Rajasthan News: विधानसभा चुनाव में मुद्दों की जगह जातीय समीकरणों का बोलबाला, जानिए जातियों की सियासी गणित
Rajasthan News: राजस्थान में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान में कुछ घंटों का समय बचा है। प्रदेश में आज शाम 5 बजे से चुनाव प्रचार थम जाएगा। विधानसभा चुनाव में इस बार मुद्दों के बजाय जातीय समीकरणों का बोलबाल है। सभी प्रमुख दलों ने इस बार टिकट वितरण में जातीय समीकरणों का भी पूरा ध्यान रखा है। कांग्रेस और भाजपा भी चुनाव के मुद्दों की जगह जातीय समीकरणों पर फोकस कर रही है। पीएम मोदी ने बुधवार को कोटड़ी में सचिन पायलट को बहाने गुर्जर समाज पर जिस तरह जातीय कार्ड खेला है। उससे साफ हो गया है कि प्रदेश में विधानसभा चुनाव में जातीय समीकरण पूरी तरह भूमिका निभा रहे हैं। ऐसा भी कहा जा सकता है कि विधानसभा चुनाव जातीय समीकरणों तक सिमट कर रह गया है। प्रदेश के सभी प्रमुख दल जाट, राजपूत, गुर्जर और दलितों तक सिमित रह गए हैं। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक नारायण बारेठ ने वन इंडिया हिंदी से बात करते हुए कहते हैं कि लोकतंत्र में जब विकास का कोई मुद्दा नहीं रहता है। तब वे लोग धर्म और जातियों की बात करते हैं। जब धर्म को शामिल किया जाता है तो जाति भी साथ ही आ जाती है। चुनाव में दोनों की अपनी अहमियत है। वे कहते हैं कि जाति और धर्म का इस्तेमाल जब किया जाता है। जब उनके पास कोई अच्छाई, सच्चाई या मुद्दा नहीं हो। जातियों का विभाजन दुर्भाग्यपूर्ण है। समाज वर्गों में विभाजित हो तो फिर भी ठीक है। इससे सामूहिकता और समावेश की भावना आती है। वे कहते हैं राजनीतिक व्यवस्था में जातीय समीकरणों का दखल नुकसानदायक है। राजनीतिक दल इसे प्रोत्साहित कर रहे हैं।
चुनाव मैदान में जातीय समीकरणों का दबदबा
राजस्थान की विधानसभा चुनाव में जातीय समीकरणों का दिख रहा है। पार्टियों ने प्रदेश में जातीय समीकरणों के आधार पर ही टिकट वितरण किया है। जिस क्षेत्र में जिस जाति के ज्यादा मतदाता है। उसी के अनुसार उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे गए हैं। राजस्थान में सबसे ज्यादा जाट राजपूत और गुर्जर जाति का बोलबाला है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जाट समुदाय के 36 और भाजपा ने 33 प्रत्याशी, राजपूत समाज से कांग्रेस ने 17 और भाजपा ने 25 उम्मीदवार, गुर्जर समुदाय से कांग्रेस ने 11 और भाजपा ने 10 उम्मीदवार, मुस्लिम समुदाय से कांग्रेस ने 15 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं। भाजपा ने राजस्थान में एक भी मुस्लिम दावेदार को टिकट नहीं दिया है।

जाट राजपूत समुदाय का सियासी दखल
राजस्थान की विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा जाट और राजपूत समाज का दखल देखा जाता है। राजस्थान में जाटों की आबादी करीब 14 फीसदी मानी जाती है। जाट समुदाय को सबसे बड़ा वोट बैंक माना जाता है। इसके साथ ही राजपूत समुदाय का भी राजनीतिक वर्चस्व जाटों के बराबर रहा है। प्रदेश में इन दोनों जातियों के बीच सत्ता को लेकर संघर्ष चलता रहता है। राजपूत वोट बैंक भैरों सिंह शेखावत के समय से भाजपा का माना जाता है। लेकिन वसुंधरा राजे के कार्यकाल में राजपूतों में आनंदपाल प्रकरण, दीया कुमारी की संपत्ति का विवाद, जसवंत सिंह के मुद्दे को लेकर नाराजगी सामने आई थी। लेकिन पार्टी ने इस विधानसभा चुनाव में राजपूतों को अपने पक्ष में लेने के लिए ज्यादा टिकट दिए हैं। वही राजस्थान में जाट समुदाय भी निर्णायक मतदाता माना जाता है। जहां दोनों सीटों पर जाट प्रत्याशी खड़े हैं। वहां का मतदाता यह देखता है कि कौन से दल का जाट चुनाव जीत रहा है। उसके पक्ष में मतदान करते हैं। वहीं गैर जाट प्रत्याशियों के खिलाफ यह समुदाय खुलकर मतदान करता है। वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ बताते हैं कि राजनीतिक पार्टियों इवेंट कंपनियों में बदल गई है। जातीय संगठन महत्वपूर्ण हो गए हैं। वे फतवा देते हैं। आदेश देते हैं और राजनीतिक पार्टियों उनके पालना करती है। इसके लिए जातियां जिम्मेदार नहीं है। राजनीतिक दल जिम्मेदार है। अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए राजनीतिक दल जातियों को हावी कर रहे हैं।
पायलट को लेकर गुर्जरों की नाराजगी
राजस्थान में गुर्जर समुदाय की सबसे बड़ी नाराजगी सचिन पायलट को मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने को लेकर है। इससे पहले गुर्जर समुदाय आरक्षण को लेकर एकजुट था। लेकिन राजस्थान की सियासत में सचिन पायलट की एंट्री के बाद यह समुदाय चाहता था कि सचिन पायलट प्रदेश के मुख्यमंत्री होंगे। साल 2018 में सचिन पायलट पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। राजस्थान में कांग्रेस उन्हें की मेहनत के बूते सत्ता में आई थी। लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। इसे लेकर गुर्जरों में कांग्रेस से नाराजगी है। वैसे गुर्जर समुदाय भाजपा का परंपरागत वोट रहा है। लेकिन सचिन पायलट की वजह से भाजपा के सारे गुर्जर प्रत्याशी चुनाव हार गए थे। गुर्जरों ने खुलकर कांग्रेस को वोट किया था। अब गुर्जर मतदाता कांग्रेस से नाराज बताए जा रहे है। माना जा रहा है कि इस चुनाव में राष्ट्रीय या प्रदेश स्तर पर कोई बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया है। इसलिए हर सीट पर पार्टियां और निर्दलीय उम्मीदवार जातीय गणित बिठाने में लगे हुए हैं। जिसका गणित मजबूत होगा। वही सत्ता में आने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।












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