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Raj Kapoor: बॉलीवुड के अनाड़ी, 420 की जबलपुर में बसी यादें, राज कपूर को जब लोग कहते थे 'दामाद'

Raj Kapoor memories: हिंदी सिनेमा का वो चमकता सितारा आज भले ही इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उसकी यादों की गंगा, नर्मदा किनारे जबलपुर में आज भी बहती है। ये वही शहर है जहां लोग, राजकपूर को शहर का 'दामाद' कहते थे।

Raj Kapoor memories when came to jabalpur Film shooting in Bhedaghat

Raj Kapoor memories: हिन्दी सिनेमा के सबसे बड़े शो मेन राज कपूर पुराने जमाने की फिल्म इंडस्ट्री के नगीना थे। अपने देश ही नहीं चीन और रूस तक में लोकप्रिय रहे राज कपूर का नर्मदा किनारे बसे जबलपुर से विशेष लगाव था। आपको बताते है कि राज कपूर खुद को संस्कारधानी का दामाद क्यों बताते थे।

जबकि राज कपूर की 1946 में राय कर्तारनाथ की बेटी और प्रेमनाथ की बहिन कृष्णा से विवाह रीवा में हुआ था। राय कर्तारनाथ और उनके बेटे प्रेमनाथ ने जबलपुर में एम्पायर टॉकीज को स्थापित किया था। इसी एम्पायर टॉकीज से लगा हुआ नाथ परिवार का बंगला था।

जबलपुर के लेखक और जानकार पंकज स्वामी बताते हैं कि यह बंगला ही राज कपूर की ससुराल थी। कृष्णा और राज कपूर दोनों के परिवार पेशावर से रीवा, जबलपुर और मुंबई आए थे। कृष्णा बच्चों के साथ छुट्टी में जबलपुर आती थीं। शादी के बाद राज कपूर का जबलपुर गहरा लगाव हो गया हो गया था।

Raj Kapoor memories

कृष्णा अपने पांचों बच्चों रणधीर, रीतू, ऋष‍ि, रीमा और राजीव को लेकर गर्मियों-सर्द‍ियों की छुट्टी में अक्सर जबलपुर आया करती थीं। राज कपूर का जबलपुर प्रवास विशेष कुछ मौकों जैसे राय कर्तारनाथ और प्रेमनाथ के परिवार में विवाह अवसर पर होता था।

Raj Kapoor memories

पांचवे दशक में नाथ परिवार में एक विवाह के अवसर पर राज कपूर के साथ उनके छोटे भाई शम्मी कपूर भी जबलपुर में एम्पायर टॉकीज के बंगले में आए थे। दोनों भाईयों ने नाथ परिवार के विवाह में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेकर मेहमानों का स्वागत किया था। बाद में राज कपूर लोगों से गर्व से कहते थे कि वे तो जबलपुर के दामाद हैं।

raj kapoor

मुंबई जाती थी खोवे की जलेबी
कृष्णा छुट्ट‍ियों के बाद जब जबलपुर से वापस मुंबई जाती थीं तब परंपरा के अनुसार उनके साथ मायके वाले काफी कुछ सामान रखते थे। उनमें जबलपुर की प्रसिद्ध खोवे की जलेबी भी हुआ करती थी। राज कपूर मीठे के कम शौकीन थे। लेकिन एक खोवे की जलेबी वे अवश्य खाते थे।

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जब लता को भी कृष्णा ने खिलाई थी जलेबी
पंकज स्वामी ने बताया कि कृष्णा एक बार खोवे की जलेबी लेकर आरके स्टूड‍ियो पहुंची। उस समय एक गाने को लेकर राज कपूर और लता मंगेशकर के बीच गंभीर विचार विमर्श हो रहा था। लता मंगेशकर कृष्णा कपूर को भाभी कहती थीं। कृष्णा कपूर ने लता मंगेशकर को भी खोवे की जलेबी पेश की। संभवत: लता मंगेशकर ने अपने जीवन में पहली और आखि‍री बार जबलपुर की खोवे की जलेबी खायी तो वे आनंद से भर गईं।

Raj Kapoor memories

नर्मदा के प्रति आस्था
राज कपूर ने जबलपुर प्रवास के दौरान प्रेमनाथ के साथ नर्मदा तट के सुंदर दृश्यों को निहारा था। नर्मदा के दर्शन से वे कृत कृतार्थ हो गए थे। नर्मदा के प्रति उनकी आस्था जाग गई थी। उस समय भेड़ाघाट उन्हें ऐसा भाया कि उन्होंने वर्ष 1960 में आरके बैनर की 'जिस देश में गंगा बहती' के एक गाने का दृश्यांकन भेड़ाघाट की संगमरमरी चट्टानों में किया। इस दृश्य में साउथ की पद्म‍िनी पर एक गाना 'ओ बंसती पवन पागल' फिल्माया था। गाने को लता मंगेशकर ने शंकर-जयकिशन के मधुर संगीत में पूरी तन्यमता के साथ गाया था।

फिल्म से भी फेमस हुआ जबलपुर का भेड़ाघाट
पंकज बताते है कि राज कपूर के गाने की शूटिंग के बाद वह पहला मौका था जब मुंबई की किसी फिल्म में भेड़ाघाट की सुंदरता को देश-विदेश में लोगों ने देखा था। राज कपूर की खासियत थी कि वे अपनी किसी भी फिल्म की धुन को वर्षों बाद पूरे गानों में उपयोग करते थे। ऐसे ही कई विषय उनके दिमाग वर्षों तक घूमते रहते थे और समय आने पर वे उन्हें फिल्म का विषय बना कर प्रस्तुत करते थे। भेड़ाघाट में 'जिस देश में गंगा बहती' के गाने को शूट करते वक्त राज कपूर के मन में नदियों को लेकर विचार तैरने लगे थे।

नर्मदा को फोकस कर फिल्म बनाने का था विचार
आठवें दशक की शुरुआत में राज कपूर ने गंगा नदी को केन्द्रि‍त कर 'राम तेरी गंगा मैली' बनाई थी। 'सत्यम श‍िवम सुंदरम' में उन्होंने कथा सूत्र में नदी और उसकी बाढ़ को चित्रित किया था। राज कपूर की योजना थी कि 'नर्मदा' को केन्द्र में रख कर फिल्म बनाएंगे लेकिन जब उन्हें भारतीय सिनेमा में योगदान देने के लिए दादा साहब फालके सम्मान से नवाजा जा रहा था, उस समय अचानक अस्थमा का दौरा आया। एक माह अस्पताल में इलाज के बाद उनका 2 जून 1988 को निधन हो गया। इसी के साथ राज कपूर, कृष्णा कपूर और जबलपुर का अध्याय समाप्त हो गया।

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