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विदेशी मोर्च पर 2023 में अच्छे नंबरों से पास हुई सरकार, 2024 में चुनौतियां कर रही इंतजार.. रिपोर्ट कार्ड देखिए

India's Foreign Affairs in 2024: साल 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से कहा था, कि "यह युद्ध का युग नहीं है", फिर भी 2023 युद्धों का वर्ष बन गया। रूस और यूक्रेन के बीच लड़ाई जल्द ही अपने तीसरे वर्ष में प्रवेश करने वाली है, और हमास के 7 अक्टूबर के हमले से शुरू हुआ गाजा पट्टी में चल रहा युद्ध, अब हाल के दशकों के सबसे विनाशकारी संघर्षों में से एक में बदल गया है।

आगे झांककर देखें, तोदुनिया भर में अन्य संघर्ष स्पष्ट चुनौतियां पेश करते हैं। चीन की आक्रामकता कम नहीं हुई है, भले ही उसकी अर्थव्यवस्था में कठिनाई के कुछ संकेत दिखाई दे रहे हैं, फिर भी चीन का रूख पश्चिम और भारत को परेशान करने वाली हैं।

Indias Foreign Affairs in 2024

2023 में स्ट्रैटजिक वास्तविकताएं

1. मध्य पूर्व में संकट: इज़राइल और अरब दुनिया के बीच संबंधों को सामान्य बनाने के दो साल के लगातार कोशिशें चल रही थी, लेकिन 7 अक्टूबर को दक्षिणी इजराइल पर हमस के हमले के बाद ये बातचीत पटरी से उतर चुके हैं। हमास के हमले में करीब 1200 इजराइली मारे गये, जबकि इजराइल की जवाबी कार्रवाई में 20 हजार से ज्यादा फिलीस्तीनियों के मारे जाने का दावा किया गया है।

इजरायल-अरब सुलह प्रक्रिया फिलहाल पटरी से उतर गई है और गाजा का भविष्य अधर में फंस गया है।

2. भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव: प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति जो बाइडेन की एक-दूसरे की राजधानियों की सफल यात्राओं के बाद, अमेरिका में एक खालिस्तानी अलगाववादी के खिलाफ हत्या की साजिश में एक भारतीय अधिकारी के शामिल होने के आरोपों से द्विपक्षीय संबंधों को प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।

भारत की प्रतिक्रिया उस तरह से अलग रही है, जिस तरह से उसने कनाडा पर प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, जब प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत सरकार पर खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप लगाया था।

लेकिन, भारत ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, कि भारत कानून के शासन को मानता है और भारत ने सख्त कार्रवाई करते हुए 30 से ज्यादा कनाडाई राजनयिकों को नई दिल्ली से बाहर निकाल दिया। हालांकि, अमेरिका के मामले में भारत ने फौरन एक टीम का गठन किया और सरकार की तरफ से कहा गया, कि भारत मामले की जांच कर रहा है।

3- रूस-यूक्रेन युद्ध की थकान: जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ रहा है, यूक्रेन को पश्चिमी देशों से आर्थिक मदद मिलनी कम होती जा रही है। यूक्रेन को यूरोपीय संघ से €18.5 बिलियन और अमेरिकी पैकेज से 8 बिलियन डॉलर से अधिक मिलने की उम्मीद है जिसमें महत्वपूर्ण सैन्य सहायता भी शामिल है। लेकिन अब तक अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन और यूरोपीय संघ में हंगरी ने इस मदद को रोक रखा है।

इस बीच, रूस के राष्ट्रपति के रूप में पुतिन का दोबारा चुना जाना तय माना जा रहा है। प्रतिबंधों के बावजूद रूसी अर्थव्यवस्था लचीली रही है, और मॉस्को और बीजिंग के बीच निकटता पश्चिम को परेशान करती है।

4. भारत की मालदीव चुनौती: राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की सरकार, जिन्होंने सत्ता में आने के लिए "इंडिया आउट" अभियान चलाया था, उन्होंने भारत से मालदीव में तैनात सैन्य कर्मियों को वापस लेने के लिए कहा है। इसके अलावा उन्होंवे जल सर्वेक्षण समझौते को समाप्त करने के अपने इरादे से नई दिल्ली को अवगत कराया है। मोहम्मद मुइज्जू को चीन का प्यादा माना जाता है।

5. चीन, सबसे बड़ी चिंता: चीन भारत की सबसे बड़ी चिंता और रणनीतिक चुनौती बना हुआ है। सीमा पर गतिरोध चौथी साल सर्दी में है, और चीनी सैन्य उपस्थिति का मुकाबला करने के लिए भारतीय सैनिकों की मौजूदगी बरकरार रखी गई है। भारत के रणनीतिक रक्षा साझेदार मॉस्को की आर्थिक अस्तित्व के लिए बीजिंग पर निर्भरता और मालदीव के हिंद महासागर में चीन के करीब आने से चिंता बढ़ गई है।

6. जी20 और ग्लोबल साउथ का लीडर: जी20 शिखर सम्मेलन में भारत एक ज्वाइंट स्टेटमेंट पास करवाने में कामयाब रहा है और भारत के तरफ से इसे एक सफलता माना गया है। संयुक्त घोषणा पर बातचीत करने में भारत की सफलता अंतरराष्ट्रीय समुदाय में कई लोगों के लिए आश्चर्य की बात थी। जी20 प्रक्रिया की एक बड़ी उपलब्धि, नई दिल्ली द्वारा विकासशील और कम विकसित देशों को ग्लोबल साउथ की छत्रछाया में एकजुट करना था। ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने के विचार को भारत के गुटनिरपेक्ष नेतृत्व की विरासत को आगे बढ़ाने के रूप में देखा जाता है, जिसे केवल 21वीं सदी के लिए अनुकूलित किया गया है।

7. काबुल में इंगेजमेंट करता भारत: साल 2023 में नई दिल्ली में अफगानिस्तान दूतावास में बदलाव हुआ है, मौजूदा राजदूत के चले जाने और मुंबई और हैदराबाद में देश के राजनयिक कार्यभार संभालने के लिए आगे आ रहे हैं। अफगानिस्तान के मुंबई और हैदराबाद वाणिज्य दूतावास ने भारत को आश्वासन दिया है, कि वो तालिबानी झंडे का इस्तेमाल नहीं करेंगे और ना ही अपने ऑफिसियल पत्रों में तालिबान का जिक्र करेंगे।

लेकिन, भारत तालिबान के साथ जुड़ रहा है। काबुल में दूतावास में एक तकनीकी टीम तैनात की गई है, और नई दिल्ली में अफगान दूतावास में वर्तमान टीम अफगान नागरिकों के लिए पासपोर्ट और वीजा सेवाएं प्रदान करने के लिए शासन के साथ समन्वय कर रही है। चीन ने काबुल में पूर्णकालिक दूत तैनात किया है।

2024: चुनौतियां और अवसर

लोकसभा चुनाव के नतीजे भारत की रणनीतिक और विदेश नीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण होंगे।

यदि एनडीए मजबूत जनादेश के साथ वापस लौटता है, तो ज्यादातर वैश्विक मुद्दों और रिश्तों पर भारत की स्थिति मजबूत रहेगी, जिसमें और तेजी ही आएगी। लेकिन, यदि जनादेश कमज़ोर होता है, तो गठबंधन सरकार की मजबूरियां विदेश नीति पर भी प्रतिबिंबित हो सकती हैं।

हालांकि, जनादेश के बावजूद, भारत की विदेश नीति फिलहाल तेज रफ्तार और अपनी शर्तों के मुताबिक ही आगे बढ़ने वाली है।

आइये जानते हैं, कि भारत के सामने क्या चुनौतियां और क्या अवसरें हो सकती हैं?

1. अमेरिका और कनाडा संबंध: अमेरिका में खालिस्तानी अलगाववादी पन्नून की कथित 'हत्या की साजिश' से उत्पन्न स्थिति को हल करना एक चुनौती है। गणतंत्र दिवस समारोह के लिए बाइडेन की अनुपलब्धता से नई दिल्ली में कुछ नाराजगी हो सकती है, और क्वाड शिखर सम्मेलन को बाद की तारीख के लिए स्थगित करना पड़ा है, लेकिन न तो भारत और न ही अमेरिका, जो एक-दूसरे में गहराई से विश्वास करने के मजबूर हैं, वो संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डालना चाहते हैं।

इस बीच, कनाडा के आरोपों ने रिश्ते पर छाया डाल दी है। हालांकि, नई दिल्ली ने वीज़ा प्रतिबंधों को वापस ले लिया है, लेकिन भारतीय जनता की राय इस मुद्दे पर भारत सरकार के पक्ष में मजबूती से रही है, और यहां तक कि इसके सबसे खराब आलोचकों ने भी कनाडाई आरोपों पर भारत सरकार की आलोचना नहीं की है। अमेरिका के साथ व्यवहार करना कनाडा के साथ व्यवहार करने जैसा नहीं होगा, और नई दिल्ली उन्हें एक साथ नहीं जोड़ेगी।

2. पाकिस्तान में नई सरकार: 2019 के बाद से, जब भारत सरकार फिर से चुनी गई और जम्मू और कश्मीर में संवैधानिक परिवर्तन लागू हुए, पाकिस्तान के साथ संबंध निचले स्तर पर हैं। इस्लामाबाद और रावलपिंडी में सत्ता परिवर्तन से कोई खास फर्क नहीं पड़ा और भारत पाकिस्तान के प्रति उदासीनता के अपने सिद्धांत पर कायम रहा।

पाकिस्तान में अब चुनाव होने हैं और फरवरी के बाद वहां नई सरकार बन सकती है। एक बार लोकसभा चुनाव खत्म हो जाने के बाद, जुड़ाव फिर से शुरू करने का अवसर पैदा हो सकता है। क्या ऐसा होता है यह देखा जाना बाकी है।

अगर नवाज शरीफ फिर से प्रधानमंत्री बनते हैं, तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है, कि दोनों देशों के बीच एक बार फिर से बातचीत शुरू हो जाएगी।

3. बांग्लादेश में चुनाव: बांग्लादेश में तो जनवरी के पहले हफ्ते में ही लोकसभा के चुनाव होने जा रहे हैं और शेख हसीना, जो पिछले 15 सालों से बांग्लादेश की राजनीति में शीर्ष पर हैं, उनका एक बार फिर से प्रधानमंत्री बनना तय माना जा रहा है।

नई दिल्ली भी, नए साल की शुरुआत में होने वाले चुनावों में उनकी सत्ता में वापसी देखने के लिए उत्सुक होगी। सुरक्षा अनिवार्यताएं ढाका में भारत की पसंद का मार्गदर्शन करती हैं; 2000 के दशक की शुरुआत में खालिदा जिया सरकार के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए, बांग्लादेश विपक्ष को संदेह और शत्रुता की दृष्टि से देखा जाता है।

भारत अपने पूर्वोत्तर और बांग्लादेश के बीच कनेक्टिविटी में सुधार के प्रयासों को भी तेज़ गति से आगे बढ़ाना चाहेगा, जिससे क्षेत्र और दोनों देशों को लाभ होगा।

4. चीन के साथ गतिरोध जारी रहना: 2020 से जारी सीमा गतिरोध, भारत के लोकसभा चुनाव अभियान में दिखाई दे सकता है, और कोई भी ताजा वृद्धि, सुरक्षा माहौल और भारत के घरेलू राजनीतिक माहौल दोनों को प्रभावित करेगी। नई दिल्ली चुनावी वर्ष में अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी से चुनौती का जवाब देने में अतिरिक्त सावधानी बरतेगी। यह अनिवार्यता अगले कुछ महीनों में और बाद में भी चीन के प्रति भारत की कूटनीति को तैयार करेगी।

5. पश्चिम एशिया में आगे बढ़ने का रास्ता तलाशना: पिछले दो महीनों में संघर्ष ने भारत की स्थिति को बार बार टेस्ट किया है और इस अवधि के दौरान पश्चिम एशिया में लगातार संघर्ष विकसित होता रहा है। इज़राइल के लिए शुरुआती समर्थन से लेकर अपनी स्थिति को बेहतर बनाने और फिलिस्तीन के साथ संतुलन बनाने से लेकर, पिछले संयुक्त राष्ट्र वोट में युद्धविराम का आह्वान करने तक, भारत की कूटनीतिक स्थिति पर वैश्विक दक्षिण में कई लोगों की करीबी नजर रही है।

ग्लोबल साउथ ने इज़राइल के लिए भारत के शुरुआती समर्थन को अच्छा नहीं माना और यूनेस्को के उपाध्यक्ष के लिए वोट में पाकिस्तान से हार एक वास्तविकता की जांच थी।

इजराइल-हमास संघर्ष और तेज हो सकता है। अमेरिका और बाकी पश्चिमी देश अभी भी बेंजामिन नेतन्याहू के साथ मजबूती से खड़े हैं, लेकिन गाजा में तबाही अब लोगों को सहानुभूति बटोर रही हैं। संघर्ष में यह एक महत्वपूर्ण क्षण है, क्योंकि इसके अंत और उसके बाद क्या होगा, इस पर अधिक विचार किया जाता है।

6. यूक्रेन में युद्ध का भविष्य: रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी भारत की स्थिति का टेस्ट किया है। रूसी तेल का आयात घरेलू कीमतों को कम रखने के भारत के प्रयासों में महत्वपूर्ण रहा है, खासकर चुनावों से पहले। लेकिन अमेरिका के दबाव ने भारत को मॉस्को को कार्टे ब्लैंच देने से रोक दिया।

यह लगातार दूसरा साल रहा है, जब भारत और रूस के राष्ट्राध्यक्ष भारत-रूस शिखर सम्मेलन के लिए एक मंच पर नहीं आए। साल 2002 से शुरू हुआ ये सिलसिला 2021 में थम गया है। हालांकि, अगला सबसे अच्छा अवसर अगले साल रूस में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में बनेगा। इस बीच, युद्ध अभी भी जारी है, लिहाजा देखना दिलचस्प होगा, कि क्या ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने भारतीय प्रधानमंत्री रूस जाएंगे या नहीं।

7- पश्चिम के साथ व्यापार समझौते, तकनीकी साझेदारी: कहा जाता है कि यूके और यूरोपीय साझेदारों के साथ मुक्त व्यापार समझौते महत्वपूर्ण चरण में हैं। यूरोपीय संघ की संसद और संभवतः ब्रिटेन में चुनाव अगले साल होने हैं - और इससे वार्ताकारों के लिए नीतिगत स्थान और लचीलापन कम हो जाता है। फिर भी, 2024 में ये प्रमुख आर्थिक कूटनीति पहल कामयाब हो सकते हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा में उच्च तकनीक तक पहुंच में भारत की बाधाओं को दूर करने के लिए प्रौद्योगिकी और व्यापार पर अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ बातचीत अगले साल एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंचने वाला है और ये भारत के लिए अवसर बनाएगा, कि भारत इन सेक्टर्स पर समझौता करे।

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