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Jabalpur नगर निगम प्रशासन पर हाई कोर्ट की टिप्पणी, ‘धृतराष्ट्र नहीं है हम..’, कर्मचारी के प्रमोशन पर फैसला

एमपी के जबलपुर नगर निगम के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पदोन्नति के मामले में हाई कोर्ट ने नगर निगम प्रशासन पर तल्ख़ टिप्पणी की। इसके साथ ही याचिकाकर्ता को 15 दिन में प्रमोशन का लाभ देने के निर्देश भी दिए।

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Jabalpur High Court's strong comment on nagar nigam: जबलपुर नगर निगम के फोर्थ ग्रेड कर्मचारी के प्रमोशन के मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने प्रशासन के रवैये पर नाराजगी जताई। कमिश्नर, स्थापना शाखा अधिकारी और अधिवक्ता के विरोधाभासी तर्कों के आधार पर अदालत ने प्रमोशन देने के साथ 2003 से सभी लाभ देने के निर्देश दिए। कोर्ट ने दो टूक कहा कि वह ' न तो धृतराष्ट्र बन सकता है और न ही नगर निगम को संजय बनने दिया जा सकता हैं'। दरअसल दायर याचिका में आरोप लगाया गया था कि फोर्थ क्लास कर्मचारी को फोर्थ क्लास में पदोन्नति के आदेश जारी कर दिए थे।

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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश से फिर एक बार नगर निगम जबलपुर की प्रशासनिक कार्यप्रणाली कटघरे में खड़ी हो गई है। मामला नगर निगम में पदस्थ कर्मचारी शैलेन्द्र बरुआ की याचिका से जुड़ा हैं। जिसे हांका गैंग से नोटिस राइटर के पद पर पदोन्नति के आदेश जारी किए गए थे। जिस कर्मचारी ने आपत्ति जताई और हाई कोर्ट की शरण ली। दायर की गई याचिका में बताया गया कि निगम प्रशासन से उसे चतुर्थ श्रेणी से तृतीय श्रेणी में पदोन्नति का लाभ नहीं मिल रहा हैं। वह हांका गैंग में पदस्थ था, जिसे नोटिस राइटर का पद देते हुए पदोन्नति दर्शा दी गई।

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इस व्यवस्था को असंवैधानिक बताते हुए याचिकाकर्ता की ओर से नगर निगम एक्ट और पदोन्नति संबधी तथ्य प्रस्तुत किए गए। पिछली सुनवाई में हाई कोर्ट ने निगम प्रशासन से याचिका के संबंध में जवाब मांगा। जो तर्क प्रस्तुत किए गए, उससे कोर्ट सहमत नहीं हुई। अंतिम सुनवाई में भी इसी तरह की स्थिति निर्मित हुई। जिस पर कोर्ट ने निगम प्रशासन के खिलाफ कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि वह 'धृतराष्ट्र नहीं बन सकती और न ही निगम प्रशासन समेत उसके अधिवक्ता को संजय बनने दिया जा सकता हैं'। बिना प्रमाणिक दस्तावेजों के दिए गए किसी भी तर्क को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

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कोर्ट ने संबंधित कर्मचारी की याचिका का पटाक्षेप करते हुए उसे तृतीय श्रेणी में पदोन्नति के आदेश और 2003 से समस्त लाभ दिए जाने के निर्देश जारी किए। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने पैरवी की। जस्टिस विवेक अग्रवाल की अदालत ने याचिकाकर्ता को 15 दिन के अंदर पदोन्नति सहित सभी लाभ प्रदान करने के निर्देश दिए हैं।

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