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Jammu Kashmir Chunav: अंतिम दौर में जम्मू की 24 सीटों पर वोटिंग, BJP के सामने क्या है बड़ी चुनौती?

Jammu Kashmir Chunav 2024: जम्मू कश्मीर विधानसभा के अंतिम चरण के चुनाव में अकेले जम्मू की 24 सीटों पर मंगलवार (1 अक्टूबर, 2024) को मतदान होना है। ये किसी भी चरण की सबसे ज्यादा सीटें हैं। इस दौर में बीजेपी का बहुत कुछ दांव पर लगा है, क्योंकि पार्टी जम्मू डिविजन में ही मजबूत मानी जाती है। लेकिन, इस बार उसके सामने यहां कई चुनौतियां भी नजर आ रही हैं।

जम्मू कश्मीर में पहली बार अपने दम पर सरकार बनाने का मंसूबा देख रही बीजेपी को जम्मू की 43 सीटों से ही ज्यादा उम्मीदें हैं। कश्मीर डिविजन की 47 सीटों में अभी तक उसे खाता खोलने का भी इंतजार है। इसलिए, वहां वह कितनी सीटें जीत पाएगी, यह चुनाव विश्लेषकों के लिए भी बड़ा सवाल है।

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जम्मू में बीजेपी मजबूत है, लेकिन चुनौतियां भी बड़ी हैं
जम्मू की वजह से यह माना जा रहा है कि भाजपा केंद्र शासित प्रदेश की पहली विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है। लेकिन, यह विधानसभा का चुनाव है, जिसमें कई सारे मुद्दे लोकसभा से अलग हैं। इसलिए जम्मू के क्षेत्र में भी भारतीय जनता पार्टी के सामने इस बार बड़ी चुनौतियां नजर आ रही हैं।

अनुच्छेद- 370 हटना जम्मू में बीजेपी के लिए प्रभावी मुद्दा
जम्मू-कश्मीर से विवादित अनुच्छेद-370 हटने के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव है और निश्चित रूप से यह मुद्दा यहां भाजपा के हक में जाता दिखाई दे रहा है। हालांकि, जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म हुए पांच साल से ज्यादा गुजर चुके हैं, लेकिन जम्मू के लोगों के दिलों में इसके पक्ष में भावना अभी भी बरकरार है।

अनुच्छेद-370 की वजह से पहले यहां सत्ता का झुकाव कश्मीर की ओर था। लेकिन, उसके हटने के साथ ही जम्मू का दर्जा भी उसी के समान अनुभव होने लगा है। यह भावना यहां के लोगों में अब भी है और इससे कोई इनकार नहीं कर सकता।

बेरोजगारी और 'बाहरियों' का मुद्दा भाजपा को कर सकता है परेशान
लेकिन, कुछ ऐसे पहलू भी हैं, जो भारतीय जनता पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। इसमें बेरोजगारी के मुद्दे के साथ-साथ 'बाहरियों' का मुद्दा तो है ही, हाल के दिनों आतंकवाद की घटनाओं ने भी वोटरों की चिंताएं बढ़ाने का काम किया है। अन्य राज्यों की तरह ही यहां भी अग्निवीर का मसला बीजेपी को परेशान कर सकता है।

विपक्ष उठा रहा है अग्निवीर का भी मुद्दा
मसलन, जम्मू के आरएस पुरा से पीडीपी प्रत्याशी नरेंद्र शर्मा ने ईटी से कहा है, 'पहले, सेना में भर्ती के लिए सुबह में सड़कों पर बहुत सारे लड़के दौड़ लगाते दिखते थे। आज आप मुश्किल से किसी युवा को ऐसा करते देखेंगे। अग्निवीर बनने के प्रति कोई खास दिलचस्पी नहीं है।' जम्मू की बहुत लंबी सीमा पाकिस्तान के साथ लगती है और इस वजह से सेना में भर्ती होना, यहां के युवाओं का प्रमुख लक्ष्य रहा है।

2019 के बाद निचले-वर्ग की सरकारी नौकरियां देने में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद पर लगाम तो लग गया है। लेकिन, इसके चलते भी युवाओं का एक वर्ग नाराज है। क्योंकि, अब 'बाहर से आने वाले' लोग भी इन नौकरियों के लिए योग्य बन गए हैं। स्थानीय लोगों का यह भी दावा है कि मुश्किल से तो भर्तियां निकलती हैं। जबकि, अब अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए भी आरक्षण लागू होने से उन्हें फायदा मिलने की संभावना है।

'बाहर से आ रहे लोगों' को लेकर भी दिख रही है एक चिंता
जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म होने से एक बदलाव ये हुआ है कि अब केंद्र शासित प्रदेश के बाहर के लोग भी यहां जमीन खरीद सकते हैं और कारोबार कर सकते हैं। कश्मीर का इतिहास अभी भी लोगों के दिमाग में ताजा है, इसलिए दिल्ली, पंजाब, हिमाचल और दूसरे राज्यों के लोग जम्मू में ही कारोबार शुरू कर रहे हैं या उद्योग लगा रहे हैं।

कठुआ, सांबा, जम्मू और उधमपुर में कुछ फैक्ट्रियां लगी भी हैं, लेकिन कौशल की कमी की वजह से स्थानीय लोगों को बहुत ही मामूली रोजगार ही मिल पा रहा है।

बीजेपी इन दावों से कर रही है इनकार
एक उद्योगपति और भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अरूण गुप्ता का कहना है, 'विशेष दर्जा खत्म होने के बाद लोगों की उम्मीदें बहुत ही ज्यादा हैं। कारोबार में लालफीताशाही, कनेक्टिविटी की कमी और बहुत ज्यादा बिजली बिल जैसे मुद्दे वास्तविक हैं.....लोग लोकप्रिय सरकार चाहते हैं। शुरुआत में यह आशंका थी कि उनकी नौकरियां और जमीन बाहरी लोगों के पास चली जाएंगी, लेकिन देश के बाकी हिस्सों में भी उनके लिए समग्र रूप से रास्ते भी खुले हैं।'

दरबार सिस्टम खत्म होना भी हो सकता है मुद्दा
जम्मू को लेकर बीजेपी के सामने एक और चुनौती है। पहले यहां दरबार व्यवस्था लागू थी। जिसमें सर्दियों में राजधानी श्रीनगर से जम्मू शिफ्ट हो जाती थी। इसकी वजह से हजारों सरकारी कर्मचारियों को करीब 6 महीनों के लिए जम्मू में किराए का मकान लेना पड़ता था। इससे जम्मू की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती थी। लेकिन, अब यह व्यवस्था बंद हो गई है।

वैसे नगरोटा से बीजेपी प्रत्याशी देवेंद्र राणा का मानना है, 'यह बहस का मुद्दा है। इसे जम्मू की अर्थव्यवस्था से इसलिए जोड़ा जा रहा है, क्योंकि जब दरबार यहां शिफ्ट होगा तो अधिकारी भी यहां ट्रांसफर होंगे....लेकिन आज भी, सर्दियों में कश्मीर से लोग यहां आते हैं। अफसरों की संख्या तो बहुत कम है। परिवार भी यहां आते हैं।'

कटरा तक सीधी ट्रेन सेवा शुरू होने से भी जम्मू के लोगों पर असर
एक और बदलाव हुआ है, जो बीजेपी को चिंतित कर सकता है। अब माता वैष्णो देवी की यात्रा पर आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए सीधे कटरा तक की ट्रेन सेवा उपलब्ध हो गई है। मतलब, उन्हें पहले की तरह जम्मू आने की आवश्यकता नहीं रही। इससे भी जम्मू के लोगों की आमदनी पर काफी असर पड़ा है।

आतंकवाद की घटनाओं को विपक्ष ने बनाया मुद्दा
ऊपर से हाल के महीनों में जिस तरह से जम्मू के इलाके में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद में बढ़ोतरी हुई है, उससे एक नई चिंता पैदा हुई है। कांग्रेस, पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस इसे मुद्दा बनाने से नहीं चूक रहे हैं, लेकिन भाजपा के अपने तर्क हैं।

राणा कहते हैं, 'आतंकवाद पर काफी हद तक लगाम लग चुका है। पिछले दिनों आतंकवाद से जुड़ी कुछ गतिविधियां हुई हैं। पाकिस्तान यहां आतंकवाद भड़काना चाहता है। पहले भी यहां आतंकवाद की ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं....रघुनाथ मंदिर, कालुचक मिलिट्री स्टेशन और अन्य इलाकों में। जब उन्होंने देखा कि कश्मीर में आतंकवाद खत्म हो रहा है तो उन्होंने चुपके से लोगों को अंदर घुसाने की कोशिशें शुरू कर दीं। आतंकवाद को नियंत्रित करने में सुरक्षा बल सक्षम हैं।'

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