प्रकृति का छिपा गहना है झारखंड, एक गांव में सदियों से खेली जा रही है Dhela Maar Holi, जानिए खासियत
होली रंगों और खुशियों का पर्व है, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में होली की परंपराएं भी अलग हैं। उत्तर प्रदेश में ब्रज की लठमार होली के अलावा झारखंड की ढेला मार होली भी बेहद खास है, जानिए इससे जुड़ी परंपराएं

Holi 2023 कई कारणों से खास होने वाला है। कोरोना महामारी की खौफनाक यादों को बिसराने के बाद खुशियों और मिठाइयों को शेयर करने वाले इस फेस्टिवल में कई ऐसी परंपराएं हैं, जो क्षेत्र विशेष में खास अहमियत रखती हैं। ऐसी ही होली का एक रूप है प्रकृति का छिपा हुआ गहना कहे जाने वाले प्रदेश- झारखंड की ढेला मार होली। खास तौर पर झारखंड के एक जिले में लोकप्रिय ढेला मार होली के दौरान लकड़ी के पोल की अहम भूमिका होती है।
ढेला मार होली कहां खेली जाती है?
होली के अलग-अलग रंगों पर आधारित दर्जनों मीडिया रिपोर्ट्स में एक के अनुसार ढेला मार होली झारखंड के लोहरदगा जिले में खेली जाती है। इस जिले का बरही चटकपुर गांव ढेला मार होली के लिए विशेष रूप से लोकप्रिय है। होली के दिन ग्रामीण एक गांव में जमा होते हैं। सबके हाथों में मिट्टी का ढेला होता है। यानी छोटे आकार वाले कंकड़-पत्थर। इसका इस्तेमाल लोगों पर निशाना साधने के लिए किया जाता है।
खंभे से जुड़ी परंपरा, Dhela Maar Holi
स्थानीय ग्रामीणों का मानना है कि लोहरदगा की ढेला मार होली सदियों पुरानी परंपरा है। होलिका दहन की पूजा के बाद गांव के पुजारी बड़े मैदान के बीच लकड़ी का खंभा (पोल जैसा) गाड़ते हैं। परंपरा के अनुसार होलिका के अगले दिन स्थानीय लोग पुजारी के खंभे को उखाड़ने के लिए जमा होते हैं। इस समय जो भी शख्स खंभे को उखाड़ने का प्रयास करता है, उसे ग्रामीणों के हमले का सामना करना पड़ता है। ग्रामीण अपने पास जमा ढेले और कंकड़-पत्थर से खंभा उखाड़ने का प्रयास करने वाले व्यक्ति को निशाना बनाते हैं।
होली का एक स्वरूप ढेल मार होली
सदियों पुरानी परंपरा की टाइमलाइन के बारे में ग्रामीणों को अधिक जानकारी नहीं है। आस्था-मान्यता के मुताबिक ढेले-पत्थरों की बौछार के बीच खंभा उखाड़ने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है, लेकिन चैलेंजिंग परिस्थिति होने के बावजूद जो भी ग्रामीण खंभा उखाड़ने में कामयाब होता है, उसे सौभाग्यशाली माना जाता है। इस परंपरा या ढेला मार होली क्यों मनायी जाती है? इसका भी कोई ठोस कारण किसी के पास नहीं, लेकिन परंपराओं के प्रदेश और गांवों के देश भारत में अनोखी होली का एक स्वरूप ढेल मार होली भी है। रंगों के त्योहार में इसे भी उतनी ही धूमधाम से सेलिब्रेट किया जाता है।
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होलिका दहन कब, कब बरसेंगे होली के रंग?
बता दें कि रंगों में सराबोर होने से पहले होलिका दहन का पर्व है। Holi 2023 का होलिका दहन छह और सात मार्च दोनों दिनों में मनाने की बातें सामने आ रही हैं। उदया तिथि के अनुसार पंचांग फॉलो करने वाले लोगों का कहना है कि पूर्णिमा के दिन होलिका दहन की परंपरा है, ऐसे में पूर्णिमा तिथि छह मार्च शाम 04:17 बजे से शुरू हो रही है। सात मार्च को पूरे दिन यानी सूर्यास्त के बाद भी पूर्णिमा रहेगी। शाम 06:10 तक पूर्णिमा होने के कारण होलिका दहन सात मार्च को होने की बात भी सामने आई है। अगले दिन यानी आठ मार्च को लोग रंगों से सराबोर होंगे। होली को गिले-शिकवे भुला कर लोग दुश्मनों को भी गले लगाने का मौका मानते हैं। ऐसे में लोग संबंधों की खटास बिसराकर खुशियों के साथ-साथ मिठाइयां भी बांटेंगे।
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