ईरान में इस्लामिक शासन के खिलाफ औरतों की क्रांति, सिर से फेंका हिजाब, कई हिस्सों में भारी प्रदर्शन

ईरान के अलग अलग हिस्सों से महिलाओं के प्रदर्शन के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिसमें देखा जा सकता है, कि महिलाएं सरकार विरोधी नारेबाजी कर रही हैं और महिलाओं ने हिजाब नहीं पहना हुआ है।

तेहरान, सितंबर 18: क्रांति की आग भड़कने के लिए एक चिंगारी की ही जरूरत होती है और ईरान में इस्लामिक शासन के खिलाफ औरतों ने क्रांति की शुरूआत कर दी है। कट्टरपंथी शासन बर्बरता पर उतारू है, लेकिन औरतों ने तय कर लिया है, कि वो क्या ड्रेस पहनेंगी, इसपर सिर्फ उनका अधिकार होगा। ईरान की औरतों ने तय कर लिया है, कि वो काले लबादे को अपनी किस्मत नहीं बनने देंगे और मौलवियों की सरकार तय नहीं कर सकती है, कि उसे हिजाब पहनना ही होगा। 22 साल की महसा अमिनी को ईरान की पुलिस ने हिजाब नहीं पहनने के लिए मार डाला, लेकिन मरने से पहले वो ईरान की औरतों को जगा चुकी है।

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    ईरान में औरतों की क्रांति

    ईरान में औरतों की क्रांति

    पश्चिमी ईरान में हजारों की तादाद में महिलाएं सड़कों पर हैं और हिजाब हाथों में लेकर प्रदर्शन कर रही हैं। औरतों ने हिजाब को फेंक दिया है, फाड़ दिया है और जला दिया है और ये प्रदर्शन हो रहा है, 22 साल की लड़की महसा अमिनी की मौत के बाद, जिसे ईरान की 'मोरल पुलिस' ने हिजाब नहीं पहनने की वजह से इतना पीटा, कि पहले वो कौमा में गई और फिर उसकी मौत हो गई। ईरान की पुलिस ने महसा अमिनी को सिर्फ इसलिए हिरासत में लिया था, क्योंकि उसने अपनी बालों को पूरी तरह से नहीं ढंका था। महसा अमिनी अपने देश की राजधानी देखने अपने परिवार के साथ आई थी, लेकिन इस्लामिक कट्टरपंथियों ने उसकी जान ले ली। लेकिन, महसा अमिनी मौत लगता है जाया नहीं होगी और ईरान में हजारों की संख्या में औरतें सड़क पर हैं। ईरान की सरकार ने कहा है, कि अभी तक 16 हजार महिलाओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। ऐसे में आप समझ सकते हैं, कि ये आंदोलन कितना बड़ा हो गया है।

    सरकार के खिलाफ महिलाओं का मोर्चा

    ईरान के अलग अलग हिस्सों से महिलाओं के प्रदर्शन के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिसमें देखा जा सकता है, कि महिलाएं सरकार विरोधी नारेबाजी कर रही हैं और महिलाओं ने हिजाब नहीं पहना हुआ है। वहीं, 22 साल की मृतका महसा अमिनी के गृहनगर सक्केज़ में तो हजारों की संख्या में औरतें मौजूद हैं और इंसाफ की मांग कर रही है। ईरान की एक पत्रकार और कार्यकर्ता मसीह अलीनेजाद ने ट्विटर पर एक वीडियो साझा किया है और लिखा है, कि "साघेज की रहने वाली महिलाओं ने हिजाब उतार दिया है और 22 साल की लड़की महास अमिनी की हत्या के विरोध में स्कार्फ को फाड़कर फेंक दिया है। महिलाएं तानाशाह की मौत मांग रही है'। उन्होंने लिखा है, कि 'ईरान में महिलाओं के लिए हिजाब हटाना एक दंडनीय अपराध है, इसीलिए हम दुनिया भर के महिलाओं और पुरुषों से ईरान की महिलाओं के समर्थन के लिए एकजुटता दिखाने का आह्वान करते हैं।"

    प्रदर्शन को कुचलती सरकार

    वहीं, एक और ट्वीट में पत्रकार मसीह अलीनेजाद ने एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें ईरानी पुलिस को प्रदर्शनकारियों को पीटते हुए देखा जा रहा है। उन्होंने लिखा है, कि "यह असली ईरान है, ईरान के सक़्ज़ में सुरक्षा बलों ने महसा अमिनी को दफनाने के बाद शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं। कई प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं। पहले हिजाब पुलिस ने 22 साल की एक लड़की को मार डाला और अब शोक संतप्त लोगों के खिलाफ बंदूक और आंसू गैस के गोले दागे हैं'। प्रदर्शनकारियों की भीड़ "तानाशाह की मौत हो" चिल्ला रही है और सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ नारेबाजी कर रही है। महिलाओं ने अपने सिर पर स्कार्फ हटा दिया है और ये विरोध क्षेत्रीय राजधानी सानंदज में फैल गया और देर रात से चल रहा है। सोशल मीडिया पर भीड़ ने नारा दिया है, कि "साकेज अकेला नहीं है, इसे सानंदाज का समर्थन प्राप्त है।" आपको बता दें कि, पश्चिमी ईरान में सक्ज़ शहर है, जो प्रदर्शन का मुख्य केन्द्र बन गया है और राजधानी तेहरान में भी महिलाओं के प्रदर्शन शुरू हो गये हैं।

    इस्लामिक क्रांति में छीने गये सारे अधिकार

    इस्लामिक क्रांति में छीने गये सारे अधिकार

    आपको बता दें कि, ईरान में साल 1979 में इस्लामी क्रांति हुई थी, जिसके बाद ईरान में महिलाओं के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया था और देश में कानून है, कि महिलाओं को ऐसा हिजाब पहनना चाहिए जो बालों को छुपाते हुए सिर और गर्दन को ढके। लेकिन कई लोगों ने पिछले दो दशकों में अपने सिर को ढकने की अनुमति देकर सीमाओं को आगे बढ़ाया है और कई महिलाओं ने हिबाज के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया है, जिनसे ईरान की पुलिस सख्ती से निपटती है। वहीं, ईरान में हिबाज के खिलाफ बढ़ती आवाजों ने इस्लामिक कट्टरपंथी शासन को चुनौती देनी शुरू कर दी है, लिहाजा सरकार काफी सख्ती से निपटने की कोशिश कर रही है।

    क्रांति थी या औरतों को कुचलने की कोशिश?

    क्रांति थी या औरतों को कुचलने की कोशिश?

    दरअसल, 1979 से पहले ईरान में शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासन था, जो ईरान में आधुनिक शासन का स्थापना कर रहे थे और उन्होंने इस्लाम की कई रूढ़िवादिता को चुनौती दी थी, लिहाजा उन्हें लगातार कट्टरपंथियों की तरफ से चुनौती का सामना करना पड़ता था। कट्टरपंथियों को दबाने के लिए शाह मोहम्मद रज़ा ने देश में इस्लाम की भूमिका कम करनी शुरू कर दी और उन्होंने ईरान के लोगों को पुरानी सभ्यता की तरफ मोड़ने की कोशिश शुरू कर दी और उन्होंने ईरान में पश्चिमीकरण को बढ़ावा देना शुरू कर दिया, जिससे देश के मुल्लाह चिढ़ गये और उन्हें अमेरिका का पिट्ठू बताकर उनके खिलाफ एक तरह से जंग का ऐलान कर दिया। साल 1978 में शाह मोहम्मद रज़ा के खिलाफ करीब 20 लाख से ज्यादा लोग शाहयाद चौक पर प्रदर्शन करने के लिए जमा हो गये, जिसके बाद शाह मोहम्मद रज़ा ने अपने परिवार के साथ ईरान छोड़ दिया और ईरान में एक कट्टर शरियत कानून की स्थापना की गई और महिलाओं से तमाम अधिकार छीन लिए गये। ऐसे में सवाल ये है, कि क्या औरतों की क्रांति, इस्लामिक क्रांति पर भारी पड़ेगी और क्या औरतों को अपना जीवन अपनी मर्जी से जीने का अधिकार मिलेगा?

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