क्या होगा अगर कोरोना के खिलाफ कोई वैक्सीन सफल ना हुई, WHO साइंटिस्ट स्वामीनाथन का लेख

नई दिल्ली- अगर कोरोना वायरस की कोई कारगर वैक्सीन नहीं आ पाई तो दुनिया में कैसी स्थिति बनेगी, इसपर विश्व स्वास्थ्य संगठन की चीफ सांइिस्ट सौम्या स्वामिनाथन ने विस्तार से एक लेख लिखा है। उन्होंने उन हर संभावनाओं और परिस्थितियों पर बात की है, जो ऐसे हालात में पैदा हो सकते हैं। इसलिए उन्होंने लोगों और सरकारों से कहा है कि इस इंतजार में न बैठ जाएं कि वैक्सीन आने वाला है। बल्कि, इस रोग की रोकथाम के लिए जो भी कोशिशें चल रही हैं, वह हर हाल में चलती रहनी चाहिए। अगर वैक्सीन आ गई तो बहुत अच्छा और नहीं आई तो उसके लिए भी हर मुमकिन तैयारी पूरी होनी चाहिए।

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    WHO साइंटिस्ट Soumya Swaminathan ने बताया, क्या होगा अगर Corona Vaccine सफल ना हुई | वनइंडिया हिंदी
    12 से 18 महीने में वैक्सीन बनाने की चुनौती

    12 से 18 महीने में वैक्सीन बनाने की चुनौती

    विश्व स्वास्थ्य संगठन की चीफ साइंटिस्ट सौम्या स्वामिनाथन ने अपने लेख में लिखा है कि पिछले साल दिसंबर में कोरोना वायरस के पता लगने के दो महीने बाद ही वैक्सीन का इंसान पर ट्रायल शुरू कर दिया गया था। अमूमन एक वैक्सीन को विकसित करने में 5 से 10 साल तक लग सकते हैं, लेकिन कोरोना वायरस महामारी की गंभीरता को देखते हुए दुनियाभर के वैज्ञानिकों के सामने इसे 12 से 18 महीने के भीतर विकसित करने की चुनौती है। इस समय विश्वभर में 200 वैक्सीन पर अलग-अलग स्टेज में काम चल रहा है, जिनमें से कम से कम 24 इंसानों पर प्रयोग के चरण में हैं। इनमें से एक वैक्सीन ( COVAX) तैयार करने की एक प्रमुख कोशिश विश्व स्वास्थ्य की अगुवाई में ही हो रही है। इसी तरह यूके में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, चीन, अमेरिका, रूस, भारत, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राजील और कई दूसरे देशों में भी वैक्सीन विकसित करने का काम अलग-अलग चरणों में चल रहा है।

    इंसानी ट्रायल के विभिन्न चरण और उत्पादन

    इंसानी ट्रायल के विभिन्न चरण और उत्पादन

    उन्होंने वैक्सीन निर्माण के विभिन्न चरणों की बहुत संक्षेप में सटीक जानकारी दी है। इसकी शुरुआत पहले प्रयोगशाला में स्टडी से शुरू होती है, फिर जानवरों पर प्रयोग किया जाता है और उसके बाद इंसानों पर ट्रायल शुरू होती है। इंसानों पर ट्रायल के पहले फेज में सिर्फ 30 से 50 लोगों पर इसका प्रयोग करके यह देखा जाता है कि वैक्सीन मानव के लिए सुरक्षित तो है और इसका कोई बहुत भयावह साइड इफेक्ट तो नहीं हो रहा। दूसरे फेज में कुछ ज्यादा लोगों पर ट्रायल किया जाता है और इसकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता देखी जाती है। यह देखा जाता है कि वायरस के खिलाफ इम्यून किस तरह से काम करता है। तीसरे स्टेज में वैक्सीन के प्रभाव का आंकलन होता है या यह देखा जाता है कि यह वायरस के संक्रमण से कितने कारगर तरीके से एक बड़ी आबादी को सुरक्षित रख सकता है। इस फेज में ट्रायल सफल होने के बाद वैक्सीन को इस्तेमाल के लिए लाइसेंस मिल जाता है। आमतौर पर जब ट्रायल की सारी प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तभी वैक्सीन का उत्पादन शुरू होता है, लेकिन कोरोना वायरस के मामले में समय नहीं है, इसलिए कई कंपनियों में इसके उत्पादन की तैयारियां पहले से ही पूरी कर ली गई हैं, ताकि बहुत ही कम समय में वैक्सीन तैयार हो सके।

    अगर कोरोना की वैक्सीन कभी नहीं बनी तो क्या होगा?

    अगर कोरोना की वैक्सीन कभी नहीं बनी तो क्या होगा?

    सौम्या स्वामिनाथन ने उम्मीद जताई है कि कोई न कोई वैक्सीन या कई वैक्सीन काम जरूर करेगी। लेकिन, उन्होंने यह भी आगाह किया है कि हमें इसके लिए भी तैयार रहना होगा कि अगर ये शुरुआत की कोशिशें नाकाम हुईं तो क्या करेंगे ? उन्होंने कहा है कि अगर वैक्सीन नहीं मिलती है और नोवल कोरोना वायरस ज्यादा म्यूटेट (अपने में बदलाव) नहीं करता तो वायरस लोगों को तब तक संक्रमित करता रहेगा, जबतक ज्यादातर आबादी इम्यूनिटी नहीं प्राप्त कर लेती या कोई एंटीबॉडी इसके संक्रमण को रोकना नहीं शुरू कर देता। यह हर्ड इम्यूनिटी है, जो कि या तो वैक्सीन से हासिल की जा सकती या सामान्य रूप से संक्रमित होने के बाद प्राप्त हो जाती, लेकिन, इसके प्रभावी होने के लिए जरूरी है कि करीब 60 से 70 फीसदी आबादी में एंटीबॉडीज अवश्य हों।

    इलाज के बेहतर इंतजाम रखने की जरूरत

    इलाज के बेहतर इंतजाम रखने की जरूरत

    लेकिन, यदि वायरस म्यूटेट करता है तो वह या तो और ताकतवर हो सकता है या कमजोर पड़ सकता है। अगर यह मजबूत हो जाता है तो और भी ज्यादा तेजी से फैल सकता है। लेकिन, अगर यह कमजोर पड़ जाता है तो यह सांस संबंधी हल्के इंफेक्शन की तरह होकर रह सकता है, जैसे कि दूसरे कोरोना वायरसों के साथ है। सीधे कहें तो हमें बेहतर इलाज की तैयारी करके रखने की जरूरत है। ऑक्सीजन की उपलब्धता और बेहतर सपोर्टिव केयर के इंतजाम होने जरूरी हैं। हमें गंभीर रूप से बीमारों के लिए dexamethasone और remdesivir जैसी और कारगर दवाइयों का पर्याप्त इंतजाम रखना होगा, जो मरीजों के अस्पताल में रहने की अवधि को कम करता है। जबतक वैक्सीन नहीं आती हमें चिकित्सीय विकल्पों की तैयारी रखनी है, जिससे की इंसान की जान बचाई जा से।

    एहतियाती उपाय जारी रहने चाहिए

    एहतियाती उपाय जारी रहने चाहिए

    जबतक वैक्सीन नहीं बनती और वह आसानी से हर जगह उपलब्ध नहीं हो जाती, तबतक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने की कोशिशों लगातार जारी रहनी चाहिए, जैसा कि कई देशों में अभी भी लगातार चल रहा है। सबसे बड़ी बात उन्होंने ये कही है कि हमें यह सोचकर नहीं बैठ जाना चाहिए कि टीका बहुत करीब है और सारी समस्याओं का निदान मिलने वाला है, ऐसा नहीं है। उन्होंने साफ कहा है कम से कम दो सालों तक जबतक दुनियाभर में लोग इम्यूनिटी नहीं प्राप्त कर लेते कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, फिजीकल डिस्टेंसिंग, क्वारंटीन, मास्क और हाथ धोते रहने जैसे एहतियाती स्वास्थ्य के कदम चलते रहने चाहिए। वैक्सीन आए या न आए, कोरोना वायरस जिस कदर विश्वभर में फैल चुका है, उसका पूरी तरह से खत्म हो जाने की संभावना नहीं है। हो सकता है कि भविष्य में यह इंफेक्शन बहुत ही हल्का हो जाए और यह हमारे जीवन को प्रभावित करना बंद कर दे।

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