चेन्नई-व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर, हाईड्रोकार्बन, हथियार डील... भारत-रूस के बीच हुए ये ऐतिहासिक समझौते क्या हैं?
Chennai-Vladivostok Maritime Corridor: भारत और रूस चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारा स्थापित करने पर सहमत हो गये हैं, जो मॉस्को और नई दिल्ली के बीच संबंधों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने बुधवार को इसकी घोषणा कर दी है।
भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस वक्त रूस के दौरे पर हैं, जहां उन्होंने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोह और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की है। रूस और भारत के विदेश मंत्रियों के बीच की गई बैठक के दौरान चेन्नई-व्लादिवोस्तोक गलियारे को लेकर सहमति बनी है।

रूस के विदेश मंत्री ने गलियारे की घोषणा करते हुए कहा, कि "हमने वास्तविक सहयोग के निर्माण के मामलों पर खास तौर पर ध्यान दिया है। हम कई ऐसे कदमों पर सहमत हुए हैं, जो हमें सहयोग का विस्तार करने की इजाजत देते हैं, अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे का लॉन्च और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक मार्ग और उत्तरी समुद्री मार्ग की खोज पर सहयोग शामिल है।
भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर रूस की पांच दिवसीय यात्रा पर सोमवार को मास्को पहुंचे थे।
कितना महत्वपूर्ण है यह कॉरिडोर?
अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक, यानि पूर्वी समुद्री गलियारा, रूस के साथ भारत के पश्चिमी और पूर्वी दोनों तटों के बीच परिवहन गलियारे सुनिश्चित करेगा।
आपको बता दें, कि रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने बुधवार को जिस आईएनएसटीसी के "लॉन्च" की बात की, उस गलियारे का उपयोग पिछले साल पहली बार भारत जाने वाले रूसी माल के परिवहन के लिए किया जा चुका है और ये व्यापार मार्ग दोनों देशों के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद बन गया है, लिहाजा अब इसके विस्तार की बात की जा रही है।
INSTC की स्थापना सितंबर 2002 में ईरान, भारत और रूस के बीच की गई थी। 7,200 किलोमीटर लंबा मल्टी-मॉडल परिवहन गलियारा, ईरान और भारत के अलावा अफगानिस्तान, आर्मेनिया, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप के बीच माल की आवाजाही की सुविधा प्रदान करता है।
भारत और ईरान, दोनों इस परियोजना का समर्थन करते हैं। नई दिल्ली ने चाबहार बंदरगाह को आईएनएसटीसी ढांचे में शामिल करने का प्रस्ताव रखा है, जिसे वह ईरान के साथ विकसित कर रहा है।
भारत जाने वाला पहला रूसी माल, इस परिवहन गलियारे का उपयोग करके पहली बार ट्रेन से भेजा गया, जो पिछले साल ईरान पहुंचा था, और समुद्र के रास्ते भारत भेजे जाने से पहले कजाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के माध्यम से लगभग 3,800 किलोमीटर की दूरी तय कर चुका था।
भारत-रूस के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट?
जयशंकर और लावरोव, दोनों देशों के बीच संबंधों के "कानूनी ढांचे" का विस्तार करने पर भी सहमत हुए। विशेष रूप से, दोनों देश निवेश की पारस्परिक सुरक्षा पर समझौते को अपनाने और यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (ईएईयू) और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर आगामी समझौते को "तेज" करने पर सहमत हुए हैं।
क्या है चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्ग?
चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्ग स्थापित करने पर बनी सहमति, दोनों देशों के बीच बहुत बड़ी सफलता है।
यह मार्ग, जिसे पूर्वी समुद्री गलियारे के रूप में भी जाना जाता है, वो प्रशांत महासागर में रूस के व्लादिवोस्तोक बंदरगाह को कोरोमंडल तट पर चेन्नई के भारतीय बंदरगाह से जोड़ेगा।
दोनों पक्षों ने सितंबर में व्लादिवोस्तोक में आयोजित आठवीं पूर्वी आर्थिक मंच की बैठक के दौरान भी इस गलियारे के विकास पर चर्चा की थी।
चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारा रूसी सुदूर पूर्व और भारत के बीच सामान की यात्रा के समय को कम करके लगभग 24 दिन कर देगा, जो वर्तमान में सेंट पीटर्सबर्ग के बंदरगाह से मुंबई तक माल परिवहन में लगने वाले 40 दिनों से 16 दिन कम है।
इस समुद्री मार्ग से माल करीब 5,600 समुद्री मील की दूरी तय करेगा, जबकि वर्तमान सेंट पीटर्सबर्ग-मुंबई मार्ग 8,675 समुद्री मील की दूरी तय करता है।
नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत और रूस उत्तरी समुद्री मार्ग की खोज पर सहयोग करने पर भी सहमत हुए, जो आर्कटिक महासागर के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों को जोड़ेगा। यूरोप और एशिया के बीच की दूरी लगभग 8,000 किलोमीटर है।
लावरोव ने यह भी घोषणा की कि दोनों पक्ष भारतीय बाजार में रूसी हाइड्रोकार्बन के निर्यात का विस्तार करने पर सहमत हुए हैं।
संयुक्त संवाददाता सम्मेलन के दौरान जयशंकर ने कहा, "ऊर्जा पर, जैसा कि मैंने उल्लेख किया है, रूस में तेल और गैस में भारतीय निवेश के संदर्भ में हमारे बीच बहुत महत्वपूर्ण संबंध हैं, जिसका हम विस्तार करना चाहते हैं और परमाणु क्षेत्र में भी हम विस्तार चाहते हैं।"
इसके अलावा, लावरोव ने यह भी स्पष्ट किया, कि रूस "सैन्य संबंधों" में विविधता लाने की भारत की आकांक्षा को स्वीकार करता है और रक्षा उपकरणों के संदर्भ में "मेक इन इंडिया" के लक्ष्य में नई दिल्ली की मदद करने के लिए तैयार है।
दोनों विदेश मंत्रियों के बीच गाजा में संघर्ष, यूक्रेन में युद्ध, भारत-प्रशांत और आसियान संबंधों की स्थिति सहित भू-राजनीतिक स्थितियों पर भी चर्चा हुई।












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