फ्रांस और रूस... गहरे दोस्त होकर भी भारत को क्यों नहीं देते हैं अपनी टेक्नोलॉजी?

3 मई को हथियार बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी नेवल ग्रुप ने भारतीय कंपनी के साथ मिलकर... पी-75 प्रोजेक्ट के तहत भारत में पनडुब्बी बनाने के लिए लगने वाली बोली में शामिल होने से इनकार कर दिया...

नई दिल्ली, मई 06: भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का फ्रांस में काफी भव्य स्वागत किया गया और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पीएम मोदी को गले लगातर अहसास कराने की कोशिश की, कि फ्रांस के लिए भारत कितनी अहमियत रखता है। यही हाल रूस का भी है। पिछले साल अगस्त महीने में जब भारत यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल का एक महीने के लिए अध्यक्ष बना था, तो पीएम मोदी के संबोधन के दौरान खुद रूसी राष्ट्रपति पुतिन पहुंच गये थे। यानि, रूस और फ्रांस.. जो कई मौकों पर साबित भी कर चुके हैं, कि वो भारत को काफी करीबी दोस्त मानते हैं, आखिर वो भारत के साथ हथियार बनाने की टेक्नोलॉजी शेयर क्यों नहीं करते हैं?

फ्रांसीसी कंपनी नहीं करेगी करार

फ्रांसीसी कंपनी नहीं करेगी करार

चार मई को पीएम मोदी फ्रांस के दौरे पर जाने वाले थे, लेकिन 3 मई को हथियार बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी नेवल ग्रुप ने भारतीय कंपनी के साथ मिलकर... पी-75 प्रोजेक्ट के तहत भारत में पनडुब्बी बनाने के लिए लगने वाली बोली में शामिल होने से इनकार कर दिया और ये भारत के लिए बहुत बड़ा झटका था। भारत के लिए पी-75 पनडुब्बी प्रोजेक्ट काफी ज्यादा अहमियत रखता है, जिसके तहत भारत सरकार, इंडियन नेवी के लिए भारतीय कंपनी की भागीदारी के साथ भारत में 6 पारंपरिक पनडुब्बियों का निर्माण करना चाहती है। सिर्फ फ्रांस ही नहीं, बल्कि इसी साल फरवरी महीने में रूस ने भी भारत में भारतीय कंपनी के साथ मिलकर पनडुब्बियों का निर्माण करने से इनकार कर दिया था। रूस की कंपनी ने भी फ्रांसीसी कंपनी की तरह ही दलील देते हुए कहा, कि प्रोजेक्ट-75 की जो शर्तें हैं, वो हमारे लिए सही नहीं हैं, इसीलिए हम इस प्रोजेक्ट में हिस्सा नहीं लेंगे।

जर्मनी और दक्षिण कोरिया भी उत्साहित नहीं

जर्मनी और दक्षिण कोरिया भी उत्साहित नहीं

सिर्फ रूस और फ्रांस ही नहीं, खुद को भारत का दोस्त बताने वाले दो और टेक्नोलॉजी के मामले में बड़े देश, जर्मनी और दक्षिण कोरिया कह चुके हैं, कि वो प्रोजेक्ट 75 की जो शर्तें हैं, उसके तहत भारत में पनडुब्बियों के निर्माण के लिए तैयार नहीं हैं। इन देशों की एक और बड़ी दलील ये है, कि भारत सरकार ने पी-75 पनडुब्बी प्रोजेक्ट के लिए जो बजट रखा है, वो कम है और इन कंपनियों ने भारत से बजट बढ़ाने की भी मांग की थी। इन कंपनियों का कहना है कि, भारत सरकार को 6 पनडुब्बियों के निर्माण के लिए करीब 10 अरब डॉलर का प्रोजेक्ट बनाना चाहिए, तभी वो इसमें शामिल होंगी और उसी के बाद इन कंपनियों ने भारतीय कंपनी के साथ पनडुब्बी बनाने के लिए टेक्नोलॉजी और सीक्रेट्स शेयर करने पर सहमति जताई है।

फ्रांसीसी कंपनी ने क्या कहा?

फ्रांसीसी कंपनी ने क्या कहा?

30 अप्रैल को फ्रांसीसी कंपनी नेवल ग्रुप के भारत हेड और मैनेजिंग डायरेक्टर लॉरेंट वैद्यु ने एक बयान में कहा था, कि 'वर्तमान आरएफपी (प्रस्ताव के लिए अनुरोध) के लिए यह जरूरी है, कि फ्यूल सेल एआईपी समुद्र में काम करने के लिए साबित हो, जो हमारे लिए अभी तक ऐसा नहीं है, क्योंकि फ्रांसीसी नौसेना इसका उपयोग नहीं करती है'। आपको बता दे कि, फ्यूल सेल एआईपी एक प्रणोदन प्रणाली है और एआईपी पारंपरिक पनडुब्बियों के लिए 'एयर इंडिपेंडेंट प्रपोल्शन टेक्नोलॉजी' है, और इसके जरिए पनडुब्बियों को काफी ज्यादा वक्त तक समुद्र के अंदर रहने की शत्ति मिलती है और पनडुब्बी को जलमग्न रहने की क्षमता प्रदान करती है। इसके साथ ही इस टेक्नोलॉजी की एक बड़ी खासियत ये है, कि ये डीजल-इलेक्ट्रिक प्रपोल्शन प्रणाली की तुलना में कम शोर करती है। जिससे दुश्मनों के रडार के लिए इसे पकड़ना काफी मुश्किल होता है। लेकिन, इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से दावा किया है, कि फ्रांसीसी कंपनी के पीछे हटने की वजह भारत के साथ टेक्नोलॉजी शेयर करने में उसकी असहजता है।

क्या है पी-75 पनडुब्बी प्रोजेक्ट?

क्या है पी-75 पनडुब्बी प्रोजेक्ट?

पी-75 प्रोजेक्ट भारत में पनडुब्बियों के निर्माण की दूसरी परियोजना है और ये परियोजना साल 1999 में ही पेश किया गया था। लेकिन, साल 2022 में भी अभी तक ये प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ है। इस प्रोजेक्ट के तहत 12 पनडुब्बियों का निर्माण होना था। और प्रोजेक्ट के फेज-1 के तहत भारतीय नौसेना समूह ने भारत में मझगांव डॉकयार्ड शिपबिल्डिंग लिमिटेड (MDL) के साथ साझेदारी में P-75 परियोजना के तहत छह कलवरी क्लास (स्कॉर्पीन क्लास) पारंपरिक पनडुब्बियों का निर्माण अभी ही पूरा किया है। पी-75 परियोजना पर 2005 में हस्ताक्षर किए गए थे (नौसेना समूह को तब DCNS कहा जाता था) और छह में से, चार पनडुब्बियों को पहले ही नौसेना में शामिल किया जा चुका है। इस क्लास में छठी पनडुब्बी को पिछले महीने लॉन्च किया गया था और अगले साल के अंत तक इसके चालू होने की उम्मीद है। भारत सरकार ने इसके लिए 43 हजार करोड़ का बजट रखा है और सरकार की कोशिश है, कि इसकी टेक्नोलॉजी भारतीय कंपनी को मिलने के बाद हम आगे खुद पनडुब्बियों का निर्माण करें, लेकिन फ्रांस हो या रूस या फिर जर्मनी या फिर दक्षिण कोरिया... ये भारत को टेक्नोलॉजी देना ही नहीं चाहते हैं।

क्यों पीछे हट रही हैं ये कंपनियां?

क्यों पीछे हट रही हैं ये कंपनियां?

भारत ने इस प्रोजेक्ट के लिए 73 हजार करोड़ का फंड रखा है, लेकिन इन कंपनियों का मानना है, कि ये फंड इस प्रोडेक्ट के लिए कम हैं, लिहाजा ये कंपनियां अलग अलग बहाने बना रही हैं। जैसे फ्रांसीसी कंपनी ने कहा है कि, उसके पास जो 'एयर इंडिपेंडेंट प्रपोल्शन टेक्नोलॉजी' है, उसने उसकी जांच नहीं की है और फ्रांसीसी कंपनी की ये दलील एक्सपर्ट्स के गले से नीचे नहीं उतर रही है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि, ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी की शर्त फ्रांसीसी कंपनी को मंजूर नहीं है। फ्रांसीसी कंपनी को लगता है, कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए उसे और पैसे मिलने चाहिए। वहीं, रूस भी चाहता है, कि वो इस प्रोजेक्ट में भारतीय कंपनी के साथ मिलकर काम नहीं करे। रूस का कहना है, कि वो पहले के प्रोजेक्ट्स की तरह ही वो इस टेक्नोलॉजी के साथ पनडुब्बी बनाकर भारत को दे देगा। लेकिन, भारत ने बनी बनाई पनडुब्बी खरीदने से इनकार कर दिया।

भारत के पास क्या हैं विकल्प?

भारत के पास क्या हैं विकल्प?

कुल मिलाकर भारत को फ्रांस, रूस, जर्मनी और दक्षिण कोरिया... अपने चार विश्वस्त पार्टनर्स से निराशा मिल चुकी है। तो फिर भारत के पास क्या विकल्प हैं? भारत को अभी भी निराश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि पिछले साल डीआरडीओ ने कहा था, कि उसने एआईपी टेक्नोलॉजी विकसित कर ली है, हालांकि उसकी क्वालिटी फ्रांस जैसी नहीं है। लेकिन, अब ऐसा लगता है, कि भारत सरकार डीआरडीओ की ही टेक्नोलॉजी के साथ आगे बढ़ेगी और उस टेक्नोलॉजी को ही और उन्नत करने की कोशिश करेगी, ताकि भारतीय कंपनियों की क्षमता में वृद्धि होने के साथ साथ हम आने वाले वक्त में इन कंपनियों पर अपनी निर्भरता कम कर सकें। हालांकि, दिक्कत ये है, कि डीआरडीओ की टेक्नोलॉजी के साथ चलने पर पनडुब्बी प्रोजेक्ट के फाइनल होने में कुछ साल और लग जाएंगे, जबकि ये प्रोजेक्ट पहले से ही काफी लेट चल रहा है। लेकिन, भले ही ये प्रोजेक्ट कुछ साल और लेट हो जाए, लेकिन प्रोजेक्ट फाइनल होने पर भारतीय कंपनियों का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा और हम आगे जाकर बेहतर हथियारों का निर्माण भी कर पाएंगे।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+