यूक्रेन युद्ध के बाद हथियारों का नया बाजार बन पाएगा चीन? कई देशों के साथ कर सकता है रक्षा समझौते
सबसे दिलचस्प बात ये है, कि इस वक्त चीन भले ही चौथे नंबर का हथियार निर्यातक देश हो, लेकिन इस वक्त भी वैश्विक हथियार बाजार में चीन की हिस्सेदारी 6.4 प्रतिशत ही है...
नई दिल्ली, अप्रैल 20: यूक्रेन पर रूसी आक्रमण ने चीन के हथियार बाजार को नये पंख लगा दिए हैं और ड्रैगन यूक्रेन युद्ध की आपदा में अपने लिए बेहतरीन अवसर बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है और रिपोर्ट है कि, यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद चीन के हथियार बाजार में बहुत बड़ा उछाल आ सकता है और चीन कई देशों के साथ हथियार समझौता कर सकता है।

चौथा सबसे बड़ा निर्यातक
चीन वर्तमान में दुनिया का चौथा सबसे बड़ा सैन्य उपकरण निर्यातक देश है। और यूक्रेन युद्ध शुरू करने के बाद पश्चिमी देशों के साथ साथ अमेरिका ने रूस को प्रतिबंधों के जाल में बुरी तरह से बांध दिया है, लिहाजा कई ऐसे देश, जो रूसी हथियार पर निर्भर हैं, वो अमेरिका को नाराज नहीं करना चाहते हैं, लिहाजा ये देश बीजिंग के लिए हथियार बेचने का नया बाजार बन सकते हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) हर साल हथियारों के निर्यात के आंकड़े जारी करता है। मार्च में जारी अपनी सबसे हालिया रिपोर्ट में SIPRI ने गणना की है, कि चीन ने 2017-21 से अंतरराष्ट्रीय हथियार निर्यात में 4.6% का योगदान दिया था, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद चीन हथियार बाजार के लिए कई नये बाजार बनने की संभावना है।
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वर्तमान में चीन का हथियार मार्केट
सबसे दिलचस्प बात ये है, कि इस वक्त चीन भले ही चौथे नंबर का हथियार निर्यातक देश हो, लेकिन इस वक्त भी वैश्विक हथियार बाजार में चीन की हिस्सेदारी 6.4 प्रतिशत ही है, और यह वैश्विक हथियारों की बिक्री के मामले में चीन के लिए 31% की गिरावट का प्रतिनिधित्व करता है, और 2012-16 के मुकाबले 2017-21 में वैश्विक हथियारों की बिक्री में चीन की हिस्सेदार में 4.6% की गिरावट आई थी। 2017-21 के चीन सिर्फ अमेरिका, रूस और फ्रांस से ही पीछे है। जबकि चीन, जर्मनी, इटली और यूनाइटेड किंगडम जैसे पारंपरिक दिग्गज हथियार विक्रेता देशों से आगे निकल चुका है और इसकी सबसे बड़ी वजह है पाकिस्तान।

पाकिस्तान सबसे बड़ा खरीददार
चीनी हथियार निर्यात का लगभग आधा, यानि करीब 47% हथियार पाकिस्तान ही खरीदता है और पाकिस्तान बीजिंग का सबसे बड़ा हथियार ग्राहक है। पाकिस्तान के चीन बांग्लादेश को 16 प्रतिशत और थाईलैंड को 5 प्रतिशत हथियार बेचता है। चीन पर इस्लामाबाद की निर्भरता की सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान का संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ बिगड़ते संबंधों के कारण है। पाकिस्तान ने चीन से जो सबसे महत्वपूर्ण हथियार खरीदे हैं, उनमें J-10C और JF-17 फाइटर्स जेट, SH15 155mm ट्रक-माउंटेड हॉवित्जर, VT4 टैंक, HQ-16 और HQ-9 SAMs, टाइप 054A / P फ्रिगेट और हैंगर-क्लास पनडुब्बियां शामिल हैं।

एशिया ही रहा है चीन का बाजार
कुल मिलाकर साल 2017 से 2021 के बीच लगभग 79% चीनी हथियारों का निर्यात एशियाई देशों में ही किया गया है। इस दौरान 48 विभिन्न देशों ने चीनी उपकरण खरीदे। इसके साथ ही सबसे दिलचस्प बात ये है, कि चीन ना सिर्फ हथियारों का एक व्यापारी है, बल्कि चीन भारी संख्या में हथियारों का आयात भी करता है और हथियारों के आयात की बात करें, तो भारत, सऊदी अरब, मिस्र और ऑस्ट्रेलिया के बाद हथियारों की खरीददारी करने वाला पांचवां सबसे बड़ा देश चीन है। सिप्री की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012-16 में चीन ने कुल वैश्विक आयात का 4.4 प्रतिशत हथियार खरीदे थे, तो साल 2017-21 के बीच चीन ने कुल वैश्विक आयात का 4.8 प्रतिशत हथियार खरीदे।

चीन किस देश से खरीदता है हथियार
आपको जानकर हैरानी होगी, कि चीन उसी देश से सबसे ज्यादा हथियार खरीदता है, जो सबसे ज्यादा हथियार भारत को बेचता है। जी हां, चीन ने 2017 से 2021 के बीच अपने 81 प्रतिशत हथियार रूस से खरीदे हैं, जिसमें एस-400 मिसाइल सिस्टम भी शामिल है, वहीं रूस के बाद चीन ने 9.1 प्रतिशत हथियार फ्रांस से और 5.9 प्रतिशत हथियार यूक्नेन से खरीदे। वहीं, फ्रांस से चीन का हथियार खरीदने का आंकड़ा काफी चौंकाने वाला है, लेकिन SIPRI के डेटा के बारे में सावधानी बरतना महत्वपूर्ण है। फ्रांस की उपस्थिति अजीब है, और ज्यादातर इसलिए है, क्योंकि सिप्री फ्रांस को हेलीकॉप्टर बिक्री का श्रेय देता है, जबकि एयरबस हेलीकॉप्टर कंपनी ने दावा किया है, कि उसने अब पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को सैन्य हेलीकॉप्टर बिक्री या लाइसेंस देना बंद कर दिया है। हालांकि, सिप्री ने कहा है कि, अगले कुछ सालों में चीन की हथियारों के आयात में भारी कमी आएगी, क्योंकि चीन ने काफी तेजी से हथियारों का उत्पादन अपने ही देश में शुरू कर दिया है।

रूस की हथियार बिक्री पर पड़ेगा प्रभाव
हालांकि, अभी यह देखा जाना बाकी है, कि यूक्रेन पर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आक्रमण का रूसी हथियारों की बिक्री पर कितना नाटकीय प्रभाव पड़ेगा। 2016-21 के बीच रूस दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता था, जो वैश्विक निर्यात का 19% हिस्सा था। हालांकि, उससे पिछले के पांच वर्षों की तुलना करें, तो रूसी हथियारों की बिक्री में 26 प्रतिशत की कमी आई है। और यह तय है, कि यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी हथियार इंडस्ट्री बुरी तरह से प्रभावित होगी। कई देश रूस से हथियारों की खरीददारी फौरन बंद कर देंगे, साथ ही प्रतिबंधों की वजह से जो रूस अब तक काफी कम कीमत पर हथियारों की सप्लाई करता था, वैसा अब वह नहीं कर पाएगा और रूस को भी हथियार बनाने में भारी लागत आएगी। उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंटरी और माइक्रोचिप्स खरीदना रूस के लिए अब काफी मुश्किल होगा। वहीं, कई ऐसी असत्यापित रिपोर्ट्स हैं, कि कुछ रूसी हथियार संयंत्रों को अपना उत्पादन बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा है, क्योंकि हथियार बनाने के लिए कई जरूरी सामान अब खत्म हो गये हैं। यानि, रूसी रक्षा उद्योग की बढ़ती दुर्दशा कुछ देशों को चीन का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर करेंगी। लिहाजा, चीन के हथियार बाजार में एक उछाल आने की संभावना लगाई जा रही है।

क्या चीन ले पाएगा रूस का स्थान?
द जेम्सटाउन फाउंडेशन के लिए लिखे गये अपने एक लेख में रक्षा विशेषज्ञ जॉन एस. वान औडेनरेन और यानी नजेरियन ने लिखा है कि, ‘एशिया, मध्य पूर्व, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में सत्तावादी या हाईब्रिड शासन अभी तक रूस के प्रमुख ग्राहक रहे हैं, लिहाजा, चीन इस अंतर को भरने के लिए एक तार्किक उम्मीदवार प्रतीत हो सकता है। हालांकि, करीब से देखने पर यह भी पता चलता है कि, ज्यादातर देश रूसी हथियारों को चीनी हथियारों से बदलने के पक्ष में बिल्कुल भी नहीं हैं। वहीं, मध्य पूर्व के कुछ देश, जो रूस से काफी हथियार खरीदते हैं, वो भी अचानक चीन के हथियार बाजार की तरफ रूख नहीं करेंगे, जैसे सऊदी अरब, जो खुद अमेरिका से सबसे ज्यादा हथियार खरीदता है। इसके साथ ही यह भी ध्यान देने की जरूरत है, कि रूस के प्रमुख हथियार ग्राहकों में भारत और वियतनाम शामिल हैं, और ये दोनों देश, चीन से कभी भी हथियार नहीं खरीदेंगे। हालांकि, मिस्र और अल्जीरिया जैसे अन्य चीन से हथियार खरीद सकते हैं।

चीनी हथियारों की साख पर सवाल
हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि, चीन से हथियारों की खरीददारी करना उसके ग्राहकों के लिए काफी जोखिम भरा काम होता है, क्योंकि एक बार हथियार बेचने के बाद चीन फिर उन हथियारों को पलटकर नहीं देखता है और चीन के हथियारों की क्वालिटी भी काफी कमजोर होती है, जिसको लेकर पाकिस्तान की सेना कई बार अपना विरोध दर्ज करवा चुकी है। यानि, चीन से हथियार खरीदने वाले देशों को चीन से उतना ही उन हथियारों के रख-रखाव की सहायता की जरूरत होगी, जिसके लिए चीन का रिकॉर्ड खराब रहा है। उदाहरण के तौर पर जॉर्डन ने चीन से सीएच-4 ड्रोन तो खरीदा, लेकिन दो साल के अंदर में ही उसने उसे वापस लौटा दिया। वहीं, मोरक्को, नाइजीरिया और तुर्कमेनिस्तान जैसे अन्य देश भी चीनी सशस्त्र ड्रोन खरीदने वाले थे, लेकिन फिर चीन की शर्तों और उसके रिकॉर्ड को देखने के बाद उन्होंने तुर्की से ड्रोन खरीद लिए।

चीन की शर्तों में कई गड़बड़झाला
‘डिफेंस एक्विजिशन इन रसिया एंड चायना' नाम के एक स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि, चीन अगर किसी देश के साथ रक्षा क्षेत्र में करार करता है, तो उसके शर्तों में पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव रहता है। अगर हथियार काम ना करे या खराब हो जाए, तो चीन उसकी जिम्मेदारी लेने से हिचकिचाता है और बहुत बड़ा मदद करने से सीधे इनकार कर देता है। इसके साथ ही चीन को अनुबंध तैयार करता है, उसमें तकनीकी भाषा की स्पष्ट कमी रहती है और शेड्यूल में दायित्वों का अभाव रहता है और चीन ऐसा इसलिए करता है, ताकि चीन के रक्षा उद्योग में किसी भी तरह का कानूनी अड़चन नहीं आए और ना ही कोई और देश उसमें तांकझांक कर सके। लिहाजा, विशेषज्ञों का कहना है कि, चीन के लिए रक्षा उद्योग का नया खिलाड़ी बनना काफी मुश्किल दिख रहा है। (सभी तस्वीर- फाइल)












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