Jabalpur Hospital Fire: मौतों का ढेर लगाने के इस अस्पताल में थे पूरे इंतजाम, कागजों पर थी सेफ्टी !
जबलपुर, 02 अगस्त: मप्र के जबलपुर में न्यू लाईफ मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल अग्नि हादसे ने अस्पताल के साथ प्रशासन को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। 8 बेकसूर लोगों की मौत की वजह सिर्फ हादसा ही नहीं है, बल्कि अस्पताल और इसको धड़ल्ले से चलाने देने वाले प्रशासन पर भी अब सवाल उठ रहे है। एक तरह से अग्निकांड वाले इस अस्पताल में मौतों का ढेर लगाने के पूरे इंतजाम थे। कैसे, पढ़िये ये पूरी खबर..

इन लोगों का था अस्पताल
जबलपुर के जिस न्यू लाईफ मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल में अग्नि दुर्घटना हुई, उसको खुले ज्यादा वक्त नहीं हुआ है। कोविडकाल के वक्त ही इस अस्पताल की ओपनिंग हुई थी। करीब 1800 वर्गफुट के एरिया में बने इस अस्पताल के चार कर्ताधर्ता मुख्य है। जिनमें अस्पताल की जमीन डॉ. निशांत गुप्ता के नाम पर थी, बाकी तीन अन्य लोग संतोष पटेल, सुरेश पटेल और संजय पटेल अस्पताल में पार्टनर है। डॉ. निशांत गुप्ता के साथ मिलकर इन तीनों ने पैसा लगाकर तीन मंजिला यह अस्पताल बनाया।
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अस्पताल में सिर्फ एक ही दरवाजा
पूरी अस्पताल जब आग की लपटों से घिर गई, तो हॉस्पिटल के अंदर भर्ती मरीज, उनके परिजन और स्टाफ के लोगों में भगदड़ मच गई। अस्पताल से बाहर निकलने का सिर्फ एक रास्ता था ‘मेन गेट'। जहाँ शॉर्ट सर्किट से आग लगी और विकराल होती चली गई। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि क्षेत्रीय पार्षद हादसे के बाद जब अस्पताल में दाखिल हुए तो उनको बाहर निकलने एक खिड़की से कूदना पड़ा।

एंट्रेंस पर रखा था जनरेटर
ऐसे हादसे या किसी अन्य बड़ी दुर्घटना के वक्त बचाव के लिए निर्गम द्वार यानी बाहर निकालने का रास्ता रखना अनिवार्य है। अस्पताल में एक ही दरवाजा जिससे मरीजों, उनके परिजनों और हॉस्पिटल के स्टाफ का आना-जाना होता था, वही किनारे पर जनरेटर रखा गया था। पेट्रोल डीजल से चलने वाले जनरेटर में आग लगने पर क्या स्थिति होगी, इस बारे में न तो अस्पताल प्रबंधन ने ख्याल रखा और न ही इसकी निगरानी करने वाले जिम्मेदार प्रशासन ने। यदि यह जनरेटर अस्पताल की छत पर भी रखा होता तो शायद जिन बेकसूर लोगों ने अपनी जान गंवाई, वह बच जाते।

सिर्फ कागजों पर थे फायर सेफ्टी इंस्ट्रूमेंट्स
किसी अस्पताल या बहुमंजिला व्यावसायिक इमारत में फायर सेफ्टी इंस्ट्रूमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण है। फायर सेफ्टी रुल का पालन किए बगैर किसी भी जगह कोई व्यवसाय नहीं किया जा सकता है। हादसे के बाद 2021 का नगर निगम फायर विभाग द्वारा हेल्थ डिपार्टमेंट को लिखा गया पत्र सामने आया है। जिसमें अस्पताल और नर्सिंग होम में अग्निसुरक्षा, आपातकालीन निकासी व्यवस्थाओं में खामियों का जिक्र किया गया था। शहर के न्यू लाईफ मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल समेत डेढ़ दर्जन से ज्यादा अस्पताल नर्सिंग होम में कमियां पाई गई थी। अग्निकांड वाले इस अस्पताल ने प्रोविजनल फायर NOC ली थी, जिसकी मियाद मार्च 2022 में ख़त्म हो गई थी।

मंत्रालय के आदेशों की उड़ रही धज्जियां
ख़ास बात यह है अस्पतालों में फायर सेफ्टी के इंतजाम दुरुस्त करने स्थानीय स्तर हेल्थ डिपार्टमेंट को आगाह किया गया था। इसके अलावा करीब सवा साल पहले प्रदेश के सभी अस्पतालों से एक हफ़्ते में फायर और लिफ्ट सेफ्टी ऑडिट रिपोर्ट मांगी गई थी। लेकिन लोकल लेवल पर जिम्मेदारों की कान पर जूं नहीं रेंगी। साल भर बीत जाने के बाद मई 2022 में दोबारा सभी नगर निगम और नगर पालिकाओं को फिर ऑडिट रिपोर्ट भेजने कहा गया। लेकिन स्थिति ढाक के तीन पात की तरह ही रही।

8 लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन?
जिस तरह से तीन मंजिला इस अस्पताल में बड़ा हादसा हुआ और 8 लोगों की जान चली गई, उसका जिम्मेदार कौन है? घूम फिर कर अब यही बड़ा सवाल हो रहा है? यह जानते हुए भी कि अस्पताल में ऐसे हादसों से निपटने के कोई माकूल इंतजाम नहीं है, उसके बाबजूद धड़ल्ले से अस्पताल का संचालन प्रशासन को भी कटघरे में खड़ा करता है। अस्पताल के चारों संचालकों समेत अस्पताल को लायसेंस NOC देने वाले जिम्मेदार अफसरों पर हत्या का मुकदमा क्यों दर्ज नहीं होना चाहिए ?
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