भारत को $500 मिलियन की सैन्य मदद ऑफर करेगा अमेरिका, क्या ‘दोस्त’ पुतिन से दूर होंगे पीएम मोदी?
अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि, वाशिंगटन की कोशिश भारत का एक विश्वसनीय भागीदार बनने की है और इसके लिए बाइडेन प्रशासन फ्रांस के साथ साथ कई और अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है...
वॉशिंगटन, मई 18: रूसी हथियारों पर भारत की निर्भरता कम करने के लिए अमेरिका 500 मिलियन डॉलर का हथियारों का एक पैकेज तैयार कर रहा है, जो वो भारत को ऑफर करेगा। इस मामले से परिचित लोगों ने हिंदुस्तान टाइम्स से कहा है कि, यूक्रेन संकट के दौरान पूरी दुनिया ने भारत की विवशता को समझा है, कि चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों से घिरे होने की वजह से भारत रूस की आलोचना नहीं कर सकता, क्योंकि भारत की सेना रूसी हथियारों पर काफी ज्यादा निर्भर है, लिहाजा अमेरिका ने 500 मिलियन डॉलर का हथियारों का एक पैकेज सहायत के तौर पर भारत को देने का फैसला किया है।

500 मिलियन डॉलर का पैकेज
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले से जुड़े एक सूत्र के मुताबिक, अमेरिका भारत को 500 मिलियन डॉलर के विदेशी सैन्य वित्तपोषण देने की तैयारी कर रहा है और इजरायल और मिस्र के बाद भारत ऐसा तीसरा देश होगा, जिसे इतना विशालकाय फॉरेन मिलिट्री फाइनेंसिंग हासिल होगा। हालांक, अभी तक साफ नहीं हो पाया है, कि इस सौदे की घोषणा कब तक की जाएगी और 500 मिलियन डॉलर के इस पैकेज में कौन कौन से हथियार और उपकरण शामिल होंगे। एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, यूक्रेन पर आक्रमण के लिए रूस की आलोचना नहीं करने के बाद भी राष्ट्रपति जो बाइडेन और उनके प्रशासन ने भारत को दीर्घकालिक सुरक्षा भागीदार के रूप में पेश करने के लिए एक बहुत बड़ी पहल कर रही है और 500 मिलियन डॉलर का ये पैकेज उसी पहला का एक हिस्सा है।

भारत के साथ विश्वसनीय भागीदारी
अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि, वाशिंगटन की कोशिश भारत का एक विश्वसनीय भागीदार बनने की है और इसके लिए बाइडेन प्रशासन फ्रांस के साथ साथ कई और अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके, कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के पास आवश्यक उपकरण मौजूद हों। अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि, भारत पहले से ही रूस हथियारों की खरीददारी कम कर चुका है और अपने सैन्य भंडार में विविधता ला रहा है, लेकिन अमेरिका भारत के इस काम में तेजी लाने के लिए और मदद करना चाहता है।

दिए जाएंगे लड़ाकू जेट, नौसैनिक जहाज...
अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि, एक बड़ी चुनौती यह है, कि भारत को लड़ाकू जेट, नौसैनिक जहाज और युद्धक टैंक जैसे प्रमुख हथियार कैसे उपलब्ध कराए जाएं, और बाइडेन प्रशासन इन क्षेत्रों में से एक में सफलता की तलाश कर रहा है। हालांकि, अमेरिकी अधिकारी ने ये भी कहा है कि, ऐसे हथियारों को बनाने का खर्च अरबों डॉलर आता है, लिहाजा बाइडेन प्रशासन उस पैकेज पर काम कर रहा है, जो किफायती होने के साथ साथ भारत को समर्थन जताने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतीक होगा। हिंदुस्तान टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, भारत के विदेश मंत्रालय ने इस टिप्पणी के अनुरोध का तुरंत जवाब नहीं दिया है। वहीं, नई दिल्ली में विदेश विभाग और अमेरिकी दूतावास के अधिकारियों ने भी टिप्पणी के अनुरोध का तुरंत जवाब नहीं दिया।

रूसी हथियारों पर निर्भर भारत
भारत रूसी हथियारों का दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार है, हालांकि पिछले कुछ सालों में भारत ने रूसी हथियारों पर अपनी निर्भरता जरूर कम की है, लेकिन अभी भी भारत के हथियार भंडार में करीब 60 प्रतिशत रूसी हथियार भरे हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानि SIPRI के अनुसार, पिछले एक दशक में, भारत ने अमेरिका से 4 अरब डॉलर के हथियार खरीदे हैं, तो भारत ने रूस से 25 अरब डॉलर के हथियार खरीदे हैं। पड़ोसी देशों, चीन और पाकिस्तान के खिलाफ हथियारों के लिए रूस पर भारत की निर्भरता एक बड़ा कारण है, कि मोदी सरकार यूक्रेन में युद्ध को लेकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की आलोचना करने से बचती है। अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए, लेकिन भारत को रूस से तेल आयात बढ़ाना पड़ा।

अमेरिका ने समझा भारत की स्थिति
हालांकि, यूनाइटेड नेशंस में वोटिंग से भारत के बार-बार गैर-हाजिर रहने और रूस की एक शब्द भी आलोचना नहीं करने की वजह से अमेरिका ने भारत को लेकर निराशा तो जताई, लेकिन इसके साथ ही अमेरिका और यूरोपीय देशों ने इस बात को भी समझा, कि भारत हथियारों को लेकर रूस पर किस हद तक निर्भर है और भारत के पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान हैं, जिनसे भारत की सुरक्षा को हमेशा खतरा रहता है। वहीं, अगले हफ्ते दक्षिण कोरिया में फिर से क्वाड शिखर सम्मेलन होने जा रहा है और इस साल का ये दूसरा क्वाड सम्मेलन है, जिसमें भाग लेने के लिए पीएम मोदी दक्षिण कोरिया जाएंगे। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन भी दक्षिण कोरिया आ रहे हैं। वहीं, क्वाड के बाकी दोनों सदस्य देश जापान और ऑस्ट्रेलिया के नेता भी बैठक में भाग लेंगे। वहीं, भारतीय प्रधानमत्री को अगले महीने जर्मनी में होने वाली जी7 समूह की बैठक में भी शामिल होने का निमंत्रण भी मिला है, लिहाजा माना जा रहा है कि, अमेरिका भारत के साथ कई ऐसे समझौते कर सकता है, जिससे भविष्य में भारत की निर्भरता रूस पर काफी कम की जा सके।

इंडो-पैसिफिक पर फोकस
पिछले महीने वॉशिंगटन में भारत और अमेरिका के बीच हुए 2+2 बैठक के दौरान अमेरिका के रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन ने कहा था कि, 'हम यह सब इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका भारत-प्रशांत क्षेत्र में भारत को डिफेंस लीडर के तौर पर देखता है और भारत का समर्थन करता है, इसके साथ ही हम सभी उन चुनौतियों को समझते हैं, जिनका हम वहां सामना करते हैं। पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना इस क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय प्रणाली को और अधिक व्यापक रूप से नए सिरे से तैयार करने की मांग कर रहा है जो उसके हितों की सेवा करता है। पिछले दो दशकों में अमेरिका और भारत के बीच संबंध लगातार गहरे हुए हैं, दोनों पक्षों के बीच ऐसे समझौते हुए हैं, जो उनके सैन्य प्लेटफार्मों के बीच अधिक अंतःक्रियाशीलता की अनुमति देते हैं।

बाइडेन प्रशासन के इस फैसले का मतलब
भारत के लिए अमेरिका की दोनों मुख्य पार्टियों का इस तरह का समर्थन अपने आप में काफी दुर्लभ है और बाइडेन प्रशासन ने अब साफ संकेत दे दिए हैं, कि रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने के लिए भारत पर प्रतिबंध नहीं लगाए जाएंगे, जो उसने तुर्की पर लगाया था, जिससे तुर्की को काफी नुकसान पहुंचा है। फिर भी, यह देखा जाना बाकी है कि भारत अमेरिकी सैन्य सहायता को स्वीकार करने में कितना आगे जाता है। रूस ने ऐतिहासिक रूप से भारत के अधिकांश सैन्य हार्डवेयर की आपूर्ति की है, जिसमें लड़ाकू जेट और मिसाइलों के साथ साथ अपने सभी टैंक और हेलीकॉप्टर शामिल हैं। स्थिति से परिचित लोगों के अनुसार, मोदी सरकार ने अमेरिका से कहा है कि रूसी हथियारों के आयात से पूरी तरह से दूर जाने के विकल्प काफी महंगा है। हालांकि, भारतीय अधिकारी ने अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर ये बातें बताईं, क्योंकि वो मीडिया से बात करने के लिए अधिकृत नहीं हैं।












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