इजराइल-हमास के बीच जंग से बदल जाएगी मिडिल ईस्ट की राजनीति, इसमें सबसे अधिक फायदा किसका है?
इजराइल हमास जंग का आज नौवां दिन है। इस बीच इजराइली डिफेंस फोर्स के 10 हजार सैनिक गाजा में जमीनी हमले की तैयारी कर रहे हैं। इजराइल ने स्थानीय समय के मुताबिक लोगों को उत्तरी गाजा खाली करने के लिए 1 बजे तक का वक्त दिया है।
इजराइल डिफेंस फोर्स के मुताबिक वे गाजा में जमीनी हमला करने के लिए तैयार हैं। वे अब तक गाजा में सिर्फ एयरस्ट्राइक कर रहे थे, लेकिन अब वे तीनों ओर से (जमीन, समुद्र और आसमान) गाजा पर हमला करेंगे।

अगर इजराइल और हमास के बीच ये युद्ध होता है तो सबसे अधिक फायदा किसका होगा? अगर इस प्रश्न पर बहुत अधिक विचार न भी किया जाए तो एक देश है जिसका ख्याल हमें सबसे पहले आता है। रूस। रूस पिछले डेढ़ साल से भी अधिक वक्त से यूक्रेन संग जंग में उलझा हुआ है।
ये युद्ध भले ही रूस और यूक्रेन के बीच हो रहा हो मगर दुनिया जानती है कि इसके पीछे अमेरिका का हाथ है। बिना पश्चिमी देशों के हथियारों के यूक्रेन बहुत अधिक समय तक रूस के सामने खड़ा नहीं रह पाएगा।
अब जब अमेरिका अपने परम मित्र इजराइल की मदद करने निकल पड़ा है तो जाहिर है कि उसका ध्यान यूक्रेन पर कम होगा। रूस को भी लगता है कि इससे अमेरिकी सैन्य सहायता यूक्रेन के बजाए इजराइल को मिलेगी।
हालांकि अमेरिका और नाटो सहयोगियों ने इजरायल पर गाजा स्थित आतंकवादी समूह हमास के हमले के बाद यूक्रेन को सैन्य समर्थन जारी रखने की उनकी क्षमता के बारे में चिंताओं को खारिज कर दिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इजराइल ने अमेरिका से आयरन डोम मिसाइलें, गाइडेड मिसाइलें, गोला-बारूद आदि हथियारों की मांग की है। इजराइल के सामने दिक्कत है कि यदि उसने गाजा पट्टी में जमीनी युद्ध शुरू किया तो उसके शस्त्रागार पर हथियारों की आपूर्ति का दबाव बढ़ जाएगा। इसलिए वह चाहता है कि अमेरिका उसकी मदद करे।
यदि अमेरिका, इजराइल को हथियार देना शुरू करता है तो उसे यूक्रेन को हथियार देने में कटौती करना होगा। हालांकि इसका ये मतलब नहीं है कि पश्चिमी मुल्क यूक्रेनी नागरिकों को अपने हाल पर छोड़ देंगे. लेकिन यूक्रेन को मिलने वाली सैन्य सहायता में कमी ज़रूर आ जाएगी।
रूसी राजनयिक कॉन्स्तान्तिन गैवरिलोव ने रूसी सरकार समर्थित इजवेस्तिया अखबार को बताया, "मैं मानता हूं कि इस संकट का सीधा असर यूक्रेन में जारी स्पेशल सैन्य अभियान पर पड़ेगा।"
रूस के अलावा ईरान भी वो देश है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि इजराइल-हमास से उसे खूब फायदा हो सकता है। ईरान चुपचाप अमेरिका और इजराइल के खिलाफ लड़ाई जारी रखे हुए है, लेकिन वह सीधे इनसे मोर्चा नहीं ले सकता।
ईरान राजनैतिक और आर्थिक तौर पर इतना मजबूत नहीं है कि वह सामने से इन दोनों देशों के खिलाफ युद्ध शुरू कर सके। लेकिन इजराइल के लिए जंग लड़ रहे संगठनों को ईरान ट्रेनिंग, हथियार और फंड मुहैया कराता रहा है।
राजनैतिक रूप से ईरान के फायदे की बात करें तो यदि इजराइल, फिलिस्तीन में आक्रमक रुख इख्तियार करता है, तो इससे सऊदी अरब सहित अन्य देश जिसके संबंध इजराइल से बेहतर हैं, या बेहतर होने की राह पर उन्हें खत्म कर सकती है।
इजराइल में 7 अक्टूबर को हमास के हमला होने से पूर्व विदेश मंत्री ने दावा किया था कि कम से कम 6 मुस्लिम देश उनके साथ सामान्य रिश्ता बनाने के पक्ष में हैं। यदि इजराइल कठोर प्रतिक्रिया देता है, तो सामान्यीकरण का प्रयास उल्टा पड़ सकता है और अगर इस शांति वार्ता में कोई बाधा आती है तो ईरान से ज्यादा फायदा किसी दूसरे देश को नहीं होगा।
अगर इजराइल इस युद्ध में गाजा पर कब्जा कर लेता है या उसे बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाता है तो इससे वेस्ट बैंक में नए फिलिस्तीन को बढ़ावा देखने को मिल सकता है। इसके बाद इजराइल को भी यहां पर सख्ती करने पड़ेगी, जिसके बाद यहां पर हालात और भी ज्यादा खराब हो सकते हैं। ईरान के सख्त रूख से पूरी मुस्लिम दुनिया में उसके प्रति नफरत पैदा होगी और वह इसे जरूर भुनाएगा।












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