Jharkhand Chunav: बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा बेवजह नहीं है, हिला देने वाले हैं ये तथ्य, क्यों सोयी रही सरकार
Jharkhand Chunav 2024: झारखंड विधानसभा चुनाव में इस बार बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर खूब सियासी घमासान मचा है। विपक्षी बीजेपी राज्य में सत्ताधारी जेएमएम पर इसको लेकर आंखें मूंदे रहने का आरोप लगा रही है। पार्टी का दावा है कि इसकी वजह से आदिवासियों की जमीन अवैध घुसपैठिए हड़प रहे हैं, खासकर संथाल परगना इलाके की जनसांख्यिकी बदल गई है। लेकिन, जेएमएम इन आरोपों को न सिर्फ खारिज कर रही है, बल्कि भाजपा पर सांप्रदायकिता को बढ़ावा देने का आरोप लगा रही है।
लेकिन, तथ्यों की पड़ताल करें तो अवैध घुसपैठ का मुद्दा तूल पकड़ना बेवजह नहीं है। खुद सरकारी रिकॉर्ड और सरकारी मुलाजिम इस समस्या को स्वीकार कर रहे हैं। अलबत्ता जहां तक जनसांख्यिकी बदलाव की बात है तो यह बहुत ही पुख्ता रूप से प्रमाणित हो चुकी है, लेकिन यह कोई एक दिन में ही या कुछ वर्षो में ही नहीं हुआ है। बल्कि, इसकी एक लंबी श्रृंखला है, जो आगे चलकर भयावह रूप लेने की दस्तक भी हो सकती है।

संथाल परगना में आदिवासियों की जनसंख्या में गिरावट, मुसलमानों की बढ़ोतरी-रिपोर्ट
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक जनहित याचिका पर जारी एक नोटिस के जवाब में केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने झारखंड हाई कोर्ट को हलफनामें में बताया है कि '1951 से 2011 के बीच संथाल परगना में आदिवासियों की कुल आबादी 16% घट चुकी है।
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जबकि, इसी अवधि में मुसलमानों की जनसंख्या में 32% की बढ़ोतरी हुई है। तब आदिवासियों की कुल आबादी 28.11% थी।' हालांकि, कुल आबादी में स्वाभाविक रूप में दोनों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई।
क्या हाई कोर्ट में झारखंड सरकार ने दिया गलत हलफनामा?
यह पीआईएल (PIL) हाई कोर्ट में संथाल परगना क्षेत्र में अवैध घुसपैठ की जांच के लिए ही डाली गई है। हालांकि, तब संथाल परगना डिविजन के 6 जिलों के जिलाधिकारियों ने हलफनामा देकर दिलचस्प रूप से यहां तक दावा कर दिया था कि उनके जिलों में कोई बांग्लादेशी घुसपैठ नहीं हुआ है।
पिछले 20 सितंबर को सुनवाई के दौरान इस तरह के जवाब से अदालत भी हैरान रह गई और उसने इन जिला कलेक्टरों को यहां तक चेतावनी दे डाली कि अगर उनके इलाके में एक भी घुसपैठ का मामला सामने आया तो उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का केस चलाया जाएगा।
कपिल सिब्बल को पीआईएल की टाइमिंग पर आपत्ति
तथ्य यह भी है कि इस दौरान झारखंड सरकार की ओर से पेश होने वाले वरिष्ठ वकील और केंद्र में विपक्षी सांसद कपिल सिब्बल ने तथ्यों पर जवाब देने की जगह यह मुद्दा उठाने की कोशिश की कि चुनाव से पहले ही यह पीआईएल क्यों डाली गई है।
साहिबगंज के जिलाधिकारी ने मानी घुसपैठ की बात
इस बीच साहिबगंज जिले के जिलाधिकारी हेमंत सती ने यह बात कबूल कर ली है कि 2017 से 4 बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़ा गया था। उन्होंने स्पष्ट तौर पर माना है कि 'इस क्षेत्र में जनसांख्यिकी बदलाव से कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन, इसके लिए बाहरी घुसपैठ के साथ-साथ बेरोजगारी और उच्च शिशु मृत्यु दर भी जिम्मेदार फैक्टर हैं।'
भोगनाडीह का भयावह सच!
झारखंड की राजधानी रांची से करीब 400 किलोमीटर दूर एक भोगनाडीह गांव है। यह 1855 में अंग्रेजों के खिलाफ पहले संथाल विद्रोह (सिद्धो-कान्हू आंदोलन) का केंद्र रहा है। वहां सिद्धो मुर्मू का एक मंदिर भी है, जिन्होंने उस आंदोलन की अगुवाई की थी। उनके साथ उनके पांच भाई कान्हू, चंदा, भैरव, फूलो और झानो उस आंदोलन में वीरगति को प्राप्त हुए थे।
संथाल विद्रोह के केंद्र में बहुसंख्यक हो गए मुसलमान!
यह भोगनाडीह गांव इस वक्त राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के चुनाव क्षेत्र बेरहट में आता है। उस गांव में पहले मूलरूप से आदिवासियों की ही आबादी हुआ करती थी। आज वहां की करीब 3,000 जनसंख्या में आदिवासी, मुसलमान और ईसाई शामिल हैं। इस इलाके के ज्यादातर गांवों में अब इसी तरह का परिवर्तन नजर आता है। यह इलाका सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का गढ़ बन चुका है।
60 वर्षों में किस वजह से बदल गई भोगनाडीह की जनसांख्यिकी?
भोगनाडीह के 80 वर्ष से भी ज्यादा उम्र के जनार्दन टुडु को अपने गांव के इतिहास पर आज भी गर्व है। लेकिन, वह ये भी कहते हैं, 'भोगनाडीह की मूल जनसांख्यिकी बदल चुकी है। यह अब एक आदिवासी बहुल गांव नहीं रह गया है, क्योंकि मैंने पिछले 60 वर्षों में कई धार्मिक संरचनाएं खड़ी होती देखी हैं। पहले इस गांव की आस्था सिर्फ 6 शहीदों में थी, लेकिन अब कई ईश्वरों को देखा जा सकता है।'
गांव की तस्वीर बदलने को लेकर बुजुर्ग ही चिंतित नहीं हैं। 30 वर्षीय मंडल मुर्मू भी इससे परेशान होने वालों में से हैं। खुद को सिद्धो मुर्मू के वंशज बताने वाले युवक का कहना है, 'खतियान (1932 के मूल भूमि दस्तावेज) के अनुसार भोगनाडीह में सिर्फ 200 आदिवासी और केवल 5 गैर-आदिवासी परिवार ही थे। लेकिन, अब उन्होंने हमें काफी पीछे छोड़ दिया है। अब करीब 100 आदिवासी परिवार ही रह गए हैं, जिनकी जनसंख्या लगभग 500 के करीब है। मुसलमानों के 200 परिवारों की जनसंख्या 1,500 से ज्यादा हो चुकी है और दूसरे धर्मों के लोगों के करीब 150 परिवार हैं।'
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