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क्या जम्मू-कश्मीर में भी बनेंगे दिल्ली वाले हालात, उमर अब्दुल्ला सरकार और LG में किन मुद्दों पर हो रहा विवाद?

जम्मू और कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की अगुवाई वाली नेशनल कांफ्रेंस गठबंधन सरकार और उपराज्यपाल (LG) के दफ्तर के बीच विवाद गहराता जा रहा है। हाल में कुछ ऐसे मुद्दे सामने आए हैं, जिससे लग रहा है कि सरकार के दोनों हिस्सों के बीच सबकुछ ठीक नहीं है। लेकिन, इसकी वजह से सीएम उमर की परेशानी ज्यादा बढ़ती नजर आ रही है, क्योंकि उनपर पार्टी विधायकों का दबाव बढ़ रहा है।

डेक्कन हेराल्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में उपराज्यपाल की ओर से संविधान के अनुच्छेद 311 का इस्तेमाल करके दो सरकारी कर्मचारियों की सेवाएं जिस तरह से समाप्त की गई हैं और वहीं केंद्र शासित प्रदेश के एडवोकेट जनरल को बरकरार रखने के अब्दुल्ला सरकार के फैसले को जिस तरह से राजभवन की ओर से खारिज किया गया है, उससे नेशनल कांफ्रेंस सरकार असहज लग रही है।

jammu kashmir

सरकार और राजभवन के बीच कुछ मुद्दों पर विवाद
केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में इस साल अक्तूबर में एक चुनी हुई सरकार स्थापित हुई थी। लेकिन, केंद्र शासित प्रदेश होने की वजह से शासन के विभिन्न क्षेत्रों पर उपराज्यपाल का नियंत्रण अभी तक कायम है और इसी वजह से दोनों के बीच कुछ मुद्दों पर टकराव की स्थिति पैदा हो रही है।

उपराज्यपाल के अधिकारों से उमर को करना पड़ रहा सच से सामना!
उमर अब्दुल्ला पहले उस दौर में जम्मू कश्मीर के सीएम रह चुके हैं, जब यह एक पूर्ण राज्य हुआ करता था। लेकिन, बदली संवैधानिक परिस्थितियों में उनके लिए राजभवन से तालमेल बिठाने में संभवत:दिक्कतें पेश आ रही हैं। ऊपर से केंद्र सरकार ने जिस तरह से जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के बिजनेस रूल्स में विधानसभा चुनावों से पहले संशोधन किए हैं, उससे उपराज्यपाल के पास और अधिकार आ गए।

अफसरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर विवाद
खासकर बिजनेस रूल्स में बदलाव की वजह से अखिल भारतीय सेवाओं से जुड़े अधिकारियों की ट्रांसफर और पोस्टिंग (विशेष रूप से IAS और IPS) में एलजी के पावर और बढ़ गए। इनके अलावा पुलिस महकमे, कानून और व्यवस्था के साथ न्यायिक नियुक्तियों में भी लेफ्टिनेंट गवर्नर के पास ज्यादा अधिकार आ गए।

खासकर जम्मू और कश्मीर प्रशासनिक सेवा (JKAS) के अधिकारियों के ट्रांसफर का मुद्दा विवाद की मुख्य वजह बन गया। ये अधिकारी पहले जम्मू डिविजन में डिप्टी कमिश्नर के तौर पर तैनात किए जाते थे। इनसे जुड़े ट्रांसफर को लेकर सत्ताधारी नेशनल कांफ्रेंस में राजभवन को लेकर ज्यादा असंतोष की स्थिति पैदा हो रही है।

पार्टी और सहयोगी विधायकों की वजह से दबाव में हैं उमर अब्दुल्ला
मुख्यमंत्री पर पार्टी की ओर से बढ़ते दबाव को देखते हुए उन्हें नेताओं से कहना पड़ा कि फिलहाल धैर्य बनाए रखने में ही भलाई है, खासकर जबतक कम से कम इसे पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिल जाता है। दरअसल, नेशनल कांफ्रेंस के एमएलए की शिकायत है कि अधिकारी उनकी सुन नहीं रहे, जिसकी वजह से वह लोगों का काम नहीं करवा पा रहे।

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फिलहाल आश्वासन से काम चला रहे हैं मुख्यमंत्री?
रिपोर्ट के मुताबिक विधायकों के बढ़ते दबाव की वजह से अब्दुल्ला को पार्टी नेताओं को आश्वासन देना पड़ा कि मार्च तक पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल हो सकता है। हालांकि, अभी तक इसकी कोई टाइमलाइन फिक्स नहीं है और ऐसा होने में जम्मू और कश्मीर सरकार का कोई रोल भी नहीं रहने वाला है, क्योंकि यह फैसला केंद्र सरकार पर निर्भर है।

यही वजह है कि सत्ताधारी नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस समेत पीडीपी जैसी विपक्षी पार्टियों की ओर से भी राज्य के दर्जे के लिए मांग तेज की जा रही है।

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