होर्मुज संकट के बीच अमेरिका का 48 घंटे में बदला खेल! रूस से तेल खरीद की छूट, क्या भारत के दबाव में झुके ट्रंप?
US Trump Russia oil policy: वैश्विक तेल बाजार इस समय जबरदस्त दबाव में है और इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका-ईरान टकराव के बीच बढ़ा भू-राजनीतिक तनाव है। इसी बीच अमेरिका ने ऐसा फैसला लिया है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। अमेरिकी प्रशासन ने रूसी तेल खरीद पर फिर से अस्थायी छूट देने का ऐलान किया है।
महज दो दिन पहले जिस अमेरिका ने रूसी तेल पर रियायत देने से साफ इनकार कर दिया था, उसी ने अब चुपचाप एक नया 'जनरल लाइसेंस' जारी कर भारत समेत दुनिया भर के देशों को रूसी तेल खरीदने की हरी झंडी दे दी है। आखिर 48 घंटों में ऐसा क्या हुआ कि सुपरपावर को अपने कदम पीछे खींचने पड़े?

क्या है नया फैसला? 30 दिन की नई छूट
अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने 17 अप्रैल से एक नई 30 दिन की जनरल लाइसेंस जारी की है। इसके तहत दुनिया के कई देश, जिनमें भारत भी शामिल है, रूस से तेल और पेट्रोलियम उत्पाद खरीद सकते हैं। इस छूट की खास शर्त यह है कि जो रूसी तेल 17 अप्रैल या उससे पहले जहाजों में लोड हो चुका है, उसे 16 मई तक बिना किसी अमेरिकी प्रतिबंध के खरीदा जा सकता है। यानी करीब एक महीने तक रूस से तेल खरीद पर रोक नहीं लगेगी। हालांकि, एक बड़ा बदलाव यह है कि ईरान से ऊर्जा खरीदने की छूट अब खत्म कर दी गई है। यानी रूस को राहत मिली है, लेकिन ईरान पर दबाव बरकरार रखा गया है।
दो दिन में बदला फैसला: इनकार से इकरार तक की कहानी
इस पूरे ड्रामे की शुरुआत 15 अप्रैल 2026 को हुई, जब अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो टूक शब्दों में कहा था कि रूस और ईरान दोनों के लिए जारी छूट को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। बेसेंट का तर्क था कि जो तेल समुद्र में था, वह इस्तेमाल हो चुका है और अब प्रतिबंधों में कोई ढील नहीं दी जाएगी। लेकिन शुक्रवार की देर रात वॉशिंगटन से जो नोटिफिकेशन निकला, उसने दुनिया को हैरान कर दिया।
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने एक नया नोटिफिकेशन जारी किया है, जिसके तहत 17 अप्रैल से 16 मई तक के लिए एक नई रियायत दी गई है। इसके अनुसार, जो रूसी कच्चा तेल या पेट्रोलियम उत्पाद 17 अप्रैल को या उससे पहले जहाजों पर लोड किए जा चुके हैं, उन्हें खरीदने पर अमेरिका कोई प्रतिबंध नहीं लगाएगा। हालांकि, यहां एक पेंच है-अमेरिका ने रूसी तेल पर तो नरमी दिखाई है, लेकिन ईरानी तेल की खरीद पर कोई राहत नहीं दी है।
भारत के लिए क्यों जरूरी है यह खबर?
भारत इस पूरे विवाद में एक प्रमुख खिलाड़ी बनकर उभरा है। जब फरवरी के आखिर में अमेरिका-ईरान संघर्ष शुरू हुआ और तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं, तो भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस की ओर रुख किया। रिपोर्टों की मानें तो भारत ने इस छूट की अवधि के दौरान रूस से करीब 30 मिलियन बैरल तेल के ऑर्डर दिए हैं।
रिलायंस जैसी दिग्गज भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों ने पहले अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसी रूसी कंपनियों से किनारा कर लिया था। लेकिन इस छूट ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ऑक्सीजन का काम किया है। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने हाल ही में स्पष्ट किया था कि भारत की ऊर्जा नीति 140 करोड़ लोगों की जरूरतों और बाजार की स्थितियों पर आधारित है। हालांकि वॉशिंगटन के ताजा यू-टर्न पर अभी नई दिल्ली की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है, लेकिन यह स्पष्ट है कि पर्दे के पीछे एशियाई देशों का भारी दबाव काम कर रहा था।
ट्रंप प्रशासन के फैसले के पीछे का आर्थिक दबाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह फैसला 'आग से खेलने' जैसा है। एक तरफ उन पर घरेलू स्तर पर दबाव है कि वे यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की तिजोरी न भरने दें, वहीं दूसरी तरफ मिडिल ईस्ट में जारी ईरान युद्ध के कारण अमेरिका में पेट्रोल-डीजल की कीमतें (Gas Prices) रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं।
अगर अमेरिका रूसी तेल की सप्लाई को पूरी तरह काट देता, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कमी हो जाती और कीमतें इतनी बढ़ जातीं कि अमेरिकी जनता के लिए महंगाई झेलना मुश्किल हो जाता। ऐसे में ट्रंप प्रशासन ने 'मिडिल पाथ' अपनाया है। रूसी तेल पर छूट देकर उन्होंने वैश्विक बाजार में सप्लाई को बनाए रखने की कोशिश की है ताकि कीमतें काबू में रहें।
अमेरिकी संसद में विरोध की लहर
भले ही प्रशासन ने तेल की कीमतों को संतुलित करने के लिए यह कदम उठाया हो, लेकिन अमेरिकी संसद (Congress) में इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया हो रही है। डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंटल ने ट्रंप के इस फैसले को रूसी 'वॉर मशीन' को फंड देने वाला बताया है। उनका आरोप है कि रूस इस पैसे का इस्तेमाल यूक्रेन में बच्चों के अपहरण और हत्याओं के लिए कर रहा है।
वहीं, कांग्रेस सदस्य ग्रेगरी मीक्स और विलियम कीटिंग ने तो सदन में एक विधेयक पेश कर दिया है, जिसका उद्देश्य इस छूट को तुरंत समाप्त करना है। इन सांसदों का कहना है कि एक तरफ रूस यूक्रेन में तबाही मचा रहा है और दूसरी तरफ वह मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाने के लिए ईरान की मदद कर रहा है। ऐसे में उसे तेल से होने वाली कमाई से वंचित करना ही एकमात्र रास्ता है।
ग्लोबल ऑयल मार्केट पर क्या होगा असर? (Impact On Global Oil Market)
अमेरिका के इस फैसले का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ेगा। छूट मिलने से सप्लाई बनी रहेगी, जिससे कीमतों में अचानक उछाल आने से रोका जा सकता है। हालांकि, यह राहत अस्थायी है और सिर्फ 30 दिन के लिए है। इसके बाद क्या होगा, यह पूरी तरह अमेरिका की अगली रणनीति पर निर्भर करेगा। अगर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है या छूट खत्म होती है, तो तेल की कीमतें फिर से तेजी पकड़ सकती हैं।
फिलहाल भारत समेत कई देश इस फैसले से राहत महसूस कर रहे हैं, लेकिन अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि 16 मई के बाद अमेरिका क्या करेगा। क्या यह छूट आगे बढ़ेगी या फिर एक बार फिर सख्ती देखने को मिलेगी। कुल मिलाकर, यह मामला सिर्फ तेल खरीद का नहीं है, बल्कि इसमें राजनीति, कूटनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था तीनों का बड़ा खेल चल रहा है। ऐसे में आने वाले कुछ हफ्ते बेहद अहम रहने वाले हैं।














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