mp assembly election 2023: जबलपुर का केंट विधानसभा क्षेत्र, अंगद की तरह जमा हुआ है बीजेपी का पैर
mp assembly election 2023: जबलपुर केंट विधानसभा छावनी क्षेत्र को कवर करती है, इस विधानसभा में सदर, केंटोन्मेंट बोर्ड का क्षेत्र और आयुध निर्माणी, सेंट्रल ऑर्डिनेंस डिपो, वाहन निर्माणी और ग्रे आयरन फाउंड्री जैसे रक्षा संस्थानों का क्षेत्र शामिल है। परिसीमन के बाद इसमें शहर के कुछ इलाके और जुड़ गए।
कभी जबलपुर के सेठ परिवार की पसंदीदा सीट रही यह विधानसभा 90 के दशक से पूर्व विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी की सीट बन गई, जिस पर वर्तमान में उनके बेटे अशोक रोहाणी विधायक के पद पर काबिज हैं।
जबलपुर केंट विधानसभा क्षेत्र में ज्यादातर रक्षा क्षेत्र, सेना व अन्य शासकीय विभागों में कार्यरत कर्मचारियों-अधिकारियों का रहवास है। जो आम नागरिक हैं उनके बुजुर्ग भी कभी शासकीय कर्मचारी रहे हैं। ऐसे में इस विधानसभा में ज्यादातर नौकरीपेशा लोग निवासरत हैं। इनके अलावा छोटे-मंझौले और बड़े व्यापारी भी थोड़ी संख्या में यहां निवासरत हैं। क्षेत्र में मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग के लोगों की संख्या ज्यादा है। यहां सर्वाधिक 2013 में 69 प्रतिशत और सबसे कम 1990 में 49 फीसदी मतदान हुआ।

जबलपुर छावनी विधानसभा सीट मध्यप्रदेश के गठन के साथ ही अन्य सीटों की तरह सेठ गोविंददास परिवार के पास रही। मनमोहन दास यहां से दो बार निर्वाचित होकर विधानसभा पहुंचे। वहीं 1985 और 1990 में उनके ही परिवार के चंद्रमोहन इस सीट से एमएलए चुने गए। मध्यप्रदेश की राजनीति का जाना माना नाम ईश्वरदास रोहणी इसी सीट से ऊपर उठा और 1993 में चंद्रमोहन को पराजित किया। रोहाणी इस सीट से 4 बार विधानसभा पहुंचे वहीं उनके बाद उनके बेटे अशोक रोहाणी 2 बार विधायक बन चुके हैं।
जबलपुर केंट विधानसभा क्षेत्र का राजनैतिक मिजाज विकास परक नेतृत्व का पक्षधर है। नौकरीपेशा लोगों की बहुतायत के चलते क्षेत्र के लोग विकास कराने का दम रखने वाले नेतृत्व पर ही विश्वास करते हैं। जिसके चलते करीब 3 दशक में हुए चुनावों में हर बार विजेता प्रत्याशी एकतरफा जीत हासिल करता है। विधानसभा का आधा हिस्सा केंटोन्मेंट बोर्ड और आधा नगर निगम के अंतर्गत आता है। केंट बोर्ड में निकाय चुनाव गैरदलीय आधार पर होते हैं, इस कारण लोकल स्तर पर गुटबाजी भी हावी नहीं हो पाती। वहीं लगातार विकास कार्यों के चलते सीट का झुकाव एकपक्षीय बना हुआ है।
केंट विधानसभा क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनावी उठापटक साल 1993 में हुई। इससे पहले केंट का सदर और उससे सटा इलाका कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। इससे पहले चुनाव में किसी घर में कांग्रेस के अलावा किसी और पार्टी के झंडे तक नहीं लग पाते थे। अन्य कांग्रेसी इस सीट पर सेठ परिवार के एकछत्र राज से नाराज थे। 1993 में कांग्रेस के अन्य नेताओं ने किसी अन्य को मौका दिए जाने की मांग की थी, लेकिन पार्टी ने एक बार फिर सेठ परिवार के चंद्रमोहन पर ही विश्वास जताया। बीजेपी के ईश्वरदास रोहाणी ने इस मौके का भरपूर फायदा उठाया। रक्षा संस्थानों के कर्मचारी संगठनों की मदद बीजेपी को मिली और कांग्रेस की कलह के चलते सदर में भी बीजेपी ने निर्भय होकर न सिर्फ चुनाव प्रचार किया बल्कि अच्छी जीत भी हासिल की।
जबलपुर केंट विधानसभा क्षेत्र विकासपरक राजनीति को पसंद करता है। इसलिए इस क्षेत्र का मुख्य मुद्दा विकास ही है। क्षेत्र में नौकरीपेशा लोगों की संख्या ज्यादा है इसलिए शिक्षित लोगों की तादाद भी ज्यादा है। फिर भी उन्नत शिक्षा एक मुद्दा है और रोजगार सबसे अहम और महत्वपूर्ण मुद्दा है जिस पर युवा वर्ग वोट करता है।
साल 2018 के चुनाव में क्षेत्र की जनता ने विकास के मुद्दे पर वोट डाले। जनता को यह भरोसा था कि विकासपुरूष ईश्वरदास रोहाणी की तरह उनके बेटे अशोक रोहाणी भी उनकी उम्मीदों पर खरा उतरेंगे। वहीं उनके मुकाबले में मैदान में उतरे आलोक मिश्रा अशोक के सामने कमजोर ही साबित हुए। मतदान का प्रतिशत भी बंपर मतदान की ओर इशारा कर रहा था। और जीत का अंतर भी बता रहा था कि जनता में अशोक रोहाणी के प्रति काफी ज्यादा विश्वास था।
केंट विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी के पक्ष की बात की जाए तो मौजूदा विधायक अशोक ईश्वरदास रोहाणी ही प्रबल दावेदार हैं। उन्होंने अपने पिता से मिली कुशल राजनीतिज्ञ की विरासत का भरपूर प्रयोग करते हुए क्षेत्र में अपने समकक्ष किसी नेता को जमने नहीं दिया। अशोक रोहाणी को जो लोग चुनौती दे सकते हैं उनमें से एक सुमित्रा वाल्मीक को बीजेपी राज्यसभा भेज चुकी है और दूसरे नाम कमलेश अग्रवाल नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष हैं। बीजेपी रवायत के मुताबिक दावेदारी की पैनल में ये दो नाम औपचारिकता के लिए जरूर रख सकती है।
कांग्रेस की बात की जाए तो यहां जिन पर भी कांग्रेस ने भरोसा जताया उनसे निराशा ही हाथ लगी है। दावेदारों में आलोक मिश्रा, चमन श्रीवास्तव, तविंदर कौर गुजराल, प्रेम दुबे पूर्व में चुनाव हार चुके हैं। केंट बोर्ड उपाध्यक्ष अभिषेक चौकसे चिंटू युवा हैं और कमलनाथ के वरदहस्त के चलते चुनाव की तैयारी में भी जुटे हुए हैं। हालांकि वे सीनियर रोहाणी की छत्रछाया में एक बार पाला बदलकर बीजेपी में भी शामिल हो चुके हैं। फिर भी चिंटू चौकसे की दावेदारी मजबूत दिखाई प्रतीत होती है।












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