25 मंत्रालयों के साथ सरकार बनाएगा तालिबान, इन वजहों से सरकार के ऐलान में हो रही है देरी

काबुल पर कब्जा करना तालिबान के लिए आसान था, लेकिन सरकार बनाना तालिबान के लिए परेशानी का सबब साबित हो रहा है। तालिबान के अंदर भी अलग अलग ग्रुप्स हैं, जिन्हें सरकार में हिस्सेदारी चाहिए।

काबुल, सितंबर 04: तालिबान के सुत्रों ने पहले दावा किया था कि जुम्मे की नमाज के बाद अफगानिस्तान में नई सरकार का ऐलान किया जाएगा, लेकिन शुक्रवार को तालिबान की नई सरकार की घोषणा नहीं हो पाई। अब आज तालिबान के अफगानिस्तान में अपनी 'नई सरकार' की घोषणा करने की संभावना है। लेकिन, 15 अगस्त को काबुल पर कब्जा करने के बाद आखिर अब तक तालिबान अफगानिस्तान में सरकार क्यों नहीं बना पाया है?

तालिबानी सरकार का ढांचा तैयार

तालिबानी सरकार का ढांचा तैयार

तालिबानी सूत्रों के मुताबिक, तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादर नए अफगान शासन का नेतृत्व करने के लिए तैयार है। जिसमें तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे मुल्ला मोहम्मद याकूब शामिल होगा। मुल्ला याकूब के साथ सरकार में वरिष्ठ पदों पर शेर मोहम्मद अब्बास स्टानिकजई भी शामिल होगा। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान के सर्वोच्च धार्मिक नेता हैबतुल्लाह अखुंदज़ादा इस्लाम के ढांचे के भीतर धार्मिक मामलों और शासन पर ध्यान केंद्रित करेगा। लेकिन, माना जा रहा है कि तालिबान के अंदर भी सरकार बनाने को लेकर फूट पड़ चुकी है और तालिबान, जो कि अलग अलग आतंकी संगठनों की मदद से अफगानिस्तान पर कब्जा करने में कामयाब हो सका है, उनमें सरकार बनाने को लेकर काफी मतभेद है। वहीं, पंजशीर ने तालिबान की नाक में दम कर रखा था।

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    तालिबान सरकार में 25 मंत्रालय

    तालिबान सरकार में 25 मंत्रालय

    रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामिक आतंकवादी संगठन तालिबान की सरकार में 25 मंत्रालयों का गठन किया जाएगा, जिसमें 12 मुस्लिम विद्वानों की सलाहकार परिषद या शूरा शामिल होंगे। तालिबान के वरिष्ठ सत्र के मुताबिक, तालिबान ने अभी तक दूसरे अफगान नेताओं के साथ मिलकर एक आम सहमति के आधार पर सरकार बनाने की बात की थी, लेकिन अफगानिस्तान में अब जो अंतरिम सरकार बन रही है, उसमें केवल तालिबान सदस्य शामिल होंगे। उस सरकार में फिलहाल बाहरी लोगों को जगह नहीं दी जाएगी। इसके अलावा हक्कानी नेटवर्क भी सरकार में शामिल होगा।

    बड़ी एसेंबली का होगा निर्माण

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    मंत्रिमंडल पर विवाद

    मंत्रिमंडल पर विवाद

    कई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि तालिबान के अंदर मंत्रालय को लेकर विवाद की वजह से अभी तक मंत्रिमंडल को अंतिम रूप नहीं दिया गया है। और इस बारे में कोई निश्चित समय सीमा नहीं है कि अंतरिम सरकार के मंत्रिमंडल को कब अंतिम रूप दिया जाएगा। तालिबान से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि इस मामले को आज यानि शनिवार तक सुलझा लिया जाएगा, जबकि अन्य लोगों का मानना है कि इसमें अगले सप्ताह के मध्य तक का समय लग सकता है।

    पंजशीर बना तालिबान के लिए नासूर

    पंजशीर बना तालिबान के लिए नासूर

    एक तरफ तालिबान को सरकार बनाने में दिक्कतें आ रही हैं, तो पंजशीर प्रांत में अभी भी विद्रोह का ज्वाला भड़क रहा है। पिछले एक हफ्ते में तालिबान ने पंजशीर जीतने के लिए काफी तेज हमले किए हैं, लेकिन पंजशीर को कुछ नुकसान नहीं पहुंचा है। वहीं, इस लड़ाई में कम से कम एक हजार से ज्यादा इस्लामिक तालिबानी सुन्नी कट्टरपंथी आतंकी संगठन का सफाया हो गया। तालिबान अपनी पिछली सरकार में भी पंजशीर पर कब्जा नहीं कर पाया था। हालांकि, तालिबान की तरफ से बार-बार प्रोपेगेंडा किया जाता है कि पंजशीर पर कब्जा कर लिया गया है, लेकिन वो दावे गलत होते हैं। अफगानिस्तान के पूर्व उप-राष्ट्रपति अमरूल्ला सालेह ने एक वीडियो जारी किया है और कहा है कि वो अभी भी पंजशीर में हैं और अभी तक पंजशीर में तालिबानी आतंकियों को कदम रखने नहीं दिया गया है।

    पंजशीर से तालिबान को डर

    पंजशीर से तालिबान को डर

    तालिबान के खिलाफ पंजशीर में विरोधियों का जमावड़ा हो गया है। जहां अफगानिस्तान के पूर्व सैनिकों के साथ साथ विरोदी मिलिशिया भी मौजूद हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पंजशीर में करीब 10 हजार से ज्यादा लड़ाके मौजूद हैं, जो इस सुन्नी इस्लामिक आतंकवादी संगठन तालिबान के आतंकियों को लगातार मौत के घाट उतार रहे हैं। वहीं, ऐसी रिपोर्ट है कि पंजशीर में हथियारों का भंडार है, जिसकी वजह से तालिबान पंजशीर पर डायरेक्ट हमला करने की कोशिश नहीं कर रहा है। तालिबान को डर है कि अगर उसने पूरी शक्ति के साथ पंजशीर पर हमला किया तो पूरा अफगानिस्तान ही उसके हाथ से निकल जाएगा। लिहाजा, तालिबान के लिए पंजशीर गले ही हड्डी बन गया है।

    तालिबान शासन पर नजर

    तालिबान शासन पर नजर

    अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने के बाद पूरी दुनिया की नजर तालिबान पर है कि वो किस तरह की सरकार बनाता है और पूरी दुनिया के लोग 'वेंट एंड वाच' की मुद्रा में हैं। तालिबान के पास पैसा नहीं है और उसे सरकार चलाने के लिए चीन के अलावा पश्चिमी देशों पर ही निर्भर रहना होगा। चीन ने आर्थिक मदद करने की बात कही जरूर है, लेकिन चीन किसी भी देश पर ऐसे ही पैसा नहीं लगा देगा। वहीं, यूनिसेफ पिछले 15 दिनों में दो बार अलार्म जारी कर चुका है कि अगर जल्द से जल्द मानवीय सहायता अफगानिस्तान तक नहीं पहुंची तो एक करोड़ बच्चों पर मौत का खतरा है। वहीं, कई मानवाधिकार संगठनों ने कहा है कि अफगानिस्तान में भीषण मानवीय तबाही मचने वाली है।

    मान्यता नहीं देगा डेनमार्क

    मान्यता नहीं देगा डेनमार्क

    वहीं, डेनमार्क ने साफ तौर पर ऐलान कर दिया है कि वो किसी भी हाल में तालिबान की सरकार को मान्यता नहीं देगा। यूरोपीय यूनियन का प्रमुख देश होने के नाते डेनमार्क का यूरोप में काफी प्रभाव है। डेनमार्क के विदेश मंत्री जेप्पे कोफोड ने एक न्यूज चैनल को दिए गये इंटरव्यू में कहा है कि डेनमार्क किसी भी तालिबान सरकार को मान्यता नहीं देगा। डेनमार्क पहला देश बन गया है, जिसने तालिबान की सरकार को मान्यता देने से इनकार कर दिया है। वहीं, ब्रिटिश विदेश मंत्री डॉमिनिक रैब ने भी कहा कि, तालिबान से बातचीत का मतलब ये नहीं है कि ब्रिटेन तालिबान सरकार को मान्यता देने के लिए तैयार है। ऐसे में तालिबान के सामने दुनिया के सामने अपनी सरकार का चेहरा दिखाने की चुनौती है, कि वो किस तरह की सरकार बनाता है और उसकी सरकार में हर वर्ग की भागीदारी है या नहीं।

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