... इसलिए हम इसके बारे में चिंता नहीं करते हैं। हमने अपने प्रयासों को अपने प्रदर्शन और प्रस्तुति के इर्द-गिर्द केंद्रित किया है।"

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