Ghasiram Verma : 95 वर्षीय वो करोड़पति फकीर जो बेटियों की पढ़ाई पर हर साल खर्च करते हैं 50 लाख रुपए
झुंझुनूं, 1 अगस्त। राजस्थान में डॉ. घासीराम वर्मा का नाम ही काफी है। हर कोई जानता है कि ये वो करोड़पति फकीर हैं जो बेटियों की शिक्षा पर करोड़ों रुपए खर्च करते हैं। कई दशक पहले शुरू हुआ यह सिलसिला अब भी जारी है। घासीाराम वर्मा जाने-माने गणितज्ञ हैं। अमेरिका में रहते हैं। डॉलर में पेंशन पाते हैं। उसी में से बेटियों की शिक्षा पर खर्च करते हैं।

घासीराम वर्मा ने अपना 95वां जन्मदिन मनाया
एक अगस्त 2022 को डॉ. घासीराम वर्मा ने अपना 95वां जन्मदिन मनाया है। इस पर मौके पर झुंझुनूं की करीब दो दर्जन संस्थाओं ने सामुदायिक भवन में घासीराम वर्मा का नागरिक अभिनंदन किया। वर्मा ने कहा कि अब वो स्थायी रूप से झुंझुनूं में ही रहेंगे। इससे पहले अमेरिका रहा करते थे। साल में दो-तीन माह के लिए हर साल भारत आते थे। फिर वापस चले जाते थे।

हर माह साढ़े सात लाख की पेंशन
इन पर पुस्तक लिख रहे माणक मणि मोट ने बताया कि डॉ. घासीराम वर्मा को सालभर में करीब एक करोड़ रुपए पेंशन और निवेश से आय होती है। इसमें से ये 50 लाख रुपए बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने में खर्च करते हैं। खास बात यह है कि यह राशि वो अपनी सरजमीं राजस्थान में खर्च करते हैं। उन्हें हर माह करीब साढ़े सात लाख रुपए पेंशन के मिलते हैं।

गांव सीगड़ी के रहने वाले हैं डॉ. घासीराम वर्मा
घासीराम वर्मा मूलरूप से झुंझुनूं के गांव सीगड़ी के रहने वाले हैं। 1 अगस्त 1927 को चौधरी लादूराम तेतरवाल व जीवणीदेवी के घर डॉ. घासीराम वर्मा का जन्म हुआ। इंटर पास करते ही घरवालों ने आखातीज के अबूझ सावे पर गांव नयासर के गंगारामजी की बेटी रूकमणि से इनकी शादी कर दी। इनके तीन बेटे ओम, सुभाष और आनंद हैं।

अमेरिका में 64 साल गुजारे
बता दें कि गणितज्ञ डॉक्टर वर्मा ने 64 साल अमरिका में गुजारे हैं। वहां विवि में गणित के प्रोफेसर के रूप में नौकरी करते रहे। सेवानिवृ्त्ति के बाइस साल बाद अब स्थायी रूप से झुंझुनूं रहने आ गए हैं। डॉक्टर वर्मा ने अमरिका में खुरांट इंस्टीट्यूट गणित-विज्ञान संस्थान से काम की शुरुआत की और 1960 में चार हजार रुपए (भारतीय मुद्रा) प्रतिमाह के वेतन पर हार्दम यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के रूप में ज्वाइन किया था।

पिलानी बिट्स में निशुल्क पढ़ाया
साल 1964 में अमरिका के रोडे आइलैंड यूनिवर्सिटी में 11 हजार डॉलर के वेतन पर एसोसिएट प्रोफेसर बन गए। नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन में कंसलटेंट के रूप में कार्य किया। वहां इंजीनियरिंग जैसे विषयों पर रिसर्च भी किया। इसलिए उन्हें नेवी के प्रोजेक्ट में नौकरी भी मिली। डॉक्टर वर्मा वर्ष 2000 में अमरिका में वहां की नौकरी से सेवानिवृत्त हुए, लेकिन इस दौरान जब वे वर्ष 1971, 1978, 1985 तथा 1993 में चार बार सेबेटिकल अवकाश मिलने पर भारत आए तो पिलानी बिट्स में भी पढ़ाया, लेकिन यहां पढ़ाने का एक रुपया भी नहीं लिया। संस्थान द्वारा रहने का आवास निशुल्क दिया गया, लेकिन बिजली का बिल मैंने खुद दिया।

घासीराम वर्मा की शिक्षा व जीवन संघर्ष
मीडिया से बातचीत में घासीराम वर्मा कहते हैं कि गांव सीगड़ी में स्कूल नहीं होने के कारण 5 किलोमीटर दूर पड़ोस के गांव वाहिदपुरा के निजी स्कूल से शुरुआती शिक्षा प्राप्त करने जाया करता था। आगे की पढ़ाई पिलानी से पूरी की। वहां छात्रावास में रहा। दसवीं की परीक्षा के बाद छुटि्टयों में गांव नहीं जाता और छात्रावास में ही रहकर चार-पांच बच्चों को टयूशन करवाया करता था। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीए और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एमए किया।
1958 में आया अमेरिका से बुलावा
भारत में उच्च हासिल करने के बाद जून 1958 में घासीराम वर्मा के पास अमेरिका से बुलावा आया। पत्नी रुकमणि के साथ घासीराम वर्मा अमेरिका पहुंचे। अमेरिका में रोडे आयलैंड यूनिवर्सिटी को गणित के प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दी। तब अमेरिका के विश्वविद्यालय में गणित पढ़ाने वाले घासीराम वर्मा पहले भारतीय थे। उस समय इन्हें 400 डॉलर तनख्वाह मिला करती थी।












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