भारतीय वायुसेना खरीदेगी Gripen-E विमान? SAAB और IAF के $20 अरब MRFA डील के रास्ते में कैसे खड़ा है LCA Tejas?
Defence News: स्वीडिश रक्षा कंपनी साब (SAAB) ने अपने ग्रिपेन ई/एफ लड़ाकू विमानों के लिए रॉयल थाई एयर फोर्स (RTAF) के साथ एक महत्वपूर्ण कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया है। यह SAAB के लिए एक बड़ी डील है, जो संभावित रूप से इसके लिए भारत सहित अन्य बाजारों में दरवाजे खोल सकता है।
आरटीएएफ ने काफी खोजबीन और जांच पड़ताल के बाद ग्रिपेन ई/एफ को चुना है, जो रणनीतिक और सैद्धांतिक जरूरतों को पूरा करने की इसकी क्षमता की को बढ़ाता है।

रिपोर्ट्स बताती हैं, कि थाईलैंड को तत्काल 12-14 ग्रिपेन ई/एफ विमानों की जरूरत है, हालांकि सटीक संख्या अभी भी अज्ञात है। ये खरीद 2025 वित्तीय वर्ष में शुरू होने वाली है, जिसकी डिलीवरी 2028 तक होने की उम्मीद है। यह कॉन्ट्रैक्ट भविष्य की प्रतिस्पर्धाओं में साब की संभावनाओं को बढ़ाता है, जैसे कि भारत 114 मल्टी-रोल वाले लड़ाकू विमान खरीदने की कोशिश में है और SAAB की नजरें भारत पर हैं।
भारत को अपनी वायुसेना की क्षमता बढ़ाने के लिए 120 multi-role fighter aircraft (MRFA) चाहिए और इसके लिए भारत अलग अलग ऑप्शन पर विचार कर रहा है। और भारत की इस संभावित खरीद पर दुनिया की कई देशों की हथियार कंपनियों की नजर है, क्योंकि ये डील कम से कम 20 अरब डॉलर का है। इतना ही नहीं, जिस फाइटर जेट को भारत खरीदेगा, उसका महत्व इतना ज्यादा बढ़ जाता है, उसे फिर दुनिया के कई ग्राहक मिल जाते हैं। राफेल फाइटर जेट के मामले में ऐसा हो चुका है। भारत के राफेल खरीदने के साथ ही फ्रांस को कई देशों से राफेल फाइटर जेट के ऑर्डर मिल गये।
Gripen E/F fighter jets की क्षमताएं
Gripen E/F fighter jets में एक ज्यादा शक्तिशाली इंजन, एडवांस रडार टेक्नोलॉजी और बढ़ी हुई पेलोड क्षमता जैसी एडवांस विशेषताएं हैं। इसमें तेजी से काम करने की क्षमता और ज्यादा आंतरिक ईंधन क्षमता भी है। कॉकपिट में समय पर सूचना देने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ SAAB की मानव-मशीन सहयोग कॉन्सैप्ट को भी शामिल किया गया है।
इन क्षमताओं और राफेल जैसे प्रतिस्पर्धियों की तुलना में कम लागत के बावजूद, साब को भारत में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय वायु सेना (IAF) पहले से ही तेजस LCA Mk1 को अपने बेड़े में शामिल कर रही है, जिसमें ग्रिपेन E जैसी ही क्षमताएं हैं। इससे तुलनीय विशेषताओं वाले दूसरे विमान की आवश्यकता पर सवाल उठता है। वहीं, एलसीए तेजस का निर्माण भारत में ही हुआ है और ये भारत सरकार की आत्मनिर्भर भारत प्रोग्राम के तहत है, इसलिए इंडियन एयरफोर्स की पहली प्राथमिकता तेजस ही है।
इंडियन एयरफोर्स को चाहिए 114 फाइटर जेट
स्वीडिश एयरोस्पेस और रक्षा कंपनी साब भारतीय वायु सेना (आईएएफ) के 114 बहु-भूमिका लड़ाकू विमान (एमआरएफए) के आगामी टेंडर को हासिल करने की कोशिश कर रहा है।
यह टेंडर इसलिए महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि भारतीय वायुसेना में लड़ाकू विमानों के स्क्वाड्रनों की संख्या लगातार कम होती जा रही है और बेड़े के आधुनिकीकरण की तत्काल आवश्यकता है। अपने सिंगल-इंजन ग्रिपेन लड़ाकू विमानों के लिए मशहूर साब इस हाई-प्रोफाइल प्रतियोगिता में खुद को एक मजबूत दावेदार के रूप में स्थापित कर रहा है।
MRFA टेंडर पहले के मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (MMRCA) सौदे से एक स्वाभाविक प्रगति है, जिसे 2015 में रद्द कर दिया गया था। इस डील को रद्द करने के बाद भारत सरकार ने फ्रांस से 36 राफेल फाइटर जेट खरीद लिया था।
SAAB की भारतीय शाखा लगातार कोशिश कर रही है, कि वो भारत से इस महत्वपूर्ण डील को हासिल करे।

भारतीय बाजार में चुनौतियां क्या हैं?
भारत को ग्रिपेन जेट बेचने की SAAB की बोली में कई बाधाएं हैं। एक बड़ी समस्या यह है, कि ग्रिपेन के कई कंपोनेंट्स अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों में मूल उपकरण निर्माताओं (OEM) से प्राप्त किए जाते हैं। यह SAAB के भारत में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और स्थानीय उत्पादन के वादे को मुश्किल बनाता है। SAAB के लिए भारत से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का वादा करना काफी मुश्किल होगा और पिछले कुछ सालों में ये देखा गया है, कि डिफेंस डील में भारत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को सबसे ज्यादा महत्व देता है।
इन OEM से समझौते के बिना, SAAB पूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के बजाय सिर्फ भारत में असेंबली की पेशकश कर सकता है। इसके अलावा, तेजस और ग्रिपेन दोनों ही विमान एक ही क्लास के हैं, जिससे भारतीय वायुसेना के लिए भारत के स्वदेशी लड़ाकू कार्यक्रम की कीमत पर ग्रिपेन का विकल्प चुनना अव्यावहारिक हो जाता है।
राजनीतिक और वित्तीय बाधाएं क्या हैं?
पर्याप्त राजनीतिक प्रभाव की कमी और वित्तीय सहायता में कमी ने भारत में साब की स्थिति को और मुश्किल बना दिया है। साब की बोली का क्या होगा, ये भारत सरकार की तरफ से 'आवश्यकता की स्वीकृति' दिए जाने पर भी निर्भर करती है, जो भारत की रक्षा खरीद प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण कदम है।
डिफेंस इंडस्ट्री के एक एक्सपर्ट के मुताबिक, "ग्रिपेन ई/एफ कम लागत पर बेहतर क्षमताएं प्रदान करता है। हालांकि, भारत में साब की सफलता के लिए राजनीतिक और वित्तीय चुनौतियों पर काबू पाना महत्वपूर्ण होगा।"
Gripen E/F fighter jets की कीमत क्या है?
यूरेशयन टाइम्स की रिपोर्ट में डिफेंस एक्सपर्ट येलवे ने बताया है, कि ग्रिपेन ई एक अत्यधिक सक्षम लड़ाकू विमान है, जो वित्तीय और तकनीकी दोनों हिसाब से भारत की जरूरतों के साथ अच्छी तरह से मेल खाता है।
उन्होंने कहा, कि एक ग्रिपेन लड़ाकू विमान की कीमत लगभग 80-85 मिलियन डॉलर है, जो इसे भारत के लिए वित्तीय रूप से व्यवहार्य विकल्प बनाता है। यह अपेक्षाकृत कम कीमत भारत को इन विमानों की बड़ी संख्या में खरीद करने में सक्षम बनाएगी, जिससे भारी वित्तीय बोझ डाले बिना इसकी हवाई लड़ाकू क्षमताओं में वृद्धि होगी।
येलवे ने ग्रिपेन और राफेल विमानों के बीच ऑपरेशन लागत में भारी अंतर को भी उजागर किया। उन्होंने कहा, कि "ग्रिपेन लड़ाकू विमान की ऑपरेशन लागत प्रति उड़ान घंटे 4,000 से 5,000 डॉलर के बीच होने का अनुमान है। इसके विपरीत, राफेल लड़ाकू विमान की ऑपरेशनल लागत प्रति उड़ान घंटे लगभग 15,000 से 16,000 डॉलर होने का अनुमान है।"
थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में राष्ट्रीय सुरक्षा और चीन अध्ययन में फेलो डॉ. अतुल कुमार ने यूरेशियन टाइम्स को बताया है, कि "क्षमता के मामले में, ग्रिपेन-ई भारत के सिंगल इंजन वाले हल्के लड़ाकू विमान (एलसीए) को करीब से दर्शाता है। दोनों (ग्रिपेन और तेजस एमके2) समान इंजन द्वारा संचालित हैं और तुलनीय लड़ाकू रेंज और क्षमताओं को साझा करते हैं। भारतीय वायु सेना पहले से ही एलसीए मार्क 1 को शामिल कर रही है, जिसके ज्यादा एडवांस वेरिएंट डेवलपमेंट फेज में हैं, जिससे ग्रिपेन-ई भारतीय वायुसेना के लिए निरर्थक हो गया है।"












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