Jammu Kashmir Terror Attack: आजादी के बाद कब-कब सुलगा जम्मू-कश्मीर? आतंकियों की कैसे पल-पल बदली रणनीति?
Jammu Kashmir Terror Attack: बात 15 अगस्त 1947 की है, जब भारत को ब्रिटिश शासन से आजादी मिली। जिसके बाद, भारत का विभाजन दो देशों, भारत और पाकिस्तान के रूप में हो गया। तब तक, जम्मू-कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत थी। लेकिन, प्राकृतिक सुंदरता, समृद्ध संस्कृति, और आकर्षक स्थलों की भरमार से फल-फूल रही कश्मीर पर पाकिस्तान की बुरी नजर पड़ गई। धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर, जिसे भारत के सिर का ताज के रूप में जाना जाता है, उस पर कब्जा जमाने की फिराक में पाकिस्तान जुट गया।
1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद से जम्मू-कश्मीर का कुछ हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया, जिसे आज पीओके (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) के नाम से जाना जाता है। देखते ही देखते 76 साल बीत गए, लेकिन पाकिस्तान लगातार अपने नापाक इरादों को अंजाम देने के लिए बड़े-बड़े धमाकों और आतंकी हमलों का सहारा ले रहा है।

पाक समर्थित आतंकी संगठन लगातार जम्मू-कश्मीर में दहशतगर्दों की भूमिका में नजर आ रहे हैं। हालांकि, भारतीय सेना उनके मंसूबों को बड़ी बहादुरी से नाकाम कर रही है। भारतीय सैनिक, आतंकियों से मुठभेड़ में अपने प्राणों की आहुति देश के नाम कुर्बान करने से भी पीछे नहीं हटते। आइए हम आपको रूबरू कराते हैं कि कैसे एक रियासत का भारत में विलय हुआ? कब-कब प्रमुख आतंकी हमले हुए? कैसे पल-पल बदल रही आतंकियों की रणनीति?
कैसे एक रियासत का भारत में विलय हुआ?
- जम्मू-कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत थी और इसके शासक महाराजा हरि सिंह ने प्रारंभ में स्वतंत्र रहने का निर्णय लिया। लेकिन स्थिति तेजी से बदल रही थी, और पाकिस्तान के कबायलियों (Tribal Militias) ने जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण कर दिया, जिससे स्थिति विकट हो गई।
- अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायलियों ने कश्मीर में प्रवेश किया और व्यापक हिंसा फैल गई। महाराजा हरि सिंह को अपनी रियासत की सुरक्षा की चिंता सताने लगी। इस संकट के मद्देनजर, महाराजा ने भारत से सैन्य सहायता की अपील की।
- भारत की स्वतंत्रता के समय पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने थे। नेहरू सरकार ने स्पष्ट किया कि वे केवल तभी हस्तक्षेप कर सकते हैं, जब जम्मू-कश्मीर आधिकारिक रूप से भारत का हिस्सा बन जाए।
- विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर: संकट को देखते हुए, महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय के दस्तावेज (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए।
- भारत का हस्तक्षेप: विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर होने के बाद, भारत ने अपने सैनिकों को कश्मीर में भेजा और पाकिस्तानी कबाइलियों को खदेड़ने का प्रयास किया। यह संघर्ष आखिर में 1948 के पहले भारत-पाकिस्तान युद्ध में बदल गया।
- कैसे बना POK: 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद से जम्मू- कश्मीर का कुछ हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया, जिसे आज पीओके (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) के नाम से जाना जाता है। इस दौर में आतंकवादी गतिविधियां सीमित थीं और मुख्य रूप से सीमा पार से घुसपैठ और हमलों तक ही सीमित थीं।
1990 का उदय, घाटी में आतंकवाद का दौर
1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीर घाटी में आतंकवाद का एक नया दौर शुरू हुआ। सोवियत-अफगान युद्ध के बाद अफगानिस्तान से लौटे मुजाहिदीन लड़ाकों ने कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा दिया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों ने प्रमुखता हासिल की। आतंकवादियों ने आम नागरिकों, सेना और सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना शुरू किया।
अनुच्छेद 370 और 35A की क्या थी भूमिका?
विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के साथ ही जम्मू-कश्मीर भारतीय संघ का हिस्सा बन गया और इसे भारतीय संविधान के तहत विशेष स्वायत्तता प्राप्त हुई। अनुच्छेद 370 और 35A के तहत इसे विशेष अधिकार और दर्जा दिया गया, जो 5 अगस्त 2019 को मोदी सरकार के नेतृत्व में हटाया गया।

कब-कब लहूलुहान हुआ जम्मू कश्मीर?
- 1947-48: कश्मीर- पाकिस्तान के कबायली और सैनिकों का कश्मीर पर हमला। संघर्ष में कई लोगों की जानें गईं।
- 1996: किश्तवाड़- 14 जुलाई को आतंकियों ने किश्तवाड़ में हमला किया, जिसमें 17 हिंदू मारे गए।
- 1998: अनंतनाग- 20 मार्च को अनंतनाग के चिट्टिसिंह पुरा गांव में 35 सिख मारे गए।
- 1998: वंधामा नरसंहार- 25 जनवरी को वंधामा कस्बे में 23 कश्मीरी हिंदुओं की हत्या की गई थी।
- 1999: कारगिल युद्ध- भारतीय सेना के करीब 527 शहीद हुए। पाकिस्तानी सैनिक और आतंकवादी लगभग 1000 ढेर।
- 2000: अमरनाथ तीर्थयात्रा नरसंहार- तीर्थ यात्रा पर हुए हमले में कम से कम 89 से 105 लोगों की हत्या।
- 2001: जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर हमला- तीन हमलावरों के अलावा 38 लोग मारे गए।
- 2002: रघुनाथ मंदिर- तीन सुरक्षाकर्मियों सहित ग्यारह लोग मारे गए।
- 2002: कालूचक हमला- पाकिस्तानी आतंकियों ने 31 लोगों की हत्या कर दी।
- 2003: नदीमर्ग नरसंहार- पुलवामा के नदी मार्ग गांव में लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने सेना की वर्दी पहनकर 24 कश्मीरी पंडितों मार डाला।
- 2016: उरी हमला- 18 सितंबर 2016 को उरी हमले में 19 भारतीय सैनिक मारे गए और कई घायल हुए।
- 2018: सुंजवां आर्मी कैंप- 10 फरवरी को जम्मू के सुंजवां आर्मी कैंप पर हमला हुआ, जिसमें 6 जवान शहीद हुए और 1 नागरिक की मौत हुई।
- 2019: पुलवामा हमला- 14 फरवरी को, 40 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए।
- 2019: बस स्टैंड हमला- 7 मार्च, को धमाका हुआ। 26 लोग घायल बताए जा गए।
- 2020: नगरोटा मुठभेड़- 19 नवंबर को, 4 आतंकवादी मारे गए।
आतंकवादियों की घुसपैठ, सेना ने चटाई धूल
घुसपैठ की घटनाएं नियंत्रण रेखा (LoC) के आसपास होती रहती हैं। पुंछ, राजौरी, उरी, कुपवाड़ा, और बारामूला जैसे इलाके मुख्य घुसपैठ के मार्ग हैं। इन इलाकों में घुसपैठ रोकने के लिए सुरक्षा बल लगातार निगरानी और अभियान चलाते रहते हैं। 2020 से 2024 तक जम्मू-कश्मीर में कई बड़ी आतंकी गतिविधियां हुई हैं। हालांकि, सुरक्षा बलों ने इन सालों में आतंकवाद के खिलाफ कई सफल ऑपरेशन किए हैं, जिसके परिणामस्वरूप कई आतंकवादी मारे गए और उनके ठिकानों को ध्वस्त किया गया है।

कैसे पल-पल बदल रही आतंकियों की रणनीति?
आजादी के बाद से, पिछले 76 सालों में कश्मीर आतंक की आंच पर झुलसता रहा है। घुसपैठ, गोलियों की गूंज, हमले...दहशतगर्द लगातार सक्रिय रहे। इस बीच, भारत सरकार ने कई अहम फैसले लिए और कश्मीर पर चौकसी बढ़ाते हुए भारतीय सेना के कंधों पर सुरक्षा की जिम्मेदारी डाली।
जवानों ने आतंक पर 'मिशन घाटी' के तहत नकेल कसने की पूरी कोशिश की। जिसके बाद, अब आतंकियों की रणनीति अचानक बदल गई। शांत रहने वाले जम्मू पर आतंकियों की बुरी नजर टिक गई। लगातार जम्मू के रास्ते आतंकी भारत में प्रवेश और अपना अड्डा बनाने के प्रयास में लगे हैं। हालांकि, भारतीय सेना ने जम्मू में अपनी निगरानी बढ़ा दी है।

क्यों लुभा रहा आतंकियों को जम्मू?
- कम पहाड़ी और आसान रास्ते: जम्मू क्षेत्र की भौगोलिक स्थितियां कश्मीर की तुलना में कम पहाड़ी और अधिक सपाट हैं, जिससे घुसपैठ करना आसान हो जाता है। यह क्षेत्र अधिक सुलभ है और यहां घने जंगल भी हैं जो छिपाने के लिए बेहतर होते हैं।
- सीमा की लंबाई और सुरक्षा: जम्मू क्षेत्र में सीमा की लंबाई अधिक है और यहां सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी के लिए पूरी तरह से बाड़ और अन्य अवरोध रहते हैं। इसलिए, घुसपैठ करना आसान होता है।
- कश्मीर में सघन सुरक्षा: कश्मीर घाटी में भारी सुरक्षा बल तैनात हैं और यहां निरंतर निगरानी होती है। जम्मू क्षेत्र में सुरक्षा बलों की संख्या कम हो सकती है और निगरानी का स्तर भी कम हो सकता है। हाल के सालों में लद्दाख सीमा पर चीन के साथ तनाव के कारण कई सुरक्षा बलों को जम्मू क्षेत्र से हटाकर वहां तैनात किया गया है, जिससे जम्मू क्षेत्र में सुरक्षा कमजोर हुई है।
(यह जानकारी विभिन्न वेबसाइटों की खबरों और रिसर्च के मुताबिक है, वनइंडिया इसपर दावा नहीं करता है।)












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