Hypersonic Program: सालों की मेहनत, अरबों डॉलर खर्च, US का हाइपरसोनिक प्रोजेक्ट क्यों बार बार हो जाता है फेल?

US Hypersonic Program: संयुक्त राज्य अमेरिका, जो हमेशा से आधुनिक और विनाशक हथियार बनाने का एक्सपर्ट रहा है, वो हाइपरसोनिक मिसाइल बनाने के मामले में रूस और चीन से बुरी तरह से पिछड़ गया है। एक के बाद एक, अमेरिका के कई हाइपरसोनिक प्रोजेक्ट फेल हो चुके हैं, जिसनें अमेरिकी थिंक टैंक को टेंशन में डाल दिया है।

ऐसे में अमेरिकी कांग्रेस वाचडॉग ने अमेरिकी सेना के 'डार्क ईगल' हाइपरसोनिक कार्यक्रम में कुछ प्रमुख तकनीकी कमियों को उजागर किया है।

US Hypersonic Program

अमेरिकी कांग्रेस के निगरानीकर्ता, सरकारी जवाबदेही कार्यालय (GAO) ने अमेरिकी सेना के हाइपरसोनिक कार्यक्रम, जिसे डार्क ईगल के नाम से जाना जाता है, उसमें तकनीकी कमियों की ओर इशारा किया है। हालांकि, अमेरिकी सेना का पहला हाइपरसोनिक हथियार कथित तौर पर अपने अंतिम परीक्षण के पूरा होने के करीब है, लेकिन GAO ने सिफारिश की है, कि सेना और अन्य शाखाओं के लिए हाइपरसोनिक तकनीक विकसित करने वाले कार्यक्रम उद्योग की सर्वोत्तम प्रथाओं से लाभ उठा सकते हैं।

अपने लॉन्ग-रेंज हाइपरसोनिक हथियार (LRHW) के डेवलपमेंट में फीडबैक को शामिल करने के लिए अमेरिकी सेना की सराहना करते हुए, GAO ने चेतावनी दी है, कि सेना तैनाती में तेजी लाने और खर्चों को कम करने के लिए ज्यादा डिजिटल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल कर सकती है।

GAO की सिफारिशों में क्या कहा गया है?

जीएओ रिपोर्ट से पता चलता है कि पेंटागन में छह में से चार मौजूदा हाइपरसोनिक विकास कार्यक्रम, डिजिटल ट्विन्स और डिजिटल इंजीनियरिंग जैसी आधुनिक तकनीकी पद्धतियों का पूरी तरह से उपयोग नहीं कर रहे हैं। जिसकी वजह से हाइपरसोनिक प्रोजेक्ट बार बार फेल हो रहे हैं।

अमेरिकी सेना का लॉन्ग-रेंज हाइपरसोनिक हथियार (LRHW), जिसे अमेरिकी नौसेना के कन्वेंशनल प्रॉम्प्ट स्ट्राइक प्रोग्राम के साथ मिलकर विकसित किया गया है, वो अपने अंतिम परीक्षण चरण के करीब है। इस डेवलपमेंट के बावजूद, GAO रिपोर्ट LRHW कार्यक्रम में देरी और तकनीकी कमियों के बारे में चिंता जताती है।

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हाइपरसोनिक विकास में चुनौतियां

LRHW एक मध्यम दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल है, जिसकी रेंज 1,700 मील से ज्यादा होने की उम्मीद है और इसका लक्ष्य मैक 17 की स्पीड हासिल करना है। हालांकि, इस कार्यक्रम को लेकर कई तरह के विवाद हो चुके हैं, जिसकी वजह से इस प्रोजेक्ट में बार बार देरी होती रही है, जिसमें टेस्टिंग फेल्योर, और उड़ान परीक्षण के दौरान मिसाइल के प्रदर्शन से संबंधित समस्याएं शामिल हैं।

चीन और रूस के पास कई हाइपरसोनिक हथियार हैं, लेकिन तकनीकी बाधाएं अमेरिका को हाइपरसोनिक हथियार रखने के अपने मकसद को साकार करने से रोकती हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिकी वायु सेना (USAF) को कई असफल परीक्षणों के बाद AGM-183A एयर-लॉन्च रैपिड रिस्पांस वेपन (ARRW) कार्यक्रम को आधिकारिक रूप से रद्द करना पड़ा। USAF ने हाइपरसोनिक अटैक क्रूज मिसाइल (HACM) विकसित करने पर काफी जोर दिया है, फिर भी यह हथियार तैनाती से बहुत दूर है।

आधुनिक तकनीकी पद्धतियों का महत्व

जीएओ का सुझाव है, कि आधुनिक तकनीकी पद्धतियों को अपनाने से हाइपरसोनिक कार्यक्रमों को काफी लाभ मिल सकता है। डिजिटल डुएल और डिजिटल इंजीनियरिंग प्रक्रियाओं को एक साथ मिलाकर इस प्रोजेक्ट को अपने अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है। इसके अलावा, प्रोजेक्ट की लागत कम करने के साथ साथ इसकी समग्र दक्षता को भी बढ़ाया जा सकता है। सैन्य प्रौद्योगिकी में डेवलपमेंट के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए ये अभ्यास महत्वपूर्ण हैं।

इन तकनीकी चुनौतियों का समाधान करना अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण है, ताकि वह प्रतिद्वंद्वी देशों से खतरों का प्रभावी ढंग से जवाब दे सके। रणनीतिक बढ़त बनाए रखने के लिए हाइपरसोनिक हथियारों की तैनाती में तेजी लाना आवश्यक है।

जीएओ रिपोर्ट सैन्य कार्यक्रमों में वेपन इंडस्ट्री की सर्वोत्तम प्रथाओं को एकीकृत करने के महत्व को रेखांकित करती है। ऐसा करके, अमेरिकी सेना वर्तमान तकनीकी खामियों को दूर कर सकती है और एडवांस हथियारों की समय पर तैनाती सुनिश्चित कर सकती है।

हालांकि संयुक्त राज्य अमेरिका अपने प्रतिद्वंद्वियों रूस और चीन के बराबर हाइपरसोनिक क्षमताएं विकसित करने के लिए लगातार हाथ-पैर मार रहा है, लेकिन अभी तक वह सफलतापूर्वक एक ऑपरेशनल हाइपरसोनिक हथियार तैनात नहीं कर पाया है।

संक्षेप में समझा जाए, तो दुनिया में हाइपरसोनिक हथियार विकसित करने में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, फिर भी ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, जिनमें सुधार की आवश्यकता है। रूस अपनी हाइपरसोनिक मिसाइल किंझल का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में कर चुका है, जबकि चीन भी अपनी हाइपरसोनिक मिसाइल का टेस्ट कर चुका है, जबकि भारत तेजी से अपनी हाइपरसोनिक मिसाइल प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, लेकिन अमेरिकी प्रोजेक्ट का बार-बार फेल होना, अमेरिकी डिफेंस एक्सपर्ट्स को चिंता में डाल रहा है।

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