Lt Gen JFR Jacob कौन थे? कैसे एक यहूदी अफसर ने पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया?-पूरा किस्सा
Who Is Lt Gen JFR Jacob: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दो दिवसीय (25-26 फरवरी 2026) दौरे पर इजरायल में हैं। पहले दिन पीएम मोदी ने इजरायल की संसद (नैसेट) में अपने भाषण में भारतीय सेना के बहादुर यहूदी अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल जेएफआर जैकब का जिक्र किया।
आपको बता दें कि, यह वही लेफ्टिनेंट हैं, जिनकी रणनीति और साहस ने 1971 के युद्ध में पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया था। आइए जानते हैं इनका पूरा किस्सा...

Who Is Lt Gen JFR Jacob: लेफ्टिनेंट जनरल जेएफआर जैकब कौन थे?
लेफ्टिनेंट जनरल जेकोब फारज राफेल जैकब (JFR Jacob) का जन्म 1923 में कोलकाता में एक बगदादी यहूदी परिवार में हुआ था। उनके पिता इराक के बगदाद से शरणार्थी बनकर भारत आए थे। उस दौर में इराक में यहूदियों पर बढ़ते अत्याचारों के कारण कई यहूदी परिवार भारत, यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में बस गए। भारत में यहूदी समुदाय बहुत छोटा है, लेकिन उन्होंने देश की सेवा में हमेशा योगदान दिया।
सैन्य करियर और 1962 का जज्बा
जैकब भारतीय सेना में कमीशंड अधिकारी बने। 1962 के भारत-चीन युद्ध में उन्होंने अदम्य वीरता दिखाई। तीन गोलियां लगने के बावजूद वे मोर्चे पर डटे रहे और अपनी ड्यूटी निभाते रहे। यही जज्बा 1971 में भी काम आया।
1971 War In Dhaka Historic: 1971 युद्ध- ढाका में ऐतिहासिक दिन
1971 के युद्ध के समय मेजर जनरल जेएफआर जैकब पूर्वी कमान के चीफ ऑफ स्टाफ थे। लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा पूर्वी कमान के कमांडर थे। जैकब की ही कुशलता और दृढ़ता के कारण पाकिस्तानी सेना के कमांडर जनरल एएके नियाजी ने 93,000 सैनिकों और अधिकारियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया।
16 December 1971 History : 'जेक, जाओ और आत्मसमर्पण करवा लो।'
सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ ने जैकब को फोन किया और कहा, 'जेक, जाओ और आत्मसमर्पण करवा लो।' जैकब ने पूछा कि क्या पहले भेजे गए मसौदे के आधार पर बात करनी है। मानेकशॉ ने जवाब दिया, 'तुम्हें पता है क्या करना है, बस जाओ।'
जैकब ने नियाजी के दोपहर के भोजन के निमंत्रण की जानकारी अरोड़ा को दी। अरोड़ा अपनी पत्नी को साथ ले जा रहे थे। जैकब ने चेतावनी दी कि यह जोखिम भरा है, लेकिन अरोड़ा ने कहा कि सुरक्षा की जिम्मेदारी जैकब की होगी।
जैकब अपने स्टाफ अधिकारी के साथ ढाका के लिए रवाना हुए। उन्होंने अपना तैयार किया हुआ आत्मसमर्पण मसौदा साथ लिया था (जिसे मुख्यालय से अभी मंजूरी नहीं मिली थी)। ईंधन बचाने के लिए उन्होंने जेस्सोर में हेलीकॉप्टर बदला। वहां एक संदेश मिला- 'भारत सरकार ने जनरल जैकब को जनरल नियाजी के साथ दोपहर का भोजन करने की मंजूरी दे दी है।'
ढाका पहुंचते ही संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी उनसे मिले और कहा कि वे पाकिस्तानी सैनिकों और नागरिकों की वापसी का प्रबंध करेंगे। जैकब ने धन्यवाद दिया लेकिन प्रस्ताव ठुकरा दिया। ढाका में मुक्ति वाहिनी और पाकिस्तानी सेना के बीच अभी भी गोलीबारी चल रही थी।
नियाजी के मुख्यालय तक का सफर
पाकिस्तानियों ने जैकब के लिए स्टाफ कार भेजी थी। रास्ते में मुक्ति वाहिनी के लड़ाकों ने कार पर गोलियां चला दीं। जैकब ने कार से कूदकर चिल्लाया - 'भारतीय सेना!' उनकी जैतून हरी वर्दी देखकर गोलीबारी रुक गई, लेकिन वे पाकिस्तानी चीफ ऑफ स्टाफ को मारना चाहते थे। जैकब ने उन्हें समझाया और आगे बढ़ने दिया।
मुख्यालय पहुंचकर जैकब ने देखा कि मेजर जनरल, नागरा नियाजी के कंधे पर हाथ रखकर पंजाबी में चुटकुले सुना रहे थे। जैकब ने नागरा को फटकार लगाई और ढाका, एयरपोर्ट तथा होटल में सुरक्षा के लिए सैनिक भेजने के आदेश दिए। उन्होंने रेस कोर्स पर आत्मसमर्पण समारोह की तैयारी का निर्देश भी दिया।
ब्लफ जिसने इतिहास बदल दिया
नियाजी ने पहले कहा कि वे केवल युद्धविराम और वापसी की बात करने आए हैं, आत्मसमर्पण नहीं। राव फरमान अली ने भी आपत्ति जताई। समय कम था। जैकब ने नियाजी को एक तरफ ले जाकर कहा- 'अगर आप आत्मसमर्पण नहीं करते तो मैं आपके परिवारों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं ले सकता। लेकिन अगर आप आत्मसमर्पण कर देते हैं तो मैं सुरक्षा सुनिश्चित करूंगा।'
- जैकब ने चेतावनी दी- 'मैं आपको 30 मिनट देता हूं। अगर नहीं माने तो मैं युद्ध शुरू कर दूंगा और ढाका पर बमबारी का आदेश दूंगा।' बाहर निकलकर वे प्रेस से मिले। अंदर वे बेहद चिंतित थे क्योंकि ढाका में नियाजी के 26,400 सैनिक थे और भारतीय सैनिक 30 मील दूर सिर्फ 3,000 के करीब थे।
- 30 मिनट बाद जब जैकब अंदर गए तो सन्नाटा था। मसौदा मेज पर रखा था। नियाजी चुप थे। जैकब ने तीन बार पूछा। कोई जवाब नहीं। फिर जैकब ने दस्तावेज उठाकर कहा - 'मैं इसे स्वीकृत मानता हूं।' नियाजी की आंखों में आंसू थे।
- जैकब ने रेस कोर्स पर सार्वजनिक समारोह की व्यवस्था की। नियाजी ने विरोध किया, लेकिन मान गए। उन्होंने अपनी तलवार की जगह रिवॉल्वर सौंपा। गार्ड ऑफ ऑनर की व्यवस्था हुई।
- दोपहर करीब 3 बजे नियाजी के साथ एयरपोर्ट पहुंचे। वहां मुक्ति वाहिनी के 'टाइगर' सिद्दीकी आ गए थे। जैकब ने उन्हें वापस भेजा और नियाजी की सुरक्षा सुनिश्चित की।
- शाम करीब 4:31 बजे (भारतीय मानक समय) अरोड़ा और नियाजी ने रेस कोर्स पर आत्मसमर्पण पत्र पर हस्ताक्षर किए। नियाजी ने अपना एपॉलेट और रिवॉल्वर सौंप दिया। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। भीड़ नारेबाजी कर रही थी। वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें सुरक्षित निकाला।
जैकब की विरासत क्या है?
इस एक दिन ने न सिर्फ 1971 के युद्ध का नतीजा तय किया बल्कि बांग्लादेश के जन्म को भी संभव बनाया। लेफ्टिनेंट जनरल जेएफआर जैकब (जो बाद में लेफ्टिनेंट जनरल बने) ने अपनी बहादुरी, रणनीति और साहस से इतिहास रचा। वे 2016 में गुजर गए, लेकिन उनकी कहानी आज भी हर भारतीय को गर्व और प्रेरणा देती है।
(सोर्स- स्क्रॉल डॉट इन)
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