US, यूरोप, चीन, पाकिस्तान.. Modi 3.0 में कैसी होगी भारत की विदेश नीति, G7 शिखर सम्मेलन में दिखी झलक!
Modi 3.0: नरेन्द्र मोदी लगातार तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने हैं, लेकिन इस बार उनकी भारतीय जनता पार्टी अकले दम पर बहुमत हासिल करने में नाकाम रही है, लिहाजा सवाल ये उठ रहे हैं, कि उनके तीसरे कार्यकाल में भारत की विदेश नीति कैसी हो सकती है?
मोदी 3.0 में विदेश मंत्रालय के शीर्ष में कोई बदलाव नहीं किए गये हैं, जिससे संकेत यही मिलता है, कि मोटे तौर पर उनके तीसरे कार्यकाल में भी विदेश नीति उसी तरह से आगे बढ़ेगी, जैसा पहले कार्यकाल में शुरू हुआ था और दूसरे कार्यकाल में आगे बढ़ाया गया था।

लेकिन, वैश्विक परिस्थितियां लगातार बदल रही हैं और मोदी ने पिछले 10 सालों में जिन भी ग्लोबल लीडर्स के साथ संबंध बनाए हैं, उनमें से ज्यादातर घरेलू परिस्थितियों में कमजोर दिख रहे हैं और खुद मोदी भी पहले की तूलना में मजबूत नहीं रहे हैं, लिहाजा इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है, कि भारतीय रणनीति में कुछ बदलाव आ सकते हैं। हालांकि, इतिहास में देखा गया है, कि भारत की घरेलू राजनीति का भारत की विदेश नीति पर विशेष असर नहीं पड़ा है, लेकिन बात ये भी है, कि वैश्विक सोशल मीडिया युग में विदेशों में क्या हो रहा है, उसने लोगों की दिलचस्पी काफी बढ़ा दी है।
आइये जानते हैं, कि मोदी सरकार 3.0 में क्या भारत की विदेश नीति में कुछ परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं या नहीं?
जारी रह सकता है 'पड़ोसी पहले' की नीति
भारत के पड़ोस के सात देशों-बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, मॉरीशस और सेशेल्स के नेता नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए थे। और पाकिस्तान, अफगानिस्तान और म्यांमार को आमंत्रित नहीं किया गया। पाकिस्तान के साथ खराब संबंध, म्यांमार में सैन्य शासन और अफगानिस्तान में तालिबान का अवैध शासन इसके पीछे की वजह है।
हालांकि, शपथ ग्रहण समारोह के बाद किसी भी पड़ोसी नेता के साथ कोई ठोस द्विपक्षीय बैठक नहीं हुई।
लिहाजा भारत को पड़ोस में अपनी कूटनीति को चुस्त-दुरुस्त रखना होगा और बिना उम्मीद किए अपनी उदारतो को लगातार बढ़ाना ही होगा। कई पड़ोसी देश, एक संयमित और संवेदनशील मोदी 3.0 की उम्मीद कर रहे हैं, न कि एक दबंग नई दिल्ली की, जिसपर पिछले दिनों अपनी ताकत दिखाने के इल्जाम लगे हैं।
पाकिस्तान को लेकर कैसी हो सकती है नीति?
नरेन्द्र मोदी ने साल 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ सहित सार्क देशों के नेताओं को आमंत्रित किया था। 2014 और 2015 में पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों में उतार-चढ़ाव आया, 2016 में पठानकोट और उरी में हुए आतंकवादी हमलों से यह संबंध खराब हो गए। 2
2019 में पुलवामा हमले और बालाकोट हमलों ने भारत में राष्ट्रवादी भावना को हवा दी और बीजेपी की जीत में अहम योगदान दिया। लेकिन पाकिस्तान के साथ संबंधों को उस वक्त एक गंभीर झटका लगा, जब अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 खत्म कर दिया। और उसके बाद से दोनों देशों के बीच के राजनयिक संबंध खराब हो गये। वहीं, तब से पाकिस्तान में स्थिति भी बदल गई है। 2019 में प्रधानमंत्री रहे इमरान खान अब जेल में हैं और देश की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है। शरीफ परिवार, जिन्हें अब सेना का समर्थन प्राप्त है, उनकी सत्ता में वापसी हो चुकी है। नवाज और उनके भाई प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने आशा और शांति का संदेश दिया है।
लेकिन, पिछले नौ वर्षों से नई दिल्ली की नीति यही रही है, कि "आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते।" पिछले कुछ दिनों में जम्मू-कश्मीर में हुए सिलसिलेवार आतंकी हमलों ने फिलहाल बातचीत की किसी संभावना को खत्म कर दिया है।

अफगानिस्तान में भारत की वापसी
अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से काबुल के साथ कोई राजनयिक संबंध नहीं है। लेकिन, भारत ने लगातार अफगानिस्तान में मानवीय मदद भेजे हैं और कई मौकों पर भारत और तालिबान के अधिकारियों के साथ बातचीत भी हुई है। भारत ने अभी भी तालिबान के साथ उच्चस्तरीय बातचीत से इनकार किया है, लेकिन पर्दे के पीछे से दोनों देशों के बीच बातचीत होती रहेगी।
म्यांमार के सैन्य शासन ने बढ़ाई परेशानी
म्यांमार में 1 फरवरी 2021 को सेना ने सरकार का तख्तापलट कर दिया है और देश की सेना, जिसे जुंटा कहा जाता है, उसके साथ भारत सरकार की बातचीत निचले स्तर पर है। म्यांमार में गृहयुद्ध चल रहे हैं और दर्जनों मिलिशिया बन चुके हैं और हजारों लोग मारे जा चुके हैं। अक्टूबर 2023 में लड़ाई के खतरनाक स्तर तक पहुंच जाने के बाद से म्यांमार की सरकारी सेना रक्षात्मक मुद्रा में है। भारतीय रणनीतिक हलकों में यह सुझाव दिया गया है, कि सरकार के गिरने की संभावना को देखते हुए, नई दिल्ली को विपक्षी समूहों से भी बातचीत शुरू कर देनी चाहिए।
चीन इस मामले में स्मार्ट गेम खेल रहा है। चीन एक तरफ म्यांमार की सेना को हथियारों की सप्लाई कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ विद्रोहियों को भी हथियारों की सप्लाई कर रहा है।
मालदीव
राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की दिल्ली यात्रा, जो "इंडिया ऑउट" के नारे के साथ सत्ता में आए थे, वो मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल की शुरूआत में काफी महत्वपूर्ण है। भारत ने मालदीव से अपने सैनिकों को वापस बुला लिया है और नई दिल्ली और माले फिर से बातचीत के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं। माले लौटने के बाद मोहम्मद मुइज्जू ने अपनी दिल्ली यात्रा को 'कामयाब' कहा है। लिहाजा, मालदीव को लेकर सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं।
बांग्लादेश
इस साल की शुरूआत में बांग्लादेश में एक बार फिर से शेख हसीना की वापसी हो गई है, लेकिन भारत की तरफ से नेताओं के 'घुसपैठिया' संबंधी बयानबाजी में संबंधों को तनावपूर्ण किया है। लिहाजा मोदी 3.0 के दौरान सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्यों की तरफ से ज्यादा संवेदनशील होने की जरूरत है। क्योंकि दोनों पक्षों का उग्रवाद, कट्टरपंथ और आतंकवाद का मुकाबला करने में एक समान मकसद है।
भूटान
भारत अपनी पंचवर्षीय योजना, वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज और गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी परियोजना में सहायता के साथ थिम्पू का समर्थन करने के लिए तैयार है। भूटान को भारतीय मदद जारी रहने की उम्मीद है, खासकर तब जब चीन अपनी शर्तों पर भूटान के साथ सीमा पर बातचीत करने की कोशिश कर रहा है। भारत भूटान को अपने पक्ष में करना चाहता है, जो दो एशियाई दिग्गजों के बीच फंसा हुआ है। हालांकि, भूटान में बनी नई सरकार भारत समर्थक है और माना जा रहा है, कि भारत बहुत जल्द भूटान में हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट शुरू कर सकता है।
नेपाल
नेपाल के साथ भारत के संबंध एक नाजुक चुनौती पेश करते हैं। नेपाल में चीन की मजबूत राजनीतिक पकड़ बन चुकी है और काठमांडू की सरकार, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं, वो नई दिल्ली के खिलाफ बीजिंग कार्ड का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही है। नेपाल बार बार सीमा विवाद को भड़का रहा है और अपनी करेंसी पर नया नक्शा जारी कर चुका है। लिहाजा नई दिल्ली को नेपाली लोगों का विश्वास फिर से हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी, जो 2015 की आर्थिक नाकेबंदी के बाद झटका खा गए थे।
श्रीलंका
आर्थिक संकट में फंसे श्रीलंका को भारी मदद पहुंचाकर भारत ने जो बेहतरीन काम किया था और श्रीलंका के लोगों के बीच जो अपनी शानदार तस्वीर बनाई थी, वो इलेक्शन के वक्त कच्चातीवू विवाद ने खराब कर दिया है। श्रीलंका में इस साल के अंत में चुनाव होने हैं और भारत श्रीलंका में लगातार निवेश करना जारी रखेगा।
सेशेल्स और मॉरीशस
इन देशों में बंदरगाहों के बुनियादी ढांचे को एडवांस करने में मदद करने की भारत की योजना इसकी समुद्री कूटनीति और सुरक्षा प्रयास का हिस्सा है। मॉरीशस में अगलेगा द्वीप पर भारत को भारी सफलता हासिल हुई है, लेकिन सेशेल्स में असम्पशन द्वीप को विकसित करना भारत के लिए एक चुनौती बन गया है।

पश्चिमी देशों के साथ कैसे हो सकते हैं भारत के संबंध?
मोदी सरकार ने अपने दोनों कार्यकालों में यूरोप के साथ काफी मजबूत संबंध बनाए हैं और भारत ने पिछले 10 सालों में अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध भी विकसित किए हैं। हालांकि, पश्चिमी मीडिया मोदी सराकर को लेकर काफी आक्रामक रहा है और भारत की तरफ से उसका पलटवार भी किया गया है, लेकिन अब पश्चिम के जो हालात हैं, अब वो भारत से दूर जाने का रिस्क नहीं ले सकता है।
यूके की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है, फ्रांस लगातार भारत को हथियारों की बिक्री कर रहा है, जर्मनी अभी तक यूक्रेन युद्ध के झटकों से उबर नहीं पा रहा है, जिससे यूरोप और भारत के बीच के संबंधों में मजबूती ही आने की संभावना है।
अमेरिका के साथ भारतीय संबंधों को द्विदलीय समर्थन प्राप्त है और नवंबर के राष्ट्रपति चुनावों के नतीजों से इस पर कोई असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। हालांकि, खालिस्तान विवाद से दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव आए हैं, लेकिन नवंबर में डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता में वापसी की संभावना है, जिससे उम्मीद यही है, भारत और अमेरिका कुछ विवादों को भूलकर आगे बढ़ सकते हैं, क्योंकि सत्ता में आने से पहले ही डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह से चीन पर बरस रहे हैं, उन्हें भारत जैसे मजबूत सहयोगी की जरूरत होगी।
वहीं, कनाडा के साथ 2025 तक संबंधों में कड़वाहट कम होने की उम्मीद नहीं है। 2025 में अगर जस्टिन ट्रूडो की सत्ता से विदाई होती है, तो दोनों देशों के संबंध सुधर सकते हैं, अन्यथा टकराव जारी रहेगा।
पश्चिमी देश चाहेंगे कि मोदी 3.0 आलोचना और टिप्पणियों को लेकर थोड़ा कम संवेदनशील हो और उनके साथ भारत आसान शर्तों पर व्यापार करने के लिए तैयार हो। नई दिल्ली अपना हित देखने की कोशिश करेगा और चाहेगा, कि पश्चिमी पूंजी और टेक्नोलॉजी से फायदा उठाए। इटली में जी7 में प्रधानमंत्री की भागीदारी इस दिशा में कदम उठाने का संकेत दे रही है।
चीन की चुनौती
चीन के साथ सीमा पर गतिरोध अब पांचवें साल में पहुंच गये हैं और मोदी 3.0 के सामने चीन की चुनौती से जूझना और मुश्किल होने वाला है, क्योंकि चीन के रूकने की कोई संभावना नहीं है। भारत ने कहा है, कि जब तक सीमा पर स्थिति सामान्य नहीं हो जाती, तब तक सब कुछ ठीक नहीं हो सकता। नई दिल्ली स्थिति को सामान्य करना चाहता है, लेकिन संभावना कम है, कि सरहद के दोनों तक मौजूद 50 हजार से 60 हजार सैनिकों की वापसी हो पाए। जुलाई के पहले हफ्ते में कजाकिस्तान में एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान नरेन्द्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच मुलाकात होने वाली है और वहां से पता चलेगा, कि दोनों देशों के बीच के संबंध किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।
पश्चिम एशिया में भारत का दांव
मोदी सरकार 1.0 और 2.0 में सऊदी अरब से लेकर इजरायल, यूएई से लेकर ईरान, कतर से लेकर मिस्र तक भारत के संबंध काफी मजबूत हुए हैं। भारत ने मिडिल ईस्ट में सबसे बेहतरीन संबंध बनाए हैं और मिडिल ईस्ट में मौजूद 90 लाख से ज्यादा लोगों की आबादी भारत की एक मजबूत पूंजी हैं। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), I2U2, अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण पारगमन गलियारा (INSTC) सभी को गेम चेंजर माना जा रहा है। हालांकि गाजा युद्ध ने भारत को परेशान किया है, लेकिन माना जा रहा है, कि मोदी 3.0 में ये संबंध और मजबूत ही होंगे।
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