Navratri 2022: इस मंदिर में चढ़ता है देवी को चश्मा, जानिए कहां है यह अनोखा स्थान
नवरात्रि में देवी भक्त अलग -अलग मंदिरों में माता आदिशक्ति के पूजन और दर्शन के लिए पहुंचेंगे। धार्मिक तौर पर बेहद संपन्न भारत में ऐसे कई देव स्थान हैं,जहां की अपनी अनोखी मान्यताएं हैं। हम आज आपको छत्तीसगढ़ के बस्तर के ऐसी
जगदलपुर, 23 सितंबर। पितृ पक्ष की समाप्ति के बाद नवरात्रि का उत्सव शुरू हो रहा है। इस दौरान सम्पूर्ण भारत वर्ष में देवी भक्त अलग -अलग मंदिरों में माता आदिशक्ति के पूजन और दर्शन के लिए पहुंचेंगे। धार्मिक तौर पर बेहद संपन्न भारत में ऐसे कई देव स्थान हैं,जहां की अपनी अनोखी मान्यताएं हैं। हम आज आपको छत्तीसगढ़ के बस्तर के ऐसी देवी धाम के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं,जहां भक्त माता को चुनरी या श्रृंगार ही नहीं,बल्कि चश्मा भी चढ़ाते हैं।

देवी को चढ़ाते हैं चश्मा, आदिकाल से चली आ रही है मान्यता
नवरात्रि के नौ दिनों तक देवी मंदिरों में भक्तों का तांता लगा रहता है। अगर आप भी छत्तीसगढ़ में हैं और अपनी किसी मनोकामना की पूर्ति के लिए किसी देवी दरबार में जाना चाहते हैं, तो हम आपको सिद्ध देवी धाम के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं। यह स्थान छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर में स्थित है। स्थानीय लोगों की ऐसी मान्यता है कि देवी से जो मांगो वह मुराद पूरी होती है। भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने के बाद उन्हें काला चश्मा चढ़ाते हैं। भक्तो के बीच यह मान्यता आदिकाल से चली आ रही है या शायद तब से जबसे बस्तर के आदिवासी चश्मे को जान पाए होंगे।

3 सालों में होती जात्रा, जंगलो की रक्षा करती हैं देवी बास्ताबुंदिन
दरअसल घने जंगलो से घिरे आदिवासी अंचल बस्तर जिले के कोटमसर गांव में हर 3 बरस के अंतराल में देवी बास्ताबुंदिन की जात्रा होती है। कांगेर वैली नेशनल पार्क के दायरे में आने वाले इस गांव में देवी माता को चश्मा चढाने की मान्यता है। भक्त देवी को चश्मा चढ़ाकर जंगलों के हरे भरे रहने , अकाल से दूर रखने और सुख शांति की कामना करते हैं। दरअसल आदिवासी संस्कृति में जंगल ही जीवन यापन का मुख्य आधार होता है। आदिवासियों में मन जाता है कि ईश्वर ने उन्हें वरदान के तौर पर जंगल भेंट किया है।वह उसकी रक्षा करना अपना फर्ज समझते हैं।

बुरी नजर से बचाती हैं देवी, चढ़ाइए नजर का चश्मा
ग्रामीणों का मानना है कि किसी व्यक्ति को बुरी नजर से बचाने में भी देवी माता मदद करती हैं। बुरी नजर से बचाव के लिए भी ग्रामीण बास्ताबुंदिन देवी को नजर का चश्मा भी भेंट करते हैं। बरसों से चली आ रही इस मान्यता को स्थानीय ग्रामीणों के अलावा बस्तर के बाहर से आने वाले देवीभक्तों ने भी अपना लिया है। हर साल नवरात्री के समय दूर दूर से भक्त माता बस्ताबुंदिन माता के दर्शन करने आते हैं।

अपने साथ ले जाते हैं ग्रामीण चश्मा , गांव की परिक्रमा करती हैं देवी
कांगेरवैली के ग्रामीण बताते हैं कि आदिकाल में इस मंदिर में पहले एक ही परिवार के लोग ही पूजा अर्चना करते थे,लेकिन बीते कुछ वर्षों में बाकि ग्रामीणों ने भी अपना लिया है। मंदिर के पुजारी जीतू के मुताबिक माता के दरबार में दूर दूर से भक्त पहुंचकर उन्हें चश्मा चढ़ाते हैं। देवी को चढाने के बाद भक्त चश्मे अपने साथ ले जाते हैं। उन्होंने बताया कि नवरात्री के समय भरने वाले मेले के दूसरे दिन देवी को चश्मा पहनाकर पूरे गांव की परिक्रमा करवाई जाती है,ताकि माता अपने बच्चों को देखकर सकें और उन्हें आशीर्वाद दे सकें।

भोपाल में भी है अनोखा मंदिर, देवी को चढ़ाई जाती हैं चप्पलें
बस्तर की तरह ही मध्यप्रदेश के भोपाल में भी इसी तरह की अनोखी मान्यता वाला मंदिर है। यहां कोलार क्षेत्र में मां पहाड़ा देवी का मंदिर है। इस मंदिर में दुर्गा देवी बाल स्वरुप में विराजित हैं। इसी कारण भक्त देवी को मां के अलावा बेटी स्वरूप में पूजते हैं।
इस मंदिर में मान्यता है कि भक्त चढ़ावे के लिए चप्पल लेकर पहुंचते हैं। देवी प्रतिमा के चरणों में भेंट करते हैं। माना जाता है कि मन्नत पूरी होने पर भी भक्त जूते चप्पल चढ़ाते हैं। दरअसल इस मंदिर में देवी बाल स्वरूप में हैं इसलिए भक्त उन्हें फ्रॉक,चश्मे, सैंडिल्स के अलावा वही सब चढ़ाते है,जो बच्चों को पसंद हैं।
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