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कमाल की है ये स्कूटी वाली मैडम, जिस स्कूल को सरकार कर रही थी बंद, उसे कर दिया जिंदा

बैतूल, 06 अगस्त: जब चने थे तब दांत न थे, जब दांत हुए तब चने नहीं हिन्दी की इस प्रसिद्ध कहावत की हकीकत का आपने कई बार सामना किया होगा। लेकिन मप्र के बैतूल की एक सरकारी टीचर ने जो कमाल किया, उसने ऊपर लिखी पूरी इबारत को ही बदल दिया। पढ़ाई के लिए बच्चों की पर्याप्त संख्या न होने से जिस गांव के स्कूल को सरकार बंद करने का फैसला ले चुकी थी, उस स्कूल की अरुणा महाले ने तस्वीर ही बदल दी। यह कैसे संभव हुआ, जानिए इस 'स्कूटी वाली मैडम' के कमाल की इस खबर में...

कौन है अरुणा महाले ?

कौन है अरुणा महाले ?

बैतूल जिले की रहने वाली इस टीचर का नाम अरुणा महाले है। इनकी कोई भी संतान नहीं है। शहर से दूर भैंसदेही का धुड़िया गांव पड़ता है। जहां इनकी पोस्टिंग है। स्कूल पहुंचने का रास्ता बेहद दुर्गम, कि हर रोज समय से पहुंचने में अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाए। लेकिन इनके लिए घर-परिवार की तरह ही स्कूल भी उतनी ही अहमियत रखता है। जब तक कोई कठिन हालात नहीं बनते, तब तक यह स्कूल से छुट्टी भी नहीं लेती है।

स्कूल था, लेकिन उसमें पढ़ने वाले बच्चे नहीं

स्कूल था, लेकिन उसमें पढ़ने वाले बच्चे नहीं

अरुणा ने जब यहां स्कूल ज्वाइन किया, तो सिर्फ नाम के लिए गिनती के पढ़ने वाले बच्चे रहे। समय बीता तो धीरे-धीरे उन बच्चों की संख्या में और गिरावट आ गई। इसकी सबसे बड़ी वजह थी, स्कूल से गांव की दूरी और आवाजाही का ख़राब रास्ता। न तो बच्चों को गांव से दो किलोमीटर दूर स्कूल जाना पसंद आता था और न ही उनके माता-पिता चाहते थे कि इतनी परेशानियों में उनका बच्चा स्कूल पढ़ने जाए।

जब अरुणा बन गई ‘स्कूटी वाली मैडम’

जब अरुणा बन गई ‘स्कूटी वाली मैडम’

वक्त गुजरता गया। बच्चों के बिना जब स्कूल वीरान सा हो गया तो फिर अरुणा ने वो काम किया, जिसके बारे में कोई सोच नहीं सकता। अपनी स्कूटी से वह बच्चों को घर से स्कूल लाने ले जाने लगी। शुरुआत में स्कूटी में तीन-चार जितने बच्चे बनते थे, उन्हें वह बैठाकर स्कूल ले जाती थी। स्कूटी वाली मैडम को देख गांव के अन्य लोग आकर्षित हुए और वह भी धीरे-धीरे बच्चों को मैडम के साथ भेजने तैयार हो गए। अरुणा इसके लिए घर से जल्दी निकलती और फिर गांव के बच्चों को स्कूल तक ले जाने तीन-चार फेरे लगाना शुरू कर दिया।

अब करीब 20 बच्चों को रोज ले जाती है

अब करीब 20 बच्चों को रोज ले जाती है

अरुणा की सोच और मेहनत रंग लाई। वह आज लगभग 20 बच्चों को उनके घर से हर रोज स्कूल लाने, वापस घर पहुँचाने की जिम्मेदारी उठाती है। जिन ग्रामीणों के बच्चे इस टीचर के साथ स्कूल जाते है, उनके लिए अरुणा फ़रिश्ते से कम नहीं है। अरुणा बताती है कि इसी स्कूल को सरकार ने बच्चों की कमी के चलते बंद करने का फैसला ले लिया था, आज इस स्कूल की वीरानगी खत्म हो रही है। अरुणा की मेहनत से बच्चों की संख्या 100 के करीब पहुंच गई है। अब यह टीचर गांव में 'स्कूटी वाली मैडम' के रूप में पहचानी बना चुकी है।

अरुणा इन्ही बच्चों को मानती है, अपना बेटा-बेटी

अरुणा इन्ही बच्चों को मानती है, अपना बेटा-बेटी

दूसरों के लिए प्रेरणा बनी अरुणा कहती है कि उनकी भले ही संतान नहीं है, लेकिन ईश्वर ने उन्हें जिस काम के लिए चुना, उसमें उनका परिवार पूरा हो गया। वह स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को ही अपनी संतान मानने लगी है। सगे बेटे-बेटियों की तरह इन बच्चों की कमियों की पूर्ति करने में जरा भी नहीं हिचकती। पढ़ाई लिखाई से संबंधित यदि किसी बच्चे को कोई जरुरत होती है, वह अगले दिन खरीदकर लाती है। आज स्कूल के पास वाले गांव में जब बच्चों के पढ़ने की ललक बढ़ी तो, उन्होंने एक गेस्ट टीचर भी रख लिया है। उसकी तनख्वाह वह खुद अपने पास से देती है।

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