अमरीकी दूत निकी हेली भारत के दौरे पर, ऐजेंडा क्या?

निकी हेली
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संयुक्त राष्ट्र में अमरीकी दूत निकी हेली तीन दिवसीय भारत दौरे पर हैं.

निकी हेली अमरीकी प्रशासन में अब तक सर्वोच्च पद पर पहुंची भारतीय मूल की व्यक्ति हैं. निकी हेली अमरीकी सिख परिवार से हैं जो भारत के अंबाला से अमरीका पहुंचा था.

46 वर्षीय निकी हेली के भारत दौरे के एजेंडे के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं दी गई है लेकिन माना जा रहा है कि वो सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से वार्ता करेंगी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी उनकी मुलाक़ात हो सकती है.

अमरीका के विदेश मंत्रालय ने भी निकी हेली की भारत यात्रा के उद्देश्य और एजेंडे के बारे में अधिक जानकारी जारी नहीं की है.

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किन मुद्दों पर चर्चा संभव

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर मुक़्तर ख़ान कहते हैं, "निकी हेली संयुक्त राष्ट्र में अमरीका की राजदूत हैं. भारत उनके क्षेत्र में नहीं आता है. ऐसे में ये यात्रा शिष्टाचार यात्रा ही ज़्यादा मानी जा रही है."

लेकिन हाल के दिनों में भारत अमरीका के बीच आयात शुल्क, वीज़ा और प्रवासियों का मुद्दा गरम हैं.

प्रोफ़ेसर ख़ान कहते हैं, "ईरान के परमाणु समझौते का मुद्दा है जिसमें शायद भारत ईरान के साथ संबंध बरक़ार रखे, अमरीका के व्यापार कर का मामला भी भारत को प्रभावित करता है और अमरीका में एचबी1 वीज़ा के क़ानूनों में जो बदलाव हुए हैं वो भी भारतीयों को प्रभावित करते हैं. निकी हेली इन मुद्दों को सुलझाने की कोशिश कर सकती हैं."

अमरीका में प्रवासियों का मुद्दा इस समय गर्म है. एचबी1 वीज़ा के मुद्दे ने भारतीयों का ख़ासा प्रभावित किया है. नए नियमों के तहत भारत में इस वीज़ा के साथ रह रहे नौकरीपेशा लोगों के जीवनसाथी अब नौकरियां नहीं कर सकेंगे, पहले वो कर सकते थे.

भारतीय छात्रों के लिए भी अब अमरीका आना पहले जितने आसान नहीं है क्योंकि अमरीका में प्रवासी विरोधी भावना बढ़ रही है. माना जा रहा है कि निकी हेली इन मुद्दों पर भी वार्ता कर सकती हैं. हालांकि अभी ये तय नहीं है.

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क्या है एजेंडा?

हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमरीका इसराइल के अधिक क़रीब आया है. निकी हेली संयुक्त राष्ट्र में अमरीका की ओर से खुलकर पक्ष रखती हैं.

प्रोफ़ेसर ख़ान का मानना है कि निकी हेली का एजेंडा अमरीका, भारत और इसराइल के संबंधों को ओर मज़बूत करना भी हो सकता है.

प्रोफ़ेसर ख़ान कहते हैं, "अमरीका ने इन दिनों इसराइल पर खुला स्टैंड लिया है. अपने दूतावास को येरुशलम में स्थानांतरित कर दिया है. संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद से भी अमरीका इसराइल की वहां लगातार हो रही आलोचना के कारण ही बाहर हुआ है. बीते चार-पांच सालों में भारत और इसराइल के संबंध भी पहले से मज़बूत हुए हैं. अमरीका में भारत की लॉबी में मोदी और हिंदुत्व समर्थक है और पिछले कुछ सालों में इस लॉबी की वाशिंगट में पहुंच बढ़ी है. भारतीय लॉबी की ये पहुंच इसराइली लॉबी के ज़रिए ही बढ़ी है."

प्रोफ़ेसर ख़ान कहते हैं, "अमरीका में भारतीय लॉबी और इसराइली लॉबी के आपसी संबंध पहले से बेहतर हुए हैं और अमरीकी प्रशासन में भी उनकी पहुंच बढ़ी है. अमरीका में निकी हेली को रिपब्लिकन पार्टी के उभरते सितारे के तौर पर देखा जा रहा है. यदि अगले राष्ट्रपति चुनावों में डेमोक्रेट पार्टी किसी महिला को खड़ा करती है तो रिपब्लिकन निकी हेली को उम्मीदवार बना सकते हैं. ऐसे में उनके लिए इसराइली लॉबी और भारतीय लॉबी से संबंध बढ़ाना बेहद अहम है."

वो बताते हैं, "अमरीका में इसराइली लॉबी रिपब्लिकन पार्टी के चुनाव अभियान को आर्थिक मदद पहुंचाते हैं. हो सकता है निकी हेली का व्यक्तिगत एजेंडा इन लॉबियों में अपनी पकड़ मज़बूत करना भी हो सकता है."

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ईरान को लेकर तल्खी

लेकिन भारत और अमरीका के रिश्ते में ईरान को लेकर जटिलता भी आ रही है. अमरीका जहां ईरान परमाणु समझौते से बाहर हो गया है और ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं वहीं भारत अपनी ईंधन ज़रूरतों के लिए अभी भी ईरान की ओर ही देखता है.

ईरान पर अमरीकी प्रतिबंधों के बाद भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा था कि भारत संयुक्त राष्ट्र की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों को मानेंगे, किसी विशेष देश के प्रतिबंधों को नहीं.

यही नहीं बीते महीने भारत आए ईरानी विदेश मंत्री जावेद ज़रीफ़ से भी सुषमा स्वराज ने मुलाक़ात की थी. ज़रीफ़ ने ईरान के परमाणु समझौते को बचाने में भारत का सहयोग माना था.

https://twitter.com/MEAIndia/status/1001093318434942976

ऐसे में ईरान के मुद्दे पर भारत को मनाना निकी हेली के लिए बहुत आसान नहीं होगा.

प्रोफ़ेसर ख़ान कहते हैं, "ईरान को लेकर भारत अमरीका के साथ नहीं है. भारत के रिश्ते अरब देशों से भी बहुत ज़्यादा है क्योंकि बड़ी तादाद में भारतीय इन देशों में काम करते हैं और वहां से सालाना अरबों डॉलर भारत भेजते हैं. भारत विदेशी मुद्रा के लिए मध्य पूर्व के देशों पर आज भी निर्भर है. इसलिए भारत के लिए ये बहुत ज़रूरी है कि वो अमरीका और मध्य पूर्व के देशों से रिश्ते बेहतर बनाए रहे."

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