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फ्रांस में दक्षिणपंथ की हार और मैक्रॉन की जीत इतनी अहम क्यों है?

फ्रांसीसी गणतंत्र में 1958 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि चुना गया राष्ट्रपति फ्रांस के दो प्रमुख राजनीतिक दलों, सोशलिस्ट और रिपब्लिकन पार्टी से नहीं हैं।

पेरिस। इस वक्त दुनिया भर की निगाहें फ्रांस पर टिकी हुई हैं। दरअसल, वहां एक मजबूत विचारधारा दक्षिणपंथ की हार हुई है। 39 वर्षीय इमैनुएल मैक्रॉन ने राष्ट्रपति के चुनाव में मरीन ले पेन को हराकर इतिहास रच दिया है। मैक्रॉन फ्रेंच फिफ्थ रिपब्लिक के 59 वर्ष के इतिहास में सबसे युवा राष्ट्रपति निर्वाचित हुए हैं। इमैनुएल मैक्रॉन के यूरोपीय यूनियन और फ्री-ट्रेड के समर्थक होने से ग्लोबल बाजार को राहत मिली है। इस जीत के बाद मैक्रॉन ने कहा कि आगे बड़ी चुनौतियां हैं जिनसे निपटने के लिए पूरे देश का साथ चाहिए। मैक्रॉन की जीत के जश्न में ग्लोबल बाजर में रौनक लौट आई है।

फ्रांस में दक्षिणपंथ की हार, मैक्रॉन की जीत इतनी अहम क्यों?

दुनियाभर के बाजारों से शानदार संकेत मिल रहे हैं। 39 साल के मैक्रॉन फ्रांस के इतिहास में सबसे युवा राष्ट्रपति हैं। इमैनुएल मैक्रॉन को चुनाव में 65 फीसदी वोट मिले हैं। अब उनके सामने रोजगार और इकोनॉमिक ग्रोथ को बढ़ाने की चुनौती होगी। मैक्रॉन की जीत इतनी अहम क्यों है? अगर इस सवाल पर नजर डालें तो दक्षिणपंथी ली पेन को डॉनल्ड ट्रंप, ब्लादिमिर पुतिन का समर्थन था। वहीं इमैनुएल मैक्रॉन दुनियाभर में फ्री-ट्रेड के समर्थक हैं। इमैनुएल मैक्रॉन पूर्व बैंकर हैं और इनको राजनीति का बहुत ही कम अनुभव है।

मैक्रॉन को यूरोपीय यूनियन का समर्थक माना जाता है। इमैनुएल मैक्रॉन की जीत से बाजारों को भी राहत मिलेगी। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ने फ्रांस का राष्ट्रपति चुने जाने पर इमैनुएल मैक्रॉन को बधाई दी और कहा कि वह द्विपक्षीय संबंधों को अधिक सुदृढ़ बनाने की खातिर उनके साथ काम करने को लेकर आशान्वित हैं। यद्यपि फ्रांस भारत का पुराना साथी रहा है, पर नए हालात में भारत के प्रति उसका क्या रहता है, यह देखने वाली बात होगी।

आपको बता दें कि शुरुआती रुझानों से ही यह लगने लगा था कि 65 फीसदी से अधिक वोटों के साथ इमैनुएल मैक्रॉन की जीत होगी। वहीं उनके प्रतिद्वंद्वी और धुर दक्षिणपंथी मरीन ले पेन को मात्र 34.9 फीसदी वोट ही मिले। राष्ट्रपति चुनने के लिए 07 मई को मतदान हुआ था। सर्वेक्षणों में मैक्रॉन को 62 और ली पेन को 38 फीसदी वोट मिलने की संभावना जताई गई थी। दोनों ही दल मुख्य धारा के राजनीतिक दलों सोशलिस्ट, रिपब्लिकन को पछाड़ कर दौड़ में आगे निकले। जानकारों का कहना है कि फ्रांसीसी गणतंत्र में 1958 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि चुना गया राष्ट्रपति फ्रांस के दो प्रमुख राजनीतिक दलों, सोशलिस्ट और रिपब्लिकन पार्टी से नहीं हैं।

इस चुनाव से पहले ओलांद की सरकार में मंत्री रहे इमैनुएल मैक्रॉन ने इस्तीफा देकर अपनी पार्टी के साथ चुनाव मैदान में उतरे थे। जबकि उन्हें राजनीति में ओलांद ही लेकर आए थे। पिछले दो वर्ष में कई आतंकी हमलों को देखते हुए करीब 50 हजार सुरक्षाकर्मियों को चुनाव ड्यूटी पर लगाया गया था। मतदान के एक दिन पहले या 06 मई को मैकरॉन के प्रचार अभियान में जबरदस्त हैकिंग सामने आई थी। इसने अमेरिकी चुनाव में हिलेरी क्लिंटन के कैंपेन में सेंधमारी की याद दिला दी। हालांकि रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन ने जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल को भरोसा दिलाया कि हैकिंग में रूस का कोई हाथ नहीं है।

अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी पेन को भारी मतों से हराने के बाद मैक्रॉन पेरिस के लूव्र म्यूज़ियम के सामने में लागभग 18 हज़ार समर्थकों को संबोधित किया। इस सभा के दौरान मैक्रॉन के समर्थकों में व्यापक खुशी की लहर देखी जा रही थी। मैक्रॉन के समर्थक खुशी से झूम रहे थे। इसी दरम्यान मैक्रॉन ने समर्थकों के बीच पहुंचकर कहा कि ये फ्रांस की जीत है। ये फ्रांस के इतिहास का नया अध्याय है। मैं चाहता हूं कि ये पन्ना उम्मीद और नए विश्वास का हो। उन्होंने कहा कि वो देश के लोगों के गु्स्से, चिंता और शंकाओं से वाकिफ़ हैं और राष्ट्रपति के तौर पर पांच साल तक वो फ्रांस को विभाजित करने वाली ताकतों से लड़ते रहेंगे।

उन्होंने फ्रांस की एकता की गारंटी देने और यूरोप की रक्षा और बचाव का वादा भी किया। मैक्रॉन ने कहा कि हमारे सामने काम करने का बहुत बड़ा लक्ष्य है, जिसकी शुरूआत अभी और इसी वक्त से हो रही है। कहा कि हमें सार्वजनिक जीवन में नैतिकता वापस लानी होगी, लोकतंत्र की जीवन शक्ति को वापस लाना होगा, हमारी अर्थव्यवस्था में प्राण फूंकने होंगे, यूरोप को पुनर्गठित करने के लिए सबको जगह देनी होगी और फ्रांस के सभी लोगों को सुरक्षा देनी होगी। उन्होंने चरमपंथ और पर्यावरण में बदलाव से भी लड़ने का वादा किया। मैक्रॉन के साथ उनकी पत्नी ब्रिजिट भी मंच पर पहुंचीं। मैक्रॉन ने अपनी प्रतिद्वंद्वी पेन को वोट देने वाले मतदाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि वो पूरी कोशिश करेंगे कि उनके पास भविष्य में कट्टरपंथ को कभी वोट देने का कोई कारण न रहे।

उल्लेखनीय है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में फ्रांस की धमक पहले से कायम है, लेकिन भारत की धमक भी बढ़ रही है। सामरिक और आर्थिक समेत अनेक अन्य क्षेत्रों में दोनों देशों की जुगलबंदी एक नये मुकाम को हासिल करना है। फ्रांस उन देशों में से एक है, जिसने कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी भारत का साथ दिया है, फिर चाहे वह कूटनीति के 'ग्रेट गेम' का क्षेत्र हो या सामरिक अथवा प्रौद्योगिकी का। इसका सीधा सा अर्थ है कि पेरिस की 'स्ट्रैटेजिक कैलकुलस' में नयी दिल्ली विशेष अहमियत रखती है।

ऐसे में बीते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पेरिस यात्रा से राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के भारत के वर्ष 2016 के गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि बनने के सफर के निहितार्थों को खोजना और समझना आवश्यक होगा, जो न केवल इन दोनों देशों के आर्थिक और रणनीतिक संबंधों के लिए खास महत्व रखते हैं, बल्कि वैश्विक कूटनीति के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था में आने वाले उतार-चढ़ाव के लिहाज से भी उपयोगी हो सकते हैं। वैसे पेरिस की जिंदादिली और चुनौतियों से निबटने के सहज व निर्णायक प्रयासों व प्रतिबद्धताओं से हम काफी कुछ सीख सकते हैं। बता दें कि वर्ष 1998 में पोखरण-2 के बाद ज्यादातर विकसित देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिया था। उस माहौल में फ्रांस ने भारत के साथ अपने रिश्ते को रणनीतिक स्तर पर आगे ले जाने का फैसला लिया था। सितंबर, 2008 में परमाणु सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) द्वारा भारत को असैन्य परमाणु व्यापार करने की छूट देने के कुछ समय बाद फ्रांस वह पहला देश था, जिसने भारत के साथ असैन्य परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किये।

राष्ट्रपति बनने के बाद मैक्रॉन के सामने कई चुनौतियां हैं। मैक्रॉन की पार्टी एन मार्शे के पास संसद में एक भी सीट नहीं है। अगले माह 11 और 18 जून को संसदीय चुनाव होने हैं। एन मार्शे को चुनाव लड़ना होगा, लेकिन मैक्रॉन को अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए मज़बूत गठबंधन का सहारा लेना पड़ सकता है। समझा जा रहा है कि इसमें मैक्रॉन सफलता हासिल कर लेंगे। क्योंकि कई पार्टियों ने राष्ट्रपति पद के लिए उनकी उम्मीदवारी का समर्थन सिर्फ पेन को हराने के लिए किया था।

यूं कहें कि मैक्रॉन को अपनी राजनीति को लेकर असहमत लोगों को अपनी तरफ़ करना होगा। अपने पहले संबोधन में मैक्रॉन ने वादा किया कि वो देश में मौजूद भेदभाव वाली शक्तियों से लड़ेंगे ताकि यूरोपीय संघ और उनके देशवासियों के बीच संपर्क को पुनर्स्थापित किया जा सके। वो विचारों के आधार पर बंटे हुए देश को जोड़ेंगे और चरमपंथ और जलवायु परिवर्तन के ख़तरों का मुकाबला करेंगे। पूर्व राष्ट्रपति फ़्रांस्वां ओलांद ने मैक्रॉन को बधाई देते हुए कहा कि चुनाव परिणामों ने दर्शाया है कि फ़्रांस के लोग 'गणतंत्र के मूल्यों' के लिए एकजुट होना चाह रहे थे। बहरहाल, अब देखना यह है कि फ्रांस में दक्षिणपंथी विचारधारा को पराजित करने वाले मैक्रॉन भारत में दक्षिणपंथी विचारधारा वाली पार्टी की सरकार के साथ किस तरह तालमेल बिठा पाते हैं। हालांकि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आशान्वित हैं कि फ्रांस के साथ भारत के रिश्ते बेहतर रहेंगे।

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