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न्यूक्लियर डील के लिए अमेरिका के आगे सऊदी 'बिकने' को तैयार! इजराइल पर इसीलिए चुप्पी साधे हैं प्रिंस सलमान?

US-Saudi Arabia nuclear deal: व्हाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन इस हफ्ते के अंत में सऊदी अरब का दौरा करेंगे, जिसमें नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर बातचीत किए जाने की उम्मीद है और वाशिंगटन को उम्मीद है, कि परमाणु समझौता अगर कामयाब हो जाता है, तो ये डील इजरायल सऊदी अरब के संबंधों को सामान्य करेगा।

लिहाजा, सवाल ये उठ रहे हैं, कि गाजा पट्टी में 30 हजार से ज्यादा लोगों की मौत के बाद भी अगर सऊदी अरब ने इजराइल को लेकर अभी तक कोई कदम नहीं उठाया है, तो इसके पीछे क्या सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की परमाणु ऊर्जा को लेकर चाहत है?

US-Saudi Arabia nuclear deal

सऊदी अमेरिका सिविल न्यूक्लियर समझौता क्या है?

यूएस एटोमिक एनर्जी एक्ट 1954 के सेक्शन 123 के तहत संयुक्त राज्य अमेरिका अन्य देशों के साथ महत्वपूर्ण नागरिक परमाणु सहयोग में शामिल होने के लिए समझौतों पर बातचीत कर सकता है। इस एक्ट के तहत अमेरिका परमाणु अप्रसार 9 मानदंडों पर समझौता कर सकता है, जिसका मकसद ये है, कि अमेरिका जिस देश के साथ समझौता कर रहा है, वो राज्य इस बात को सुनिश्चित करें, वो परमाणु हथियार का निर्माण ना करे और संवेदनशील समग्री और टेक्नोलॉजी ना तो किसी और देश को ट्रांसफर करे और ना ही किसी और देश से ले।

इस कानून के तहत अगर बाइडेन प्रशासन, सऊदी अरब के समझौता करता है, तो अमेरिकी संसद उस समझौते का समीझा करेगी।

सऊदी अरब अमेरिकी परमाणु सहयोग समझौता क्यों चाहता है?

सऊदी अरब, जो दुनिया के सबसे बड़े तेल बेचने वाले देशों में से एक है, वो अभी तक साफ नहीं कर पाया है, कि वो बिजली उत्पादन के लिए आखिर परमाणु ऊर्जा क्यों चाहता है? लेकिन, एक्सपर्ट्स का मानना है, कि ऐसी दो वजहें हो सकती हैं, कि सऊदी अरब परमाणु ऊर्जा चाहता हो।

पहला यह, कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की महत्वाकांक्षी विजन 2030 सुधार योजना के तहत, सऊदी अरब का लक्ष्य जैविक ऊर्जा पर अपनी निर्भरता कम करना है, ताकि प्रदूषण के उत्सर्जन को कम किया जा सके, लिहाजा सऊदी चाहता है, कि उसे जितनी ऊर्जा की जरूरत है, उसका एक बड़ा हिस्सा परमाणु ऊर्जा से मिले।

दूसरा- एक्सपर्ट्स इस बात की आशंका जताते हैं, कि प्रिंस सलमान की दिली ख्वाहिश सऊदी अरब के हथियार भंडार में परमाणु हथियार शामिल करने की हो सकती है। प्रिंस सलमान भले ही अभी अमेरिकी शर्तों के साथ नागरिक इस्तेमाल के लिए परमाणु ऊर्जा समझौता करने के लिए तैयार हो जाएं, लेकिन भविष्य में उनकी चाहत परमाणु हथियार हासिल करने की हो सकती है।

सऊदी क्राउन प्रिंस ने लंबे समय से कहा है, कि यदि ईरान ने परमाणु हथियार विकसित किया, तो सऊदी अरब भी परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश करेगा। ये एक ऐसा रुख है, जिसने संभावित यूएस-सऊदी नागरिक परमाणु समझौते पर हथियार नियंत्रण अधिवक्ताओं और कुछ अमेरिकी सांसदों के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है।

क्योंकि, सुन्नी मुस्लिम साम्राज्य सऊदी अरब और शिया मुस्लिमों के देश ईरान के बीच दशकों से गहरे मतभेद रहे हैं।

US-Saudi Arabia nuclear deal

सऊदी अरब के साथ असैन्य परमाणु समझौते से अमेरिका को क्या लाभ होगा?

सऊदी अरब से समझौता कर अमेरिका को रणनीतिक और व्यावसायिक लाभ हो सकता है।

बाइडेन प्रशासन ने सऊदी अरब और इजराइल के बीच संबंधों को सामान्य बनाने के लिए एक दीर्घकालिक, बहु-भागीय व्यवस्था स्थापित करने की अपनी आशा को छिपाया नहीं है। उसका मानना है, कि रिश्तों के सामान्यीकरण के लिए सऊदी अरब के साथ नागरिक परमाणु समझौता काफी महत्वपूर्ण हो सकता है और जो सऊदी अभी चीनी खेमे में जा रहा है, वो अमेरिका की तरफ वापस मुड़ सकता है।

वहीं, रणनीतिक लाभ इजराइल की सुरक्षा को मजबूत करना है। जिसमें ईरान के खिलाफ एक व्यापक गठबंधन बनाना और सबसे धनी अरब देशों में से एक सऊदी का साथ अमेरिका के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है, खासकर उस वक्त, जब चीन खाड़ी में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

जबकि, वाणिज्यिक लाभ ये है, कि अगर सऊदी अरब में परमाणु संयंत्र का निर्माण होता है, तो अमेरिकी कंपनी को ही इसका कॉन्ट्रैक्ट हासिल होगा। जिससे अमेरिकी कंपनियां, जिसे रूस और चीन से प्रमुख प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है, उसे महत्वपूर्ण लाभ हासिल होगा।

US-Saudi Arabia nuclear deal

सऊदी-अमेरिका परमाणु समझौते में दिक्कते क्या हैं?

गाजा में युद्धविराम के लिए इजराइल तैयार नहीं है और रफा में खतरनाक ऑपरेशन शुरू हो चुका है, जिसमें भारी संख्या में लोगों की मौत होने की आशंका है, लिहाजा सऊदी अरब काफी प्रेशर में है और आरोप लग रहे हैं, कि परमाणु डील के लिए ही प्रिंस सलमान चुप्पी साधे हैं, लिहाजा अगर रफा में हालात बिगड़ते हैं, तो सऊदी अरब पर पीछे हटने के लिए दबाव काफी बढ़ जाएगा।

गाजा में मरने वाले लोगों की संख्या 35 हजार के आंकड़े को पार कर गया है और कुपोषण और भुखमरी के हालात बन गये हैं। जिससे यह कल्पना करना कठिन है, कि सउदी अरब, इस वक्त इजराइल से संबंधों को सामान्य बनाने के इच्छुक होगा, जबकि फिलिस्तीनी इतनी संख्या में मर रहे हैं।

अमेरिका क्यों चाहता है सऊदी से ये डील हो जाए?

संयुक्त राज्य अमेरिका को उम्मीद है, कि न्यूक्लियर डील पर अगर बातचीत शुरू होती है, तो सऊदी अरब को कई चीजें देने का एक रास्ता मिल जाएगा। जिसमें नागरिक परमाणु समझौता होने के साथ साथ सुरक्षा गारंटी और फिलिस्तीनी राज्य बनाने का एक रास्ता शामिल हो सकता है।

जिसके बदले में अमेरिका चाहता है, कि इजराइल और सऊदी अरब के संबंध सामान्य हो जाएं। इस महीने की शुरुआत में, इस मामले से परिचित सात लोगों ने रॉयटर्स को बताया था, कि बाइडेन प्रशासन और सऊदी अरब, रियाद को अमेरिकी सुरक्षा गारंटी और नागरिक परमाणु सहायता के लिए एक समझौते को अंतिम रूप दे रहे हैं।

लेकिन, क्या 'भव्य परमाणु समझौता' सऊदी अरब को इजराइल से समझौता करने के लिए मजबूर करेगा, फिलहाल मुश्किल दिख रहा है, लेकिन अगर प्रिंस सलमान ये समझौता करते हैं, तो इसका मतलब साफ होगा, कि सऊदी के लिए फिलीस्तीन हित से ज्यादा अपने हित प्रिय हैं और वो 'न्यूक्लियल डील' के आगे 'बिक' गया है।

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