Jharkhand Chunav: 24 साल बाद भी झारखंड की चुनावी राजनीति पर है बिहार का सियासी साया

Jharkhand elections 2024: झारखंड को अलग राज्‍य का दर्जा मिले 24 साल से अधिक का समय बीत चुका है लेकिन अभी भी झारखंड राजनीतिक पर बिहार की राजनीतिक विरासत से प्रभावित और गहराई से जुड़ा हुआ है। वर्तमान झारखंड विधानसभा चुनाव में बिहार के राजनीतिक दलों का प्रभाव साफ नजर आ रहा है।

झारखंड चुनाव में सीट-बंटवारा, जातिगत अपील और भाषाई समेत अन्‍य समानताओं को साझा करने वाली आबादी के जरिए बिहार के राजनीतिक दल फिर से झारखंड की स्वतंत्र पहचान का परीक्षण कर सकते हैं, जिसके कारण 2024 का झारखंड चुनाव एनडीए बनाम भारत से अधिक हो जाएगा।

Jharkhand elections

हालांकि 'झारखंड अबुआ (झारखंड हमारा है)' एक समय एक अलग पहचान का दावा था लेकिन बिहार की मूल पार्टियां राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और जनता दल (यूनाइटेड) जैसी पार्टियां झारखंड को उपजाऊ भूमि के रूप में देखते हैं जिसके परिचित मतदाता हैं।

यहां का राजनीतिक परिदृश्य दोनों क्षेत्रों के बीच स्थायी बंधन का प्रमाण है, जिसे पार्टी लाइनों के पार गठबंधन सहयोगियों के बीच सीट-बंटवारे के विवादास्पद मुद्दे से और भी उजागर किया गया है।

चुनावी रणनीतियों को आकार देने में निभाते हैं अहम भूमिका

बता दें झारखंड और बिहार के बीच जनसांख्यिकीय (demographic) और भाषाई संबंध झारखंड में बिहार आधारित दलों की चुनावी रणनीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 2011 की जनगणना के अुनसार बिहार के अंतर-राज्यीय प्रवासियों का एक बड़ा हिस्सा झारखंड में बस गया, जिससे दोनों राज्यों के सामाजिक ताने-बाने के बीच की सीमाएं धुंधली हो गईं।

जाति-आधारित राजनीतिक दलों का प्रभाव

इस प्रवासन के कारण एक साझा जाति संरचना बन गई है, विशेष रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के बीच, जो दोनों राज्यों की आबादी का 50% से अधिक है। इस तरह की जनसांख्यिकीय ओवरलैप बिहार के जाति-आधारित राजनीतिक दल, जैसे कि आरजेडी और जेडी(यू) के लिए अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए खासकर यादव आबादी वाले क्षेत्रों में उपजाऊ जमीन प्रदान करती है।

झारखंड चुनाव में बिहार के दिग्गज नेताओं की मौजूदगी

झारखंड के चुनावी मैदान में बिहार के प्रमुख राजनीतिक हस्तियों की मौजूदगी राज्य-दर-राज्य राजनीतिक का सबूत है। पप्पू यादव और जीतन राम मांझी, अलग-अलग गठबंधनों का प्रतिनिधित्व करते हुए, विशिष्ट जाति समूहों के बीच अपने प्रभाव का लाभ उठाते हैं, जिससे बिहार की जाति-केंद्रित राजनीतिक रणनीतियों को झारखंड में भी लागू किया जाता है।

गठबंधन राजनीति में चुनौतियां और प्रभाव

झारखंड में राजनीतिक परिदृश्य गठबंधन की गतिशीलता से और भी जटिल हो गया है, जिसमें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और भारतीय राष्ट्रीय विकास समावेशी गठबंधन (इंडिया) दोनों ही गुटों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर विवादास्पद बातचीत चल रही है।

इंडिया गुट के भीतर बड़ी संख्या में सीटों पर आरजेडी के जोर देने से टकराव की स्थिति पैदा हो गई है, जो एक ऐसे राज्य में गठबंधन बनाने के लिए जटिल होगी, जहां क्षेत्रीय और जातिगत मुद्दे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी तरह, एनडीए को एक सुसंगत अभियान रणनीति बनाए रखते हुए अपने सहयोगियों की जाति-आधारित अपील को समायोजित करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

बता दें वर्ष 2000 में झारखंड के बिहार से औपचारिक रूप से अलग होने के बावजूद, बिहार की राजनीति की छाया झारखंड पर मंडराती रही है। बिहार के प्रवासियों की आमद और सीमावर्ती जिलों में भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी भाषाओं के व्यापक उपयोग ने दोनों राज्यों के बीच सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंधों को मजबूत किया है।

भोजपुरी को "उधार ली गई" भाषा के रूप में नामित करके भाषाई सीमा का सीमांकन करने के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के प्रयास बिहार के भारी प्रभाव के बीच एक अलग झारखंडी पहचान के लिए चल रहे संघर्ष को उजागर करते हैं।

भाषाई और जनसांख्यिकीय मिश्रण बिहार की पार्टियों के लिए झारखंड के मतदाताओं, खासकर बिहार के साथ मजबूत भाषाई और सांस्कृतिक संबंधों वाले क्षेत्रों के साथ जुड़ने के लिए एक सेतु का काम करता है।

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