आखिर क्या है कश्मीरी पंडितों का 'नरसंहार'? जिसको लेकर संगठनों ने चुनावी प्रकिया का किया Boycott
What is Kashmiri Pandits Massacre: जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव तीन चरणों में होने जा रहे हैं। चुनावी तैयारियां जोरों पर हैं। इस बीच, कश्मीरी पंडित समुदाय के कई संगठनों ने 'उनके नरसंहार को लगातार नकारने' के कारण केंद्र शासित प्रदेश में चुनावी प्रक्रिया से दूर रहने का फैसला किया है।
मतलब साफ है कि 18, 25 सितंबर और 1 अक्टूबर को तीन चरणों में होने वाले मतदान से पंडित समुदाय ने दूरियां बना ली है। कश्मीरी पंडितों का नरसंहार 1990 के दशक में जम्मू और कश्मीर में हुआ था, जो भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे भयावह और दर्दनाक घटनाओं में से एक मानी जाती है। आखिर क्या है 'कश्मीरी पंडितों' का नरसंहार? आइए विस्तार से जानते हैं...

कश्मीर में 1980 के दशक के अंत में राजनीतिक अस्थिरता और अलगाववादी आंदोलनों का उभार हुआ। इस दौरान जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) जैसे आतंकवादी संगठनों ने कश्मीर को भारत से अलग कर एक इस्लामिक राज्य बनाने की मांग की। अलगाववादी ताकतों ने कश्मीरी पंडितों को 'भारत के एजेंट' के रूप में देखा और उन्हें निशाना बनाना शुरू किया।
नरसंहार और जान-माल का नुकसान
1990 के जनवरी में स्थिति बेहद भयावह हो गई। 19 जनवरी 1990 की रात को पूरे कश्मीर में मस्जिदों से लाउडस्पीकरों के माध्यम से पंडितों को धमकाया गया कि वे या तो कश्मीर छोड़ दें, इस्लाम अपना लें, या मारे जाएं।
- लगभग 4 लाख से अधिक कश्मीरी पंडित अपने घरों को छोड़ने के लिए मजबूर हुए।
- सरकारी आंकड़ों के अनुसार, लगभग 200-300 कश्मीरी पंडित मारे गए थे, जबकि पंडित समुदाय के संगठनों के अनुसार मरने वालों की संख्या इससे कहीं अधिक थी।
- कश्मीरी पंडितों की हत्याओं, महिलाओं के साथ दुष्कर्म, और संपत्ति के विनाश के मामलों की कई घटनाएं सामने आईं।
दोषी कौन थे?
- इस नरसंहार के पीछे प्रमुख रूप से जेकेएलएफ (JKLF) और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठन थे। इनके द्वारा फैलाए गए कट्टरपंथ और हिंसा के कारण कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया।
- इसके अलावा, तत्कालीन राज्य सरकार और प्रशासन की विफलता और कमजोर कानून-व्यवस्था की स्थिति ने भी इस त्रासदी को बढ़ावा दिया।
सरकार ने क्या उठाए कदम?
- केंद्र सरकार ने उस समय जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू किया और हिंसा को नियंत्रित करने के लिए सेना और सुरक्षा बलों की तैनाती की।
- विस्थापित कश्मीरी पंडितों को जम्मू और दिल्ली समेत भारत के अन्य हिस्सों में राहत शिविरों में रखा गया।
- राज्य और केंद्र सरकारों ने पुनर्वास योजनाएं शुरू कीं, लेकिन अधिकांश कश्मीरी पंडित आज भी अपने घरों को वापस नहीं लौट सके हैं।
नतीजे और आज की स्थिति
- यह नरसंहार केवल कश्मीर के इतिहास में ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में एक गहरी छाप छोड़ गया है।
- आज भी कश्मीरी पंडितों की वापसी एक उलझा हुआ मुद्दा है। कश्मीर में स्थिति में सुधार के बावजूद अधिकांश पंडित समुदाय वापस नहीं लौटा है।
- सरकारों ने समय-समय पर पुनर्वास के प्रयास किए हैं, लेकिन पूरी तरह से इस समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।












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