चीन के अचानक सिकुड़ने का दुनिया पर क्या असर पड़ेगा? भारत कैसे बन जाएगा शक्ति का महाकेन्द्र?
चीन सरकार की रिसर्च में पता चला है कि, लोगों में बच्चा पैदा करने को लेकर अनिच्छा हो गई है और इसके पीछे वन चाइल्ड पॉलिसी के बाद चीन में बनी नई सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियां हैं।
बीजिंग, मई 31: दुनिया का सबसे बड़ा देश सिकुड़ने वाला है। चीन में दुनिया की आबादी का छठा हिस्सा है। चार असाधारण दशकों के बाद चीन की आबादी 66 करोड़ से बढ़कर एक अरब 40 करोड़ हो चुकी है, लेकिन इस साल 1959-1961 के खतरनाक अकाल के बाद पहली बार चीन की आबादी में अचानक से भारी कमी आ गई है। चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के लेटेस्ट आंकड़ों के अनुसार, चीन की जनसंख्या 2021 में एक अरब 41 करोड़ थी 12 लाख 212 थी और साल 2021 में चीन की जनसंख्या में सिर्फ 4 लाख 80 हजार की बढ़ोतरी हुई, जिसने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को हिला कर रख दिया है।

कोविड से संकट और ज्यादा बढ़ा
चीनी सरकार ने जो आंकड़े दिए हैं, वो यकीनन डराने वाले हैं और रिपोर्ट में जनसंख्या वृद्धि में रिकॉर्ड कमी के पीछे कोविड को सबसे बड़ा वजह बताया गया है और कहा गया है कि, कोविड की वजह से लोगों में बच्चा पैदा करने को लेकर अनिच्छा पैदा हो गई है और चीन की अर्थव्यवस्था में पिछले एक साल में आई गिरावट ने इसे और भी ज्यादा बढ़ा दिया है। चीनी सरकार के आंकड़े के मुताबिक, 1980 के दशक के अंत में चीन की कुल प्रजनन दर (प्रति महिला) 2.6 थी और चीन में मृत्यु दर 2.1 था। लेकिन साल 1994 के बाद से जन्म दर घटकर 1.6 से 1.7 के बीच आ गया। वहीं, साल 2020 में चीन में जन्मदर घटकर 1.3 हो गया, तो साल 2021 में जन्मदर घटकर 1.15 पर पहुंच चुका है। जबकि, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में जन्मदर 1.6 है और जापान में भी जन्मदर 1.3 है। इसीलिए जापान को अब बूढ़ों का देश कहा जाने लगा है।

बच्चे क्यों कम पैदा हो रहे हैं?
साल 2016 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने 'वन चाइल्ड पॉलिसी' को खत्म कर दिया और लोगों से बच्चों की संख्या बढ़ाने की अपील की, लेकिन ये अपील बेअसर हो गया है। वहीं, चीन में युवा ज्यादा बच्चे पैदा क्यों नहीं करना चाहते हैं, इसको लेकर कई रिसर्च कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से करवाए गये हैं और ये जानने की कोशिश की गई है, कि सरकार के प्रोत्साहन के बाद भी चीन की महिलाएं बच्चों को जन्म क्यों नहीं देना चाहती हैं? इस रिसर्च में पता चला है कि, पिछले 50 सालों से 'वन चाइल्ड' पॉलिसी की वजह से लोगों की छोटे परिवार में रहने की आदत हो चुकी है और उनके मन में दूसरा बच्चा पैदा करने को लेकर कई तरह के डर घर कर चुके हैं। वहीं, चीन में जीवन-यापन काफी महंगा हो चुका है और लोग दूसरा बच्चा पैदा कर इसे और भी मुश्किल नहीं करना चाहते हैं। वहीं, लोगों ने काफी देर से शादियां करनी शुरू कर दी हैं, जिससे भी बच्चे कम जन्म ले पा रहे हैं।

बिगड़ गया है लिंगानुपात
इसके साथ ही चीन में 'वन चाइल्ड' पॉलिसी की वजह से ज्यादातर चीनी परिवारों ने बेटी की जगह बेटे को जन्म देने का फैसला किया। जिसकी वजह से चीन में लिंगानुपात काफी खराब हो चुका है। चीन के कई राज्यों में 130 पुरूषों पर 100 से कम महिलाएं हैं, जिसकी वजह से हजारों चीनी युवाओं की शादियां ही नहीं हो पा रही हैं। वहीं, वन चाइल्ड पॉलिसी की वजह से चीन में पारिवारिक संतुलन भी खराब हो गया और घरों में लड़को पर इतना ध्यान दिया गया, कि बेटियां काफी पीछे छूट गईं। वहीं, घरों में महिलाओं पर काफी अत्याचार किए गये और चीन के परिवारों में महिलाओं को बात बात पर गाली देना आम हो गया। इसकी वजह से आधुनिक लड़कियों का शादी करने से विश्वास उठने लगा, क्योंकि उन्होंने अपनी मां को घर में प्रताड़ित होते देखा, लिहाजा लड़कियों ने शादी करने की जगह अपने करियर पर फोकस करना शुरू कर दिया और बच्चे पैदा करना उनकी लिस्ट से बाहर निकल गया।

अब लगातार घटेगी चीन की जनसंख्या
चायना अकेडमी ऑफ सोशल साइंस, शंघाई अकेडमी ऑफ सोशल साइंस ने अपनी रिसर्च रिपोर्ट में चिंता जताते हुए कहा है कि, साल 2029 से 2031 तक चीन जनसंख्या में बेहद मामूली बढ़ोतरी होगी और चीन की जनसंख्या एक अरब 41 करोड़ से बढ़कर सिर्फ एक अरब 46 करोड़ तक पहुंच सकती है। यानि, अगले 8 से 9 साल में चीन की जनसंख्या में सिर्फ 5 करोड़ का इजाफा होने का अनुमान लगाया गया है। वहीं, शंघाई सोशल अकेडमी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, साल 2100 तक चीन की जनसंख्या बुरी तरह से घटेगी और जनसंख्या सिर्फ 58 करोड़ 70 लाख ही रह जाएगी। इस भविष्यवाणी के पीछे अनुमान लगाया गया है कि, चीन की कुल प्रजनन दर 1.15 से घटकर 1.1 तक पहुंच जाएगी और इसी के आसपास साल 2100 तक रहेगी।

चीन की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर
जनसंख्या में तेजी से गिरावट का चीन की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा। चीन की कामकाजी उम्र की आबादी 2014 में चरम पर थी और 2100 तक चीन में कामकाजी लोगों की आबादी एक तिहाई से भी कम हो जाएगी, लिहाजा चीन की फैक्ट्रियों में काम करने के लिए लोग ही नहीं बचेंगे। वहीं, रिसर्च रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि, इस वक्त चीन में 100 कामयाजी लोगों को 20 बुजुर्ग लोगों को सपोर्ट करना पड़ता है, लेकिन साल 2100 में ये आंकड़ा पूरी तरह से बदल जाएगा और 100 कामकाजी लोगों को 120 बुजुर्गों को सपोर्ट करना पड़ेगा। जिसका मतलब ये हुआ, कि चीन की उस वक्त जो भी जनसंख्या होगी, उसमें बुजुर्गों की आबादी काफी ज्यादा होगी। वहीं, रिपोर्ट में कहा गया है कि, चीन में कामकाजी लोगों की कमी का असर अभी से दिखना शुरू हो गया है और चीन में लेबर कॉस्ट बढ़ना शुरू हो चुका है। चीन में इस वक्त लेबर कॉस्ट वियतनाम के मुकाबले दोगुना हो चुका है और रिपोर्ट में कहा गया है कि, इसका सीधा फायदा भारत और बांग्लादेश जैसे देशों को होगा, जहां की आबादी साल 2100 में भी संतुलित रहेगी।

बुजुर्गों पर चीन की लागत बढ़ेगी
जनसंख्या घटने के साथ ही चीन का बाजार भी सिकड़ जाएगा और चीन को अपने सामान बनाने से लेकर बेचने तक में काफी ज्यादा दिक्कतें आएंगी। चीन को अपने संसाधनों के विकास में काफी खर्च आएगा और उसे अपनी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की देखभाल में खर्च करना होगा, ताकि बढ़ती बुजुर्ग आबादी की मांगों को पूरा किया जा सके। वहीं, विक्टोरिया यूनिवर्सिटी में सेंटर ऑफ पॉलिसी स्टडीज द्वारा मॉडलिंग से पता चलता है कि चीन की पेंशन प्रणाली में बदलाव के बिना, इसका पेंशन भुगतान 2020 में सकल घरेलू उत्पाद के 4% से पांच गुना बढ़कर 2100 में सकल घरेलू उत्पाद का 20% हो जाएगा। इसके साथ ही लागत बढ़ने से चीनी सामान उतने सस्ते नहीं रहेंगे, जो अभी होते हैं।

भारत कैसे बनेगा शक्ति का महाकेन्द्र?
चीन के पास खुद का बाजार नहीं रहेगा, लिहाजा उसकी मोनोपॉली खत्म हो जाएगी। विक्टोरिया यूनिवर्सिटी में सेंटर ऑफ पॉलिसी स्टडीज ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, चीन को होने वाले इस नुकसान का डायरेक्ट फायदा भारत को होगा और भारत शक्ति के एक नये केन्द्र के तौर पर उभरेगा, जिसके पास आबादी भी रहेगी और उत्पादन क्षमता भी। रिपोर्ट में कहा गया है कि, चीन की शक्ति भारत में ट्रांसफर हो जाएगी और आने वाले कुछ दशकों में भारत चीन से आगे निकल जाएगा।












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