कमजोर La Nina ने मौसम वैज्ञानिकों की बढ़ाई चिंता, भारत पर क्या असर होगा ? जानिए
नई दिल्ली, 10 सितंबर: विश्व मौसम संगठन ने इस साल कमजोर ला नीना के असर को लेकर दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। इसकी वजह से दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में ठंड में भी औसत से ज्यादा तापमान महसूस हो सकता है और दुनियाभर के कई इलाकों को औसत से ज्यादा बारिश का भी सामना करना पड़ सकता है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि मौसम से जुड़ी घटनाओं और उसके पैटर्न में तेजी से आ रहे बदलावों के पीछे जलवायु परिवर्तन बहुत बड़ा कारण है, जिसके लिए इंसान खुद जिम्मेदार है। गौरतलब है कि इस साल मानसून के दौरान दुनियाभर में कई जगह पर मौसम की असामान्य स्थिति देखने को मिली है। कहीं भयानक गर्मी के चलते जंगलों में आग लग गई तो कहीं बहुत ज्यादा बारिश ने तबाही मचा दिया।

कमजोर अल नीना का दुनिया पर असर
विश्व मौसम संगठन ने कहा है कि ला नीना के ठंडे प्रभाव के बावजदू अगले तीन महीनों तक खासकर पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में तापमान औसत से ज्यादा रहने वाला है। विश्व मौसम संगठन के मुताबिक इसके चलते उत्तरी अमेरिका के मध्य-पूर्वी हिस्से, एशिया के उत्तरी भाग और आर्कटिक के साथ-साथ अफ्रीका और दक्षिणी दक्षिण अमेरिका के मध्य और पूर्वी हिस्सों में इन महीनों में तापमान औसत से ज्यादा दर्ज किए जाने का अनुमान है। डब्ल्यूएमओ के मुताबिक ईएनएसओ (अल नीनो साउदर्न ऑसिलेशन)-न्यूटरल की संभावना 60 फीसदी और सितंबर-नवंबर में ला नीना की संभावना 40 फीसदी है; अक्टूबर-दिसंबर और नवंबर जनवरी में लगभग इसी तरह की संभावनाएं पैदा होंगी। इसके चलते उत्तरी एशिया, दक्षिणी अमेरिका और इंडोनेशिया के कुछ इलाकों से लेकर न्यूजीलैंड तक में इस साल इन महीनों में औसत से ज्यादा बारिश हो सकती है।

ला नीना क्या है ?
ला नीना का संबंध मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र के सतह के बड़े पैमाने पर ठंडा होने से है, जिसके चलते उष्णकटिबंधीय वायुमंडलीय प्रसार जैसे कि हवा, दबाव और बारिश के पैटर्न में बदलाव होता है। ला नीना का सीधा असर दुनियाभर के तापमान पर होता है और यह औसत से ज्यादा ठंडा हो जाता है। ला नीना के चलते भारत में काफी ठंड पड़ती है और दक्षिण भारत में बारिश भी अच्छी-खासी हो जाती है।

ला नीना और अल नीनो में अंतर
मौसम और पर्यावरण पर ला नीना का अल नीनो के मुकाबले ठीक विपरीत असर होता है। अल नीनो या अल नीनो साउदर्न ऑसिलेशन (ईएनएसओ) की वजह से मौसम या पर्यावरण पर जो प्रभाव पड़ता है उसके चलते भारी बारिश, बाढ़ या फिर सूखे जैसी समस्याएं खड़ी होती हैं। अगर भारत का उदाहरण लें तो ला नीना और अल नीनो में अंतर ज्यादा स्पष्ट हो जाता है। जैसे भारत में अल नीनो का प्रभाव सूखे या कमजोर मानसून से जुड़ा है, जबकि ला नीना अच्छे मानसून और औसत से ज्यादा बारिश के साथ ही कड़ाके की ठंड से संबंधित है।

कमजोर ला नीना का भारत पर क्या असर होगा ?
विश्व मौसम संगठन आने वाले तीन महीनों में कमजोर ला नीना के चलते जो औसत तापमान बढ़ने की भविष्यवाणी की है, उसका असर भारत पर नहीं पड़ने की बात कही गई है। लेकिन, डब्ल्यूएमओ के अनुमानों के अनुसार भारत के दक्षिणी प्रायद्वीपीय इलाकों तापमान इस दौरान सामान्य से कम रहेगा, जबकि उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में सामान्य रहने की संभावना है। यही नहीं डब्ल्यूएमओ ने कहा है कि इस बात की संभावना थोड़ी ज्यादा बढ़ गई है कि भारत के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया में इस दौरान औसत से ज्यादा बारिश हो सकती है। गौरतलब है कि इसी महीने भारतीय मौसम विभाग ने कहा है कि सितंबर में लंबे समय औसत या एलपीए में 110 फीसदी से ज्यादा बारिश होने का अनुमान है, जो कि अबतक कम या औसत से कम रही है। मानसून में अभी तक ओवरऑल 7 फीसदी की कमी दर्ज की गई है।

जलवायु परिवर्तन का कितना असर ?
विश्व मौसम संगठन के सचिव जनरल पेट्टेरी टालस के मुताबिक ला नीना की घटनाओं और मौसम के पैटर्न में तेजी से आ रहे बदलाव के पीछे पर्यावरण परिवर्तन बहुत बड़ा कारण है, जिसके लिए मानवीय गतिविधियां जिम्मेदार हैं। खासकर बहुत ज्यादा गर्मी और सूखा इसका एक गंभीर परिणाम है, जिससे जंगल में आग का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसी तरह से भारी बारिश और बाढ़ इसका दूसरा पहलू है, जो अलग तबाही की वजह बन रही है। पर्यावरण परिवर्तन की वजह से प्राकृतिक आपदाओं की घटनाएं और गंभीरता बढ़ती जा रही हैं और इस साल ऐसी घटनाएं दुनियाभर में देखने को मिल रही हैं।












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