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ये कैसा दुर्भाग्य है! अफगानिस्तान से जान बचाकर यूक्रेन आए परिवार पर अब क्या गुजर रही है, जानिए...

मेडिका (पोलैंड), 28 फरवरी: यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद एक से बढ़कर एक दर्द भरी कहानियां सामने आ रही हैं। इस समय जो लोग यूक्रेन में अपना सबकुछ छोड़कर शरणार्थी बनकर दूसरे देशों में जाने को मजबूर हुए हैं, उनकी आपबीती सुनकर किसी का भी कलेजा पसीज जाएगा। अजमल रहमानी का परिवार भी उन्हीं बदकिस्मतों में शामिल है। पिछले साल से उनके परिवार पर जो बीत रही है, उसे चंद शब्दों में बयां करना असंभव है। वो एक युद्ध छोड़कर बेहतर जीवन के लिए छोटे-छोटे बच्चों के साथ यूक्रेन आकर बसे थे। लेकिन, आज रूसी हमले की वजह से उन्हें यहां से भी बेघर होना पड़ गया है।

ये कैसा दुर्भाग्य है!

ये कैसा दुर्भाग्य है!

एक साल हुए हैं। एक अफगानी परिवार ने शांति की तलाश में यूक्रेन में शरण ली थी। उसके पास उस समय और कोई विकल्प नहीं था। अजमल रहमानी और उनके परिवार को इस हफ्ते रूसी हमले के बाद मजबूरन यूक्रेन से भी भागना पड़ा है। इस बार वे लोग किसी तरह जान बचाकर पोलैंड पहुंचे हैं। एक विदेशी न्यूज एजेंसी एएफपी से रहमानी ने कहा है, 'मैं एक युद्ध से भागा, दूसरे देश में पहुंचा और एक नई जंग शुरू हो गई। बड़ा ही दुर्भाग्य है।' उनके साथ उनकी पत्नी मिना, सात साल की बेटी मारवा और 11 साल का बेटा उमर भी है। पूरा परिवार यूक्रेन की सीमा को पार करने के लिए कम से कम 30 किलोमीटर पैदल चलकर आया है, क्योंकि यूक्रेन की ओर बाधाएं ही बाधाएं खड़ी हो रही थीं।

पोलैंड में शरणार्थी बनकर पहुंचे हैं

पोलैंड में शरणार्थी बनकर पहुंचे हैं

पोलैंड पहुंचने पर रहमानी परिवार को भी बाकी शरणार्थियों की तरह ही बस का इंतजार करना था, जो कि उन्हें नजदीकी शहर प्रजेमायस्ल तक पहुंचाता। पिछले चार-पांच दिनों में इन जैसे सैकड़ों परिवार युद्धग्रस्त यूक्रेन छोड़कर मुख्य तौर पर पोलैंड, हंगरी और रोमानिया जैसे पड़ोसी मुल्कों में शरण ले रहे हैं। वैसे तो अधिकतर शरणार्थी यूक्रेन के ही नागरिक हैं, लेकिन उनमें एक बड़ी तादाद छात्रों और प्रवासी कामगारों की भी है, जो अफगानिस्तान, कांगो गणराज्य, भारत और नेपाल के नागरिक हैं।

'मेरा सबकुछ खत्म हो गया'

'मेरा सबकुछ खत्म हो गया'

40 वर्ष से ज्यादा उम्र के अफगानिस्तानी नागरिक रहमानी को अपना वतन इसलिए छोड़ना पड़ा, क्योंकि उन्होंने अफगानिस्तान के काबुल एयरपोर्ट पर 18 साल तक नाटो के लिए काम किया था। अमेरिकी सेना जब अफगानिस्तान छोड़कर निकली उससे चार महीने पहले ही रहमानी ने अफगानिस्तान छोड़ने का फैसला कर लिया था, क्योंकि उन्हें इतनी धमकियां मिल रही थीं कि उन्हें अपने बच्चों को स्कूल से भी निकालना पड़ गया था। उनके मुताबिक, 'अफगानिस्तान में मेरी जिंदगी अच्छी चल रही थी, हमारे पास अपना घर था, अपनी कार थी, मुझे अच्छी सैलरी मिलती थी।' लेकिन, 'मैंने अपनी कार, अपना घर, अपना सबकुछ बेच दिया। मेरा सबकुछ खत्म हो गया।'

यूक्रेन के ओडेसा में घर बनाया था

यूक्रेन के ओडेसा में घर बनाया था

वह बस इसी उम्मीद में यूक्रेन आए थे कि उनके लिए 'मेरे प्यार, मेरे पारिवारिक जीवन से बढ़कर कुछ भी नहीं है।' उनका कहना है कि अफगानिस्तान छोड़ने के लिए उन्हें वीजा की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने यूक्रेन आने का फैसला किया कि वही एक देश था, जो उन्हें उसके बिना उन्हें आने देता। उन्होंने काला सागर के तट पर स्थित यूक्रेन के बंदरगाह शहर ओडेसा में अपना एक घर बनाया। लेकिन, पिछले गुरुवार को जब रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण करना शुरू किया तो उन्हें एकबार फिर से सबकुछ छोड़कर भागना पड़ा और पोलैंड सीमा तक पहुंचने के लिए 1,110 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ी।

रहमानी जैसे परिवारों को भविष्य फिर अनिश्चित है

रहमानी जैसे परिवारों को भविष्य फिर अनिश्चित है

पोलैंड के अधिकारियों के मुताबिक गुरुवार से अबतक यूक्रेन से करीब 2,13,000 लोग सीमा पार करके उनके देश पहुंचे हैं। उनके मुताबिक रहमानी के परिवार की तरह बाकी सभी लोगों के पास अब पौलैंड के वीजा के रजिस्ट्रेशन के लिए 15 दिनों का वक्त है। रहमानी और उनके परिवार का भविष्य एकबार फिर अनिश्चित है। लेकिन, उन्हें इतने भर से ही तसल्ली है कि पोलैंड में स्वयंसेवियों और वहां के अधिकारियों ने उन लोगों का बहुत ही गर्मजोशी के साथ स्वागत किया है और उनकी हर तरह से सहायता की कोशिश कर रहे हैं। वो कहते हैं कि 'इसी से हमें ऊर्जा मिलती है।'(तस्वीरें- यूक्रेन से पोलैंड पहुंचे शरणार्थियों की)

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