ईरान पर भारत को अमरीका ने इतनी बड़ी छूट क्यों दी

ट्रंप और मोदी
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ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध के बावजूद अमरीका ने भारत को ईरान से तेल ख़रीदने की छूट दे दी है. कहा जा रहा है कि अगले लोकसभा चुनाव तक नरेंद्र मोदी सरकार को राहत मिल गई है.

इसके साथ ही भारत ईरान को निर्यात भी कर सकेगा. तेल की बढ़ती क़ीमतों के बीच अमरीका की इस छूट को चुनावी मौसम में मोदी सरकार के लिए राहत की तरह देखा जा रहा है.

भारतीय मुद्रा रुपया डॉलर की तुलना में 74 रुपये तक पहुंच गया है ऐसे में भारत के तेल आयात का बिल भी स्वाभाविक रूप से बढ़ रहा है. दूसरी तरफ़ भारत का व्यापार घाटा भी बढ़ रहा है.

पिछले कुछ हफ़्तों से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत में भी गिरावट आई है. दूसरी तरफ़ ईरान भारत को रुपए में भी तेल देता है. जब भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार गिरावट आ रही है, ऐसे में बिना डॉलर दिए रुपए से तेल मिलना मायने रखता है.

ट्रंप प्रशासन ने इस मामले में भारत समेत आठ देशों को छूट दी है. हालांकि यह छूट ईरान से सीमित तेल ख़रीदने के लिए है. जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत पिछले तीन महीनों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है, ऐसे में अमरीकी प्रतिबंध से तेल की आपूर्ति में कमी की आशंका भी जताई जा रही है.

ईरान-अमरीका
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भारत को छूट क्यों

अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने पिछले हफ़्ते शुक्रवार को कहा था कि आठ देशों को छूट तेल की क़ीमत स्थिर रखने के लिए दी गई है. पिछले महीने तक अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत चार सालों में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई थी.

अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो और वित्त मंत्री स्टीवन मनुचिन ने आठों देशों के नाम बताने से इनकार कर दिया है. प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पत्रकारों ने उन देशों के नाम पूछे थे. हालांकि कहा जा रहा है कि इन आठ देशों को भी ईरान से तेल का आयात धीरे-धीरे कम करना होगा.

अमरीकी छूट के मामले में तीन देशों के नाम अंतरराष्ट्रीय मीडिया में बताए जा रहे हैं. ये देश हैं- जापान, भारत और दक्षिण कोरिया. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक़ चीन भी ऐसी छूट पाने की कोशिश कर रहा है.

हालांकि पॉम्पियो ने साफ़ कर दिया है कि ईयू के देशों को इसकी छूट नहीं दी गई है. पॉम्पियो ने दावा किया है कि ईरान से तेल नहीं ख़रीदने का असर तेल की क़ीमतों पर नहीं पड़ेगा. दूसरी तरफ़ तेल के बाज़ार पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि अमरीकी प्रतिबंध से तेल की क़ीमत बढ़ेगी.

अमरीका और ट्रंप
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अमरीका और ट्रंप

2017-18 में भारत ने ईरान से 2.2 करोड़ टन तेल आयात किया था और अगले साल तीन करोड़ टन ख़रीदने की योजना है. प्रतिबंधों के कारण 2019 के मार्च से भारतीय कंपनियां ईरान से हर महीने सवा दस लाख टन तेल ही ख़रीद सकेंगी. ईरान का कहना है कि वो अमरीकी प्रतिबंधों से अमरीका के सामने हथियार नहीं डालेगा.

भारत और ईरान की दोस्ती

भारत और ईरान के बीच दोस्ती के मुख्य रूप से दो आधार हैं. एक भारत की ऊर्जा ज़रूरतें हैं और दूसरा ईरान के बाद दुनिया में सबसे ज़्यादा शिया मुस्लिम भारत में हैं.

ईरान को लगता था कि भारत सद्दाम हुसैन के इराक़ के ज़्यादा क़रीब है. गल्फ़ को-ऑपरेशन काउंसिल से आर्थिक संबंध और भारतीय कामगारों के साथ प्रबंधन के क्षेत्र से जुड़ी प्रतिभाओं के कारण अरब देशों से भारत के मज़बूत संबंध रहे हैं.

भारत की ज़रूरतों के हिसाब से ईरान से तेल आपूर्ति कभी उत्साहजनक नहीं रही. इसके मुख्य कारण इस्लामिक क्रांति और इराक़-ईरान युद्ध रहे.

ईरान-अमरीका
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भारत भी ईरान से दोस्ती को मुक़ाम तक ले जाने में लंबे समय से हिचकता रहा है. 1991 में शीतयुद्ध ख़त्म होने के बाद सोवियत संघ का पतन हुआ तो दुनिया ने नई करवट ली. भारत के अमरीका से संबंध स्थापित हुए और अमरीका ने भारत को ईरान के क़रीब आने से हमेशा रोका.

इराक़ के साथ युद्ध के बाद से ईरान अपनी सेना को मज़बूत करने में लग गया था. उसी के बाद से ईरान की चाहत परमाणु बम बनाने की रही है और उसने परमाणु कार्यक्रम शुरू भी कर दिया था.

अमरीका किसी सूरत में नहीं चाहता था कि ईरान परमाणु शक्ति संपन्न बने और मध्य-पूर्व में उसका दबदबा बढ़े. ऐसे में अमरीका ने इस बात के लिए ज़ोर लगाया कि ईरान के बाक़ी दुनिया से संबंध सामान्य न होने पाएं.

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भारत-इसराइल मित्र तो ईरान कहां?

इसराइल और ईरान की दुश्मनी भी किसी से छिपी नहीं है. ईरान में 1979 की क्रांति के बाद ईरान और इसराइल में दुश्मनी और बढ़ी. इतने सालों बाद भी इसराइल और ईरान की दुश्मनी कम नहीं हुई है बल्कि और बढ़ी ही है.

दूसरी तरफ़ इसराइल और भारत क़रीब आते गए. भारत हार्डवेयर और सैन्य तकनीक के मामले में इसराइल पर निर्भर है. ऐसे में ईरान के साथ भारत के रिश्ते उस स्तर तक सामान्य नहीं हो पाए.

14 जुलाई, 2015 को जब अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के साथ परमाणु समझौते को अंजाम तक पहुंचाया तो भारत के लिए रिश्तों को आगे बढ़ाने का एक मौक़ा मिला. ओबामा का यह क़दम उन देशों के लिए मौक़ा था जो ईरान के साथ तेल व्यापार को बढ़ाना चाहते थे.

2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान गए थे. मोदी के दौरे को चाबाहार पोर्ट से जोड़ा गया. भारत के लिए यह पोर्ट चीन और पाकिस्तान की बढ़ती दोस्ती की काट के रूप में देखा जा रहा है.

ईरान और अमरीका
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स्वतंत्र विदेश नीति

भारत इस पोर्ट को लंबे समय से विकसित करना चाह रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण यह लटकता रहा. चाबाहार ट्रांसपोर्ट और ट्रांज़िट कॉरिडोर समझौते में भारत और ईरान के साथ अफ़ग़ानिस्तान भी शामिल है.

2016 में एक नवंबर को इंडियन बैंक ईरान में ब्रांच खोलने वाला तीसरा विदेशी बैंक बना था. इंडियन बैंक के अलावा ईरान में ओमान और दक्षिण कोरिया के बैंक हैं. इसके साथ ही एयर इंडिया ने नई दिल्ली से सीधे तेहरान के लिए उड़ान की घोषणा की थी.

मार्च 2017 में भारत और ईरान के बीच कई बड़े ऊर्जा समझौते हुए थे. ईरान के साथ भारत ने फ़रज़ाद बी समझौते को भी अंजाम तक पहुंचाया था. फ़ारस की खाड़ी में एक समुद्री ईरानी प्राकृतिक गैस की खोज 2008 में एक भारतीय टीम ने की थी.

भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इसी साल जून में अपनी सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में ईरान से जुड़े एक सवाल पर कहा कि भारत ईरान पर संयुक्त राष्ट्र की पाबंदियों को मानेगा न कि अमरीका के प्रतिबंधों को.

हालांकि, 2009 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव पर ईरान के ख़िलाफ़ वोट किया था और कहा जाता है कि भारत ने ऐसा अमरीकी दबाव में किया था.

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