चीन पर न्यूक्लियर स्ट्राइक करने वाला था अमेरिका, रूस के डर से पीछे खींचा था पांव- टॉप सिक्रेट रिपोर्ट
अमेरिका के पूर्व सैन्य विश्लेषक, राजनीतित्रज्ञ और अर्थशास्त्री, डेनियल एल्सबर्ग ने 'पेंटागन पेपर्स' नाम से कुछ गोपनीय दस्तावेज ऑनलाइन सार्वजनिक किए हैं, जिसमें कई सनसनीखेज खुलासे किए गये हैं
वॉशिंगटन, बीजिंग, मई 23: ताइवान को बचाने के लिए अमेरिका एक वक्त चीन पर परमाणु बम बरसाने के बारे में सोच रहा था और अमेरिकी सरकार को चीन पर परमाणु हमला करने के लिए अमेरिकन प्लानर्स कह रहे थे। जी हां, ये बड़ा खुलासा किया है अमेरिकन न्यूज पेपर में। जिसके बाद विश्व की राजनीति काफी गर्माने की संभावना दिखाई दे रही है। अमेरिकन अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक गुप्त रिपोर्ट को सार्वजनिक किया है, जिसमें कहा गया है कि ताइवान को बचाने के लिए अमेरिका चीन पर परमाणु हमला करने की प्लानिंग कर रहा था। (तस्वीर- डेनियल एल्सबर्ग, पूर्व सैन्य विश्लेषक)

'चीन पर परमाणु हमला'
यूएस मिलिट्री प्लानर्स 1958 में ताइवान को बचाने के लिए चीन पर हमला करने की योजना बना रहे थे ताकि चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी के चंगुल से ताइवान को बचाया जा सके। अमेरिका के पूर्व सैन्य विश्लेषक, राजनीतित्रज्ञ और अर्थशास्त्री, डेनियल एल्सबर्ग ने 'पेंटागन पेपर्स' नाम से कुछ गोपनीय दस्तावेज ऑनलाइन सार्वजनिक किए हैं, जिसमें खुलासा किया गया है कि अमेरिका में चीन पर परमाणु हमला करने की प्लानिंग चल रही थी। इस गोपनीय दस्तावेज में कहा गया है कि अमेरिका को डर था कि अगर वो चीन पर परमाणु हमला करता है तो रूस अमेरिका के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिका पर भी न्यूक्लियर हमला कर सकता है और ताइवान को बचाने के चक्कर मे अमेरिका को काफी ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी।

ताइवान को बचाने की कोशिश
इस खुफिया दस्तावेज को अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने पब्लिश किया है, जिसमें कहा गया है कि अगर अमेरिका को रूस का डर नहीं रहता है तो वो 1958 में चीन पर परमाणु बम गिरा सकता था। लेकिन, रूस की डर की वजह से अमेरिका ने अपने कदम वापस खींच लिए। चीन के पूर्व सैन्य विश्लेषक एल्सबर्ग ने काफी ज्यादा गोपनीय दस्तावेज के एक हिस्से को ऑनलाइन सार्वजनिक किया है। इस टॉप क्लास गोपनीय दस्तावेज का एक छोटा हिस्सा 1975 में भी सार्वजनिक किया गया था। पूर्व सैन्य विश्लेषक डेनियल एल्सबर्ग अब 90 साल के हैं लेकिन एक वक्त यूएस मिलिट्री के अंदर उनकी काफी ज्यादा पहुंच थी औऱ 1971 में जब अमेरिकी सैनिक वियतनाम में युद्ध लड़ रहे थे, उस वक्त डेनियल एल्सबर्ग अमेरिकन मीडिया के सबसे बड़े एक्सपर्ट में से एक थे, जिनके पास कई गोपनीय जानकारियां होती थीं।

खुफिया दस्तावेज से खुलासा
डेनियल एल्सबर्ग ने 'टाइम्स' से कहा था कि 'ताइवान क्राइसिस को लेकर उनके पास 1970 की दशक के कई टॉप सिक्रेट दस्तावेज मौजूद हैं, जिसे उन्होंने कॉपी किया था और इस वक्त जब एक बार फिर से चीन और अमेरिका के बीच ताइवान को लेकर काफी ज्यादा तनाव बना हुआ है, उस वक्त वो उन डॉक्यूमेंट्स को रिलीज कर रहे हैं।' इस गोपनीय दस्तावेज के हवाले से उन्होंने लिखा है कि 'अगर ताइवान को हड़पने के लिए चीन उसपर आक्रमण करता है तो उस स्थिति में अमेरिका चीन पर परमाणु आक्रमण कर देगा। अमेरिका के तत्कालीन जनरल नाथन ट्विनिंग, चेयरमैन ऑफ द ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ ने साफ कर दिया था कि अगर ताइवान पर कब्जा करने की कोशिश चीन करता है तो चीन के एयरबेस पर अमेरिका न्यूक्लियर अटैक करेगा, ताकि चीन के एयर सिस्टम को ध्वस्त किया जाए।'

'परमाणु आक्रमण के अलावा विकल्प नहीं'
इस टॉप क्लास खुफिया दस्तावेज के मुताबिक 'अगर चीन ताइवान में घुसपैठ को नहीं रोकता है और अगर ताइवान पर कब्जा करने की कोशिश करता है तो फिर अमेरिका के पास चीन पर परमाणु हमला करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं रह जाएगा।' दस्तावेज के मुताबिक अमेरिका ने चीन के उत्तरी हिस्से शंघाई की तरफ परमाणु बम गिराने की प्लानिंग की थी। हालांकि, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डेविड आइज़नहावर किसी परमाणु लड़ाई के समर्थन में नहीं थे। उन्होंने पारंपरिक लड़ाई की तरफ ही ध्यान देने के लिए कहा था। हालांकि, स्थिति में 1958 में सुधार होना शुरू हो गया जब चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी की सेना ने ताइवान पर हमले करना बंद कर दिया और ताइवान में चांग काइ शेक की सत्ताबनी रही। आपको बता दें कि चांग काइ शेक चीन के ही रहने वाले थे और वो चीन में लोकतंत्र की स्थापना करना चाहते थे लेकिन कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता माउ जेदोंग ने चांग काइ शेक की पार्टी के हजारों कार्यकर्ताओं को मरवा दिया, जिसके बाद चांग काइ शेक चीन से भागकर ताइवान पहुंच गये और उन्होंने वहीं से चीन की सरकार का गठन किया था। जबकि चीन ताइवान को विद्रोहियों के छुपने का ठिकाना मानता है और पूरे ताइवान को चीन का हिस्सा मानता है और हर वक्त ताइवान को हड़पने की फिराक में लगा रहता है। वहीं, अमेरिका लगातार ताइवान को अपना संरक्षण देता रहा है। लेकिन अमेरिका की वजह से ही ताइवान यूनाइटेड नेशंस से बाहर हुआ था क्योंकि एक वक्त अमेरिका की सरकार ने चीन के साथ अच्छे संबंध बनाने के लिए ताइवान को चीन के हाथों में छोड़ दिया था।












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