SCO Meet: शंघाई सहयोग संगठन की एक साल की अध्यक्षता में भारत को क्या हासिल हुआ है? क्या है आगे की उम्मीदें...
विदेश मंत्री (ईएएम) एस जयशंकर ने गुरुवार को यहां शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक से इतर चीन, रूस और उज्बेकिस्तान के अपने समकक्षों के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं हैं।

SCO foreign ministers' meet in Goa: शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के आठ सदस्य देशों के विदेश मंत्री 5 मई को विदेश मंत्रियों की परिषद (सीएफएम) की बैठक में भाग लेने के लिए गुरुवार को गोवा पहुंचे हैं और आज इस बैठक का दूसरा और महत्वपूर्ण दिन है।
बैठक में भाग लेने वाले नेताओं में चीन के विदेश मंत्री किन गैंग, रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी शामिल हैं। बिलावल भुट्टो की यात्रा 2011 के बाद से पहली बार किसी पाकिस्तानी विदेश मंत्री की भारत यात्रा है। इससे पहले हिना रब्बानी खार ने भारत का दौरा किया था।
एससीओ के विदेश मंत्रियों की बैठक में कई अहम मुद्दों पर चर्चा हो रही है, जिनमें रूस-यूक्रेन युद्ध, आतंकवाद विरोधी चिंताएं, विशेष रूप से अफगानिस्तान में आतंकवाद, एससीओ में सुधार, और व्यापार में क्षेत्रीय करेंसी के इस्तेमाल के लिए तंत्र बनाना शामिल है, ताकि आपसी व्यापार भुगतान में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल संभव बनाया जा सके।
एससीओ में भारत का अहम स्थान
भारत पिछले एक साल के एससीओ का अध्यक्ष है और भारत के पास ये पद पर ऐसे समय पर आया है, जब चीन के साथ संबंध काफी तनावपूर्ण रहे हैं। चीन, इस संगठन के एक संस्थापक सदस्य में शामिल रहा है और लद्दाख में सीमा गतिरोध और अरुणाचल प्रदेश के संबंध में बीजिंग की आक्रामकता के कारण दोनों देशों के बीच आपसी विश्वसनीयता न्यूनतन स्तर तक पहुंच चुकी है।
वहीं, पूरी संभावना है, कि पाकिस्तान इस बैठक के दौरान कश्मीर का मुद्दा उठाए, जिसके बाद भारत के साथ पाकिस्तान का मुद्दा और भड़क सकता है।
हालांकि, इसके अलावा एससीओ संगठन में भारत को रूस का साथ पूरी तरह से मिलने की उम्मीद है, क्योंकि यूक्रेन में पिछले एक साल से चल रहे युद्ध के दौरान भारत ने अभी तक रूस की निंदा नहीं की है। वहीं, पिछले एक साल में भारत को सबसे ज्यादा तेल बेचने वाले देशों में रूस पहले स्थान पर आ गया है।
हालांकि, चीन की कोशिश एससीओ को एशिया का क्वाड बनाने की लंबे वक्त से रही है और उसे रूस और पाकिस्तान का पूरा समर्थन रहा है, लिहाजा भारत को इस मोर्चे पर मजबूती के साथ खड़ा हुआ है। एससीओ को हमेशा से पश्चिमी देशों ने एशिया में नाटो के खिलाफ एक गठबंधन माना है, हालांकि भारत ने लगातार इससे इनकार किया है।

एससीओ से भारत को क्या हैं फायदे?
ऊपर से देखने पर एससीओ चीन के प्रभाव वाला गठबंधन लगता है और बहुत हद तक ये सही भी है, लेकिन फिर भी एससीओ भारत के लिए काफी ज्यादा महत्वपूर्ण और लाभ पहुंचाने वाला संगठन रहा है। विश्लेषकों का कहना है, कि नई दिल्ली विश्व मंच पर अपनी भू-रणनीतिक स्थिति को बढ़ाने के लिए इस मंच को एक मौके की तरह इस्तेमाल कर रही है, जैसा कि वह अपने जी 20 अध्यक्षता के साथ कर रही है।
भारत इस साल जी20 शिखर सम्मेलन की भी अध्यक्षता कर रहा है, जिसकी बैठक सितंबर में होने वाली है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने गुरुवार को सर्गेई लावरोव, किन गैंग और एससीओ के महासचिव झांग मिंग के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं। झांग मिंग एक अनुभवी राजनयिक हैं, जिन्होंने यूरोपीय संघ (ईयू) में चीन के राजदूत के साथ-साथ चीनी विदेश मंत्रालय के उप महानिदेशक के रूप में काम किया है। हालांकि, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि जयशंकर कार्यक्रम के मौके पर अपने पाकिस्तानी समकक्ष के साथ बैठक करेंगे या नहीं।

एससीओ से भारत को उम्मीदें क्या हैं?
साल 2017 में भारत एससीओ का स्थायी सदस्य बना था और एससीओ में शामिल होने का भारत का फैसला, अफगानिस्तान में उभरती सुरक्षा स्थिति, यूरेशियन क्षेत्र के साथ कनेक्टिविटी, आतंकवाद का मुकाबला, नशीले पदार्थों के खिलाफ अभियान और ऊर्जा सहयोग के बारे में चिंताओं पर आधारित था।
भारतीय थिंक टैंक इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (आईसीडब्ल्यूए) की 2016 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया था, इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल भारत अपने ट्रेड को बढ़ाने और आतंकवाद के खिलाफ कारगर लड़ाई के लिए इस्तेमाल करना चाहता था।
Recommended Video

थिंक टैंक की रिपोर्ट में कहा गया था, कि "एससीओ मंच के जरिए भारत अन्य एससीओ सदस्य देशों के बीच विश्वास और सहयोग को बढ़ा सकता है। इस प्रकार, यह क्षेत्रीय संगठन यूरेशियन क्षेत्र में भारत के भू-रणनीतिक, सुरक्षा और आर्थिक हितों को बेहतर ढंग से पूरा करने में मदद कर सकता है"।
वहीं, दिप्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व राजदूत गौतम मुखोपाध्याय ने बताया, कि "भारत एससीओ मंच का इस्तेमाल अपनी क्षेत्रीय और वैश्विक ताकत को दिखाने के लिए करेगा, ना कि जैसा पाकिस्तान सोचता है, कि ये सिर्फ मध्य एशिया तक ही सीमित रहेगा।" उन्होंने कहा, कि अफगानिस्तान पर चर्चा, भारत के लिए क्षेत्र में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में अपनी भूमिका पर फिर से जोर देने का एक महत्वपूर्ण तरीका होगा।
उन्होंने कहा, कि "पाकिस्तान ने लंबे समय से अफगानिस्तान में भारत की हिस्सेदारी को कम करने की कोशिश की है, और काबुल से हमेशा से पाकिस्तान की अपेक्षा ये रही है, कि वो सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान की ही तरफ देखे। लेकिन अब ऐसा मुश्किल हो गया है, क्योंकि एससीओ अध्यक्ष के रूप में भारत इस क्षेत्र में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।"
इसी साल मार्च में, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और एससीओ सदस्य देशों के उनके समकक्षों ने अफगानिस्तान में आतंकवाद और नशीली दवाओं के उत्पादन में वृद्धि पर चर्चा करने के लिए नई दिल्ली में मुलाकात की थी। उससे एक महीने पहले, भारत में अफगानिस्तान के राजदूत फरीद मामुंडज़े ने दिप्रिंट को दिए एक साक्षात्कार में, भारत, चीन और रूस से अफगानिस्तान के संबंध में "एक ही पृष्ठ पर आने" का आग्रह किया था।












Click it and Unblock the Notifications