J&K Polls: नतीजों से पहले हुर्रियत ने क्यों खोली जुबान? मीरवाइवाज ने वाजपेयी का नाम लेकर BJP को दिया 'ज्ञान'

Jammu Kashmir election result 2024: जम्मू और कश्मीर विधानसभा के चुनाव नतीजे आने वाले हैं। 8 अक्टूबर को वोटों की गिनती होनी है। इससे पहले हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता मीरवाइज उमर फारूक ने अपना 'बातचीत' वाला राग अलापना शुरू कर दिया है। जबकि, केंद्र शासित प्रदेश में इस बार उन इलाकों में भी जबर्दस्त वोटिंग हुई है, जहां बीते तीन-साढ़े तीन दशकों से चुनाव बहिष्कार होते रहे थे।

मीरवाइज ने कहा है कि कश्मीर मुद्दे के हल के लिए बातचीत की प्रक्रिया में ही समाधान है और यह 'न तो बंदूक से हो सकता है और न ही चुनाव से'। जब जम्मू-कश्मीर के लोग दिल खोलकर लोकतंत्र के साथ खड़े हुए है।

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जमात-ए-हिंद जैसे प्रतिबंधित संगठनों ने भी अपने प्रत्याशी उतारे हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में ही अपने केंद्र शासित प्रदेश का हित देखा है। ऐसे मीरवाइज जैसे लोग अपनी खिसक चुकी राजनीति को नई धार देने की कोशिश में नजर आ रहे हैं।

हुर्रियत के नेता फिर देने लगे 'बातचीत' वाला ज्ञान!
मीरवाइज को शुक्रवार को एक महीने के हाउस अरेस्ट के बाद श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में मौजूद लोगों को संबोधित करने की अनुमति मिली थी। इस दौरान उन्होंने केंद्र में बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार को वास्तविकता अपनाने और कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा, 'बीजेपी सरकार को वास्तविक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और स्वीकार करना चाहिए कि हमें इस (कश्मीर) मसले का समाधान करना है। हमारे पास इसके मिसाल हैं, जैसे हमने विकल्पों की ओर देखने के लिए और आगे बढ़ने के लिए अटलजी, आडवाणीजी और मनमोहन सिंहजी से बात की थी। अगर सरकार इस मसले का हल चाहती है तो हमें फिर उसी नीति पर चलने की जरूरत है।'

जबर्दस्त वोटिंग से हुर्रियत की बढ़ी घबराहट?
जम्मू-कश्मीर में 8 अक्टूबर के बाद एक लोकप्रिय सरकार के गठन होने की संभावना है। यह वो सरकार होगी, जिसके लिए जम्मू कश्मीर में कुल 64% लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया है और अंतिम दौर में आते-आते इनकी संख्या 70% को छू चुकी है। सवाल है कि जब जम्मू और कश्मीर के लोग खुद ही अपनी सरकार चुन रहे हैं, फिर हुर्रियत के नेता किस बातचीत का ज्ञान दे रहे हैं?

फिर से भावनाएं भड़काने की कोशिशों में लगा हुर्रियत?
असल में लगता है कि जम्मू और कश्मीर में ऐतिहासिक रूप से शांतिपूर्ण और सफल चुनावों ने हुर्रियत जैसे संगठनों के नेताओं की नींदें उड़ा दी हैं। उन्हें लगता है कि पहले आर्टिकल 370 के खात्मे के साथ ही वह अप्रासांगिक हो चुके थी और अब लोकतंत्र की जीत ने उनकी अलगाववादी दुकान पर ताला लगा दिया है। इसलिए वे लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल होने के के डर से फिर से लोगों की भावनाओं को भड़काने की कोशिशों में दिख रहे हैं।

मीरवाइज को मौका मिला था और इस दौरान वे कह रहे थे, 'हुर्रियत कांफ्रेंस का विश्वास है कि दमन, हिंसा और बंदूकों से इस मुद्दे का समाधान नहीं हो सकता, बल्कि उचित बातचीत की प्रक्रिया से हो सकता है। हुर्रियत ने कभी भी हिंसा की वकालत नहीं की। हमारे बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन किसी के प्रति कोई बैर नहीं है। हम इस प्रक्रिया में हमारा सहयोग देने के लिए तैयार हैं।' 'सरकार को अपनी नीति पर पुनर्विचार करना होगा, क्योंकि बार-बार हिरासत में लेने वाली नीति से हम नहीं रुकेंगे।'

मीरवाइज ने एक तरह से चेतावनी देते हुए कहा है कि बीजेपी जिसे 'नया कश्मीर' की बात कहती है, उसे जमीनी हालात से समझौते की तरह नहीं पेश किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, 'लोग पुलिस और दूसरी एजेंसियों के हाथों सबसे बुरे परिणामों के डर से सच बोलने से डरते हैं....हमारी धार्मिक और राजनीतिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया है, जबकि जम्मू-कश्मीर के लोग पर्यटकों और यात्रियों के सबसे अच्छे मेजबान रहे हैं...'

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