Jharkhand Chunav: 'सहारा' के लाखों निवेशकों को हेमंत सोरेन सरकार ने कैसे दिया धोखा?

Jharkhand Chunav 2024: बीजेपी ने झारखंड विधानसभा चुनावों के लिए जारी अपने संकल्प पत्र में 'सहारा' पैराबैंकिंग (चिटफंड कंपनी) के निवेशकों को पाई-पाई लौटाने का वादा किया है। विपक्षी भारतीय जनता पार्टी को चुनावों में झारखंड के गरीब मतदाताओं से इस तरह के वादे करने की नौबत ही नहीं आती, यदि जेएमएम की अगुवाई वाली हेमंत सोरेन सरकार ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाई होती और विधानसभा के अंदर किए गए अपने वादे पर गंभीर होती।

एक अनुमान के मुताबिक झारखंड में 24 लाख से ज्यादा लोगों का पैसा सहारा की विभिन्न वित्तीय कंपनियों की दगाबाजी की वजह से फंसा हुआ है। मतलब, जिन लोगों ने अपनी छोटी-छोटी बचत का पैसा सहारा में बड़ी ही उम्मीदों से निवेश किया था, उसकी वजह से उनके परिवारों के लगभग सवा करोड़ लोग बीते एक दशक से पैसे-पैसे के लिए मोहताज हो चुके हैं।

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हेमंत सरकार वादे पूरे करने में हुई फेल
आज से ढाई साल से भी पहले मार्च, 2022 में झारखंड के वित्त मंत्री रामेश्वर ओरांव ने विधानसभा के अंदर कहा था कि राज्य सरकार सहारा निवेशकों की गाढ़ी कमाई का पैसा वापस दिलवाने को लेकर बहुत ही गंभीर है। लेकिन, यह वादे सोरेन सरकार के बाकी कई वादों की तरह ही आज तक भी वादे ही बने हुए हैं।

उसी साल दिसंबर में फिर से जेएमएम सरकार के एक मंत्री बादल पत्रलेख ने फिर से विधानसभा में ही जानकारी दी कि सहारा के जिन निवेशकों के पैसे नहीं लौटे हैं, उन्हें दिलाने के वास्ते उनकी सरकार हर मुमकिन कोशिश कर रही है। उन्होंने निवेशकों की शिकायत के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी करने की भी बात बताई।

गरीबों, मजदूरों और किसानों का फंसा हुआ है सहारा में पैसा
लेकिन, हकीकत ये है कि आज भी सहारा के ऐसे लाखों निवेशकों को राज्य सरकार ने 'बेसहारा' ही छोड़ रखा है। सहारा के ये निवेशक कौन लोग हैं? इनमें से ज्यादातर बेहद गरीब मजदूर, किसान और हर दिन रिक्शा चलाकर या छोटे-मोटे काम करके अपने परिवार के लिए रोटी कमाने वाले बहुत ही कम आय-वर्ग के लोग हैं।

उस समय के आंकड़ों के मुताबिक इनके करीब 2,500 करोड़ रुपए सहारा समूह की विभिन्न योजनाओं में फंसे हुए हैं, जिसे वापस लेने के लिए इन्हें आजतक सिर्फ धक्के ही खाने पड़े हैं।

सहारा कंपनी की तरह हेमंत सरकार ने भी निवेशकों से की दगाबाजी!
सवाल है कि हेमंत सोरेन सरकार अगर गरीब निवेशकों की कोई मदद नहीं कर सकती थी, तो फिर उनके साथ सहारा कंपनी की तरह ही 'दगाबाजी' क्यों की? उनसे झूठे वादे क्यों किए गए? उनकी गरीबी और मासूमियत का मजाक उड़ाने के लिए विधानसभा जैसे लोकतंत्र के मंदिर का इस्तेमाल क्यों किया गया?

पहले निवेशकों को रोक नहीं पायी, फिर गुमराह करती रही JMM!
अब जब चुनाव का वक्त है तो मुख्यमंत्री सहारा को-ऑपरेटिव को लेकर गलत जानकारियां फैलाने में लगे हुए हैं। उनके इन प्रयासों को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी उजागर किया है। जेएमएम 2004 से लेकर 2014 तक केंद्र की यूपीए सरकार की सहयोगी रही और सहारा ने इसी दौरान गरीब निवेशकों से सबसे ज्यादा पैसे उगाहने का काम किया था।

बीते पांच वर्षों से प्रदेश में उनकी सरकार है, लेकिन सिर्फ इसपर भरोसा, आश्वसन देने और इधर-उधर की बातें बनाने के अलावा निवेशकों के हित में कोई काम नहीं हो पाया है; और जब चुनाव आ गया है तो फिर से गलत प्रोपेगेंडा फैलाने की कोशिशें की जा रही हैं।

भाजपा के भरोसे ने करोड़ों लोगों को दी है एक नई उम्मीद
जब बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में सहारा को-ऑपरेटिव में कानूनी तरीके से निवेश किए गए निवेशकों के पाई-पाई लौटाने की प्रतिबद्धता जताई है, तो प्रदेश के करोड़ों लोगों के बीच एक नए सूर्योदय की भावना पैदा हुई है।

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