MP assembly election 2023: जबलपुर की पश्चिम विधानसभा, बीजेपी-कांग्रेस दोनों के सितारे रहे बुलंद
MP assembly election 2023: मध्य प्रदेश के जबलपुर की सियासत में उथल-पुथल मचाने वाले विधानसभा क्षेत्रों में यहां की पश्चिम सीट ने राजनीति का अलग अध्याय लिखा हैं। चुनावी बेला में इस सीट की बात किए बिना चुनाव का हर समीकरण अधूरा हैं। ऐतिहासिक महत्व के साथ यहां का क्षेत्र अब अलग तरह की राजनीति से पहचाना जा रहा हैं।
प्राचीन काल में गोंडवाना काल में गोंड वंश के अनेक निशान इस क्षेत्र में मौजूद हैं। इस क्षेत्र ने प्रदेश को कई बड़े नाम भी दिए जिनमें कुंजीलाल दुबे, चंद्रकुमार भनोत, हरेंद्रजीत सिंह बब्बू और पूर्व वित्तमंत्री तरुण भनोत शामिल हैं।

जबलपुर पश्चिम विधानसभा सीट हिंदू वोटर्स की बहुलता वाली सीट है, जिसमें ब्राम्हण मतदाताओं की संख्या भी अच्छी खासी है। सीट में सिख मतदाताओं का भी बड़ा वर्ग शामिल है, जो निर्णायक भी हैं। इस सीट पर महज 12 हजार के करीब मुस्लिम मतदाता भी हैं। आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस विधानसभा क्षेत्र में नौकरीपेशा और व्यापारी वर्ग बराबरी से शामिल हैं। मध्यप्रदेश विद्युत मंडल का मुख्यालय, टेलिग्राफ फैक्ट्री की वजह से अनेक नौकरीपेशा लोग जहां इस विधानसभा क्षेत्र के निवासी हैं तो वहीं गोरखपुर, मदन महल, गढ़ा इलाकों में व्यापारी वर्ग का वर्चस्व है। जिसमें छोटे और मझौले व्यापारी बहुतायत में निवासरत हैं। क्षेत्र में ट्रक ऑनर्स, टिंबर मर्चेंट, खनन कारोबार, टैक्सटाइल्स से जुड़े आर्थिक कार्य भी काफी हो रहे हैं।
एकाधिकार की जब पलटी बाजी
मध्यप्रदेश के गठन के साथ ही पहले विधानसभा चुनाव में बखरी परिवार से जगमोहन दास इस विधानसभा से चुने गए। जिसके बाद लगातार यहां कांग्रेस का ही वर्चस्व रहा। साल 1990 में कांग्रेस के एकाधिकार को खत्म करते हुए भाजपा की जयश्री बैनर्जी ने तत्कालीन मंत्री चंद्रकुमार भनोत को शिकस्त देकर अलग राजनीति की शुरूआत की, लेकिन संघ पृष्ठभूमि के इस बड़े नाम की टिकट बीजेपी ने साल 1998 में काट दी और खुद को सुंदरलाल पटवा का दत्तक पुत्र बताने वाले हरेंद्रजीत सिंह बब्बू ने लगातार 15 साल तक बीजेपी का झंडा यहां बुलंद रखा। साल 2013 से इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व पूर्व कैबिनेट मंत्री तरुण भनोत कर रहे हैं।
RSS की छाप!
राजनैतिक पहचान की बात की जाए तो इस क्षेत्र को कांग्रेस से भनोत परिवार और कभी एकमात्र सिख मंत्री रहते हुए हरेंद्रजीत सिंह बब्बू की विधानसभा के नाम से प्रसिद्धि मिली। चुनावी समीकरणों की बात की जाए तो इस विधानसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा आरएसएस के स्वयंसेवक निवास करते हैं। लेकिन कहावत यह है कि गढ़ा जहां पलटता है जीत उसी की होती है।
राजनैतिक मिजाज दशक दर दशक बदलाव वाला रहा है। कभी इस क्षेत्र में कांग्रेस की तूती बोली तो संघ ने भी गहरी पैठ जमाई।
जब चली परिवर्तन की लहर
बीते 10 सालों में जिले की सर्वाधित शिक्षित लोगों वाली इस विधानसभा ने अलग-अलग चुनावों में अलग प्रकार का मतदान किया। मसलन 2013 में 15 सालों से जमे हरेंद्रजीत सिंह बब्बू को नकार दिया और 2018 में भी बीजेपी को कोई नया चेहरा नहीं मिलने पर कांग्रेस का रुख किया। लेकिन इस समयावधि में लोकसभा चुनाव में बीजेपी को इकतरफा वोट पड़े। वहीं नगर निगम चुनावों में स्थिति मिली जुली देखी गई। यह कहना गलत नहीं होगा कि यहां की समझदार जनता हर चुनाव में अलग सोच के साथ मतदान करती है।
विधानसभा क्षेत्र की बड़ी चुनावी उठा.पटक
जबलपुर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में बड़ी चुनावी उठापटक साल 1990, 1998 और 2013 में हुई।
साल 1990- यह वो साल था जब कांग्रेस के एकछत्र राज वाली विधानसभा सीट पर कमल खिला। संघ परिवार की पृष्ठभूमि वाली पूर्व मंत्री जयश्री बैनर्जी को यहां तत्कालीन मंत्री चंद्रकुमार भनोत के खिलाफ मैदान में उतारा गया। चुनाव से पहले लोग मुकाबले को एकतरफा समझते चले आ रहे थे लेकिन जयश्री बैनर्जी ने यह चुनाव जीत लिया और राजनीति का पन्ना ही पलट दिया।
पहले चुनाव में ही बब्बू ने किया कमाल
1998- बीजेपी में एक बड़ा नाम बन चुकी जयश्री बैनर्जी ही नहीं पार्टी में किसी को यह विश्वास नहीं था कि बीजेपी जयश्री बैनर्जी का टिकट काटकर एक अनजान नाम हरेंद्रजीत सिंह बब्बू पर भरोसा जताएगी। लग रहा था कि यह सीट बीजेपी के हाथ से खिसक जाएगी। कांग्रेस ने 1998 में सबसे युवा पार्षद संजय यादव को मौका दिया। संजय कमलनाथ के खास समर्थक थे। मामला काटे की टक्कर का लग रहा था लेकिन सिख वोटों और बीजेपी के संगठन को साधकर बब्बू जबलपुर के पहले सिख जनप्रतिनिधी बन गए।
चौकाने वाले जीत-हार के आंकड़े
23 साल से पश्चिम विधानसभा में बीजेपी का झंडा लहरा रहा था लेकिन हर बार पार्टी को धता बताते हुए अकाली दल के समर्थन से टिकट लाने वाले हरेंद्रजीत पूरी पार्टी के विरोध के बावजूद टिकट लाने में सफल रहे। उनके सामने कांग्रेस ने एक बार शिकस्त खा चुके तरुण भनोत को दोबारा मौका दिया। मतगणना के दौरान करीब 5वें-6ठे राउंड से तरुण भनोत ने लीड ले ली, यह लीड महज कुछ सैकड़ा वोटों की ही थी। लेकिन राउंड दर राउंड हुई मतगणना में लीड इसी प्रकार कायम रही और अंत में तरुण मात्र 923 मतों से विजयी रहे। 2003 के चुनाव दिग्विजय सिंह की एंटी इनकंबेंसी के चुनाव थे, जिसमें बीजेपी के हरेंद्रजीत सिंह बब्बू विजयी रहे, साल 2008 में भी बब्बू ने तरुण भनोत को पटखनी दी, लेकिन 2013 में तरुण भनोत ने बब्बू को 923 मतों से पछाड़ दिया। साल 2018 में तरुण ने अच्छी खासी लीड के साथ विजय का हार पहना।












Click it and Unblock the Notifications