उतर बनाम दक्षिण.. जानिए कैसे ग्लोबल साउथ को आवाज देकर, सुपरपावर बनने के रास्ते पर निकला भारत?

G20 Summit: G20 नेताओं का शिखर सम्मेलन 9-10 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाला है। शिखर सम्मेलन की 18वीं बैठक में भारत पहली बार G20 की अध्यक्षता कर रहा है और जी20 घोषणापत्र को बैठक के अंत में वैश्विक नेताओं की घोषणा को अपनाया जाएगा।

शिखर सम्मेलन की अगुवाई में, भारत सरकार और खुद प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार 'ग्लोबल साउथ' शब्द का प्रयोग किया है। इस साल की शुरुआत में, वाराणसी में जी20 विकास मंत्रियों की बैठक में, प्रधान मंत्री ने कहा था, कि "विकास, ग्लोबल साउथ के लिए एक मुख्य मुद्दा है।"

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उत्तर बनाम दक्षिण

'ग्लोबल नॉर्थ' के साथ संयोजन में 'ग्लोबल साउथ' शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1967 में अमेरिकी एकेडमिक कार्ल ओग्लेसबी ने "सदियों के प्रभुत्व" को संदर्भित करने के लिए किया था, जिसके तहत विकसित देशों को ग्लोबल नॉर्थ और कमजोर-विकासशील देशों को ग्लोबल साउथ कहा जाता है। इस सदी के अंत तक यह टर्म काफी लोकप्रिय हो गया और अकसर वैश्विक नेताओं के मुंह से ये शब्द सुने जाते हैं।

ग्लोबल नॉर्थ और ग्लोबल साउथ के बीच का ये विभाजन, आज की वैश्विक राजनीति को काफी हद तक विभाजित करता है। पारंपरिक रूप से शक्तिशाली, औद्योगिकीकृत देशों को 'ग्लोबल नॉर्थ' के रूप में देखा जाता है, जबकि 'ग्लोबल साउथ' उन देशों को संदर्भित करता है जो अपनी विकास यात्रा में पीछे हैं।

हालांकि, ग्लोबल नॉर्थ और ग्लोबल साउथ में कोई भौगोलिक विभाजन नहीं है। यानि, विकसित देश, चाहे वन धरती के मानचित्र में कहीं भी हों, वो ग्लोबल नॉर्थ का ही हिस्सा कहे जाएंगे।

ग्लोबल साउथ में अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और ओशिनिया (ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बिना) के देश शामिल हैं, जबकि ग्लोबल नॉर्थ में यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड शामिल हैं।

पिछले साल, जिस दिन भारत ने G20 की अध्यक्षता संभाली (1 दिसंबर, 2022) थी, उस दिन भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था, कि भारत "ग्लोबल साउथ की आवाज़" बनेगा, जिसे ऐसे मंचों पर कम प्रतिनिधित्व दिया जाता है।

कैसे बंटते चले गये ग्लोबल नॉर्थ और साउथ

ये समझने के लिए, कि कैसे ग्लोबल साउथ और ग्लोबल नॉर्थ का विभाजन हुआ, हमें सबसे पहले ये समझना होगा, कि इंटरनेशनल रिलेशन में यह अस्तित्व में कैसे आया।

सीधे शब्दों में अगर समझें तो, नॉर्थ-साउथ विभाजन उपनिवेशवाद और औपनिवेशिक साम्राज्यों और उपनिवेशितों के बीच पदानुक्रमित संबंधों का एक उत्पाद है।

जैसे-जैसे औपनिवेशिक शक्तियों ने सबसे पहले औद्योगीकरण और विकास किया, उन्होंने अपने उपनिवेशों से मानव श्रम और संसाधनों का शोषण किया, जिसकी वजह से शक्ति का असंतुलन पैदा होता चला गया।

शक्ति का यह असंतुलन आधुनिक राष्ट्र राज्यों के बीच संबंधों को निर्धारित करना जारी रखता है, जो बड़े पैमाने पर उत्तर-दक्षिण विभाजन को प्रतिबिंबित करता है।

नॉर्थ और साउथ के बीच की दूरी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूरी तरह से सामने आ गई और मौजूदा हालात ये हैं, कि ग्लोबल साउथ, नॉर्थ की तुलना में अर्थव्यवस्था के लिहाज से काफी पिछड़ा हुआ है।

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नॉर्थ और साउथ के लिए अलग अलग मंच

साल 1945 के दुनिया में जो भी अंतर्राष्ट्रीय मंच या संस्थान बने, उनमें नॉर्थ बनाम साउथ की झलक देखी गई है। विकसित देशों को साथ लेकर अमेरिका ने कई मंच बनाए, जबकि गरीब देशों ने अपनी भलाई के लिए अलग से मंचों का निर्माण करना शुरू किया।

G20 के अस्तित्व में आने से बहुत पहले, 1970 के दशक के आर्थिक संकट के दौरान G7 का उदय हुआ। इसमें फ्रांस, कनाडा, इटली, पश्चिम जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और जापान शामिल थे, जो उस समय की सबसे मजबूत आर्थिक शक्तियां थीं।

हालांकि, इस दौरान अन्य G भी बने, विशेष रूप से दक्षिण के देशों में, जैसे जी77 (1964) और जी24 (1971)। ये बड़े पैमाने पर असफल समूह, वैश्विक शासन में उत्तर के प्रभुत्व को संतुलित करने की इच्छा से पैदा हुए थे। लेकिन ऐसा करके, उन्होंने भी नॉर्थ बनाम साउथ की इस विभाजन को बढ़ाने का ही काम किया।

चीन, भारत और ब्राजील का उदय

हालाँकि, 20वीं सदी के अंतिम दशक में प्रवेश करते हुए, नॉर्थ और साउथ का विभाजन, पहले की तरह स्पष्ट नहीं रह गया था। चीन, भारत और ब्राज़ील जैसी उभरती आर्थिक शक्तियों ने, उत्तर और दक्षिण दोनों की विशेषताओं का प्रदर्शन किया।

आर्थिक तौर पर चीन, भारत और ब्राजील ने कई विकसित देशों को पीछे छोड़ दिया है, लेकिन इन तीनों देशों की सामाजिक और राजनीतिक और देशों में रहने वाले लोगों के इनकम, विकसित देशों के मुकाबले काफी कम ही रहे।

उदाहरण के तौर पर, भारत भले ही दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत शीर्ष 100 देशों की लिस्ट से बाहर है।

लिहाजा, नॉर्थ और साउथ के बीच का विभाजन रेखा उलझ गया है। विकसित देशों के नेता चीन, भारत और ब्राजील को विकसित देशों में लाने की मांग करते हैं, जबकि ये तीनों देश सामाजिक स्थिति और प्रति व्यक्ति इनकम और अपनी भारी-भरकम जनसंख्या का हवाला देते हैं।

G20 की स्थापना एशियाई वित्तीय संकट के बाद हुई थी, लेकिन 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद यह वैश्विक भू-राजनीति में वास्तव में महत्वपूर्ण हो गया। चूंकि विश्व का अधिकांश भाग मंदी के प्रभाव से जूझ रहा था, और यह स्पष्ट हो गया, कि केवल उत्तरी देश ही सभी समस्या का समाधान प्रदान नहीं कर सकते हैं, लिहाजा वैश्विक चुनौतियों से निपटने के तरीके में ग्लोबल साउथ को काफी ज्यादा भूमिका निभाने की जरूरत महसूस होने लगी।

लिहाजा, शक्ति संतुलन स्थापित करने का कार्यभार भारत ने अपने कंधे पर उठाने की कोशिश की है और भारत की मंशा, ग्लोबल साउथ की आवाज बनने की है, ताकि चीन के निरंकुश और विस्तारवादी हरकतों के खिलाफ खुद को खड़ा किया जाए और विकास के क्रम में जो देश पीछे रह गये हैं, ग्लोबल प्लेटफॉर्म्स पर उन देशों की आवाज बना जाए और ये रास्ता ही, भारत को वैश्विक सुपरपावर बनने की दिशा में ले जाता है।

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