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UNSC में भारत समेत 13 देशों ने तालिबान को नहीं माना आतंकी संगठन, शर्तों के साथ सरकार को मान्यता

यूनाइटेड नेशंस में शर्तों के साथ तालिबान की सरकार को मान्यता दे दी गई है। भारत समते 13 देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया है।

काबुल, सितंबर 01: अफगानिस्तान को लेकर भारत सरकार ने बहुत बड़ा फैसला लेते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसने तालिबान को अफगानिस्तान में शर्तों के साथ मान्यता दे दी गई है। संयुक्त राष्ट्र में तालिबान की जिम्मेदारी तय करते हुए भारत, फ्रांस, अमेरिका समेत 13 देशों ने अपना समर्थन दे दिया है। सबसे अहम बात ये है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लाए गये प्रस्ताव में पांच बार तालिबान का जिक्र किया गया, लेकिन एक बार भी तालिबान को आतंकी संगठन नहीं कहा गया।

फ्रांस का प्रस्ताव, भारत की मुहर

फ्रांस का प्रस्ताव, भारत की मुहर

आपको बता दें कि अगस्त महीने में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अध्यक्ष की कुर्सी भारत के पास थी और भारत के पक्ष में संयुक्त राष्ट्र के स्थायी और अस्थाई मिलाकर 15 सदस्यों में 13 सदस्यों ने अपना समर्थन दिया है। चीन और रूस की तरफ से इस प्रस्ताव का ना समर्थन किया गया और ना ही विरोध। तालिबान को लेकर लाए गये इस प्रस्ताव को फ्रांस ने स्पॉंसर किया था और अमेरिका, ब्रिटेन ने समर्थन किया था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वोटिंग के दौरान 13 सदस्यों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाला तो चीन और रूस ने वोटिंग में हिस्सा ही नहीं लिया। अगर चीन या रूस फ्रांस के इस प्रस्ताव के खिलाफ वीटो लगा देते तो तालिबान के खिलाफ लाया गया ये प्रस्ताव गिर सकता था, लेकिन चीन और रूस की तरफ से कुछ नहीं कहा गया।

तालिबान को लेकर प्रस्ताव में क्या?

तालिबान को लेकर प्रस्ताव में क्या?

तालिबान को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जो प्रस्ताव लाया गया था, उसमें इस बात को मान लिया गया है कि अफगानिस्तान में अब तालिबान की प्रमुख एक्टर है और इस प्रस्ताव में कहा गया है कि 15 अगस्त को काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद अब ये तालिबान की जिम्मेदारी है कि वो अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल किसी भी देश के खिलाफ नहीं होने दें। इसके साथ ही कहा गया है कि अफगानिस्तान में मौजूद हर आतंकी संगठन को रोकने की जिम्मेदारी तालिबान की है। साथ ही तालिबान किसी भी आतंकी संगठन को अफगानिस्तान में पनाह नहीं दे सकता है। संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पास करते हुए कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय तालिबान से उम्मीद कर रहा है कि वो अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करे, जो उससे दुनिया चाह रही है। इसके साथ ही प्रस्ताव में कहा गया है कि अफगानिस्तान से विदेशी नागरिकों के निकलने में भी तालिबान सहयोग करे।

तालिबान पर भारत का पक्ष

तालिबान पर भारत का पक्ष

भारत के विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल सत्र की अध्यक्षता की, जिसमें प्रस्ताव पारित किया गया था। यूएनएसी में बतौर अध्यक्ष भारत का समय मंगलवार तक ही था और अंतिम दिन तालिबान को लेकर बड़ा प्रस्ताव पास किया गया है। भारत के विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने कहा कि, ''यूएनएससी द्वारा पारित किया गया यह प्रस्ताव साफ तौर पर बताता है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किसी भी राष्ट्र को धमकाने या हमला करने, आतंकवादियों को शरण देने या प्रशिक्षित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए और इस प्रस्ताव का "भारत के लिए प्रत्यक्ष महत्व" है। उन्होंने कहा कि, यह प्रस्ताव उम्मीद करता है कि काबुल में एक्टिव संगठन अपने दायित्वों का निर्वहण करे।

नहीं की गई तालिबान की निंदा

नहीं की गई तालिबान की निंदा

यूएनएससी के प्रस्ताव में पांच बार तालिबान का नाम लिया गया, लेकिन तालिबान की एक बार भी निंदा नहीं की गई है। इसके बजाय प्रस्ताव में इस बात पर जोर दिया गया है कि तालिबान की ही अब अफगानिस्तान में विदेशी या अफगानिस्तान के लोगों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी है। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि अफगानिस्तान में सुरक्षित और व्यवस्थित व्यवस्था बनाने की जिम्मेजारी तालिबान की है और यूएनएसी ने तालिबान की उन प्रतिबद्धताओं को नोट किया है, जो उसने अंतर्राष्ट्रीय तौर पर जताई है। इस प्रस्ताव में, अफगानिस्तान में मानवीय पहुंच बनाए रखने, मानवाधिकारों को कायम रखने, एक समावेशी राजनीतिक समाधान तक पहुंचने और आतंकवाद का मुकाबला करने के महत्व पर भी जोर दिया गया।

बात नहीं मानी तो क्या होगा?

बात नहीं मानी तो क्या होगा?

इस प्रस्ताव में तालिबान की जिम्मेदारी तय करने की कोशिश तो की गई है, लेकिन सारी जिम्मेदारी तालिबान के विवेक पर छोड़ दिया गया है। इस प्रस्ताव में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि अगर तालिबान भविष्य में अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में अगर नाकाम रहता है, तो उसे क्या सजा मिलेगी? संयुक्त राष्ट्र में रूस के दूत वसीली नेबेंजिया ने कहा कि, तालिबान को लेकर जो प्रस्ताव लाया गया था, उसमें आतंकी खतरों को लेकर कोई खास बात नहीं की गई थी। इसके साथ ही प्रस्ताव में अफगानों को बाहर निकालने को लेकर भी 'ब्रेन ड्रेन' का जिक्र नहीं था। वहीं, इस बात का भी जिक्र नहीं था कि अफगानिस्तान में मानवीय सहायता पहुंचाने के लिए जो बजट चाहिए, वो कहां से आएगा, क्योंकि अमेरिका ने अफगानिस्तान बैंक के खाते को फ्रीज कर रखा है। ऐसे में तालिबान के पास आर्थिक बजट कहां से आएगा, इस बात का भी जिक्र नहीं है।

रूस-चीन ने नहीं लिया वोटिंग में हिस्सा

रूस-चीन ने नहीं लिया वोटिंग में हिस्सा

रूस ने यूनाइटेड नेशंस में वोटिंग के दौरान गैर-हाजिर रहने को लेकर कहा कि, जिस तरह का प्रस्ताव लाया गया था, उसने रूस को वोटिंग से दूर रहने के लिए मजबूर किया। रूस की तरफ से कहा गया कि जो प्रस्ताव लाया गया था, उसके मसौदे में प्रस्ताव बनाने वालों ने रूस की सैद्धांतिक चिंताओं को नजरअंदाज किया। चीन ने रूस की कुछ चिंताओं को भी साझा किया और ड्रोन हमले में मारे गये अफगानों को लेकर चीन की आलोचना भी की है। वहीं, चीन ने कहा कि मौजूदा वक्त में अफगानिस्तान में जो संकट मचा है, उसके लिए अमेरिका का अफगानिस्तान से सैनिकों को निकालने वाला फैसला जिम्मेदार है। वहीं, चीन के राजदूत न कहा कि ''जिस तरह से प्रस्ताव साया गया है, उसमें अफगानिस्तान में मूलभूत परिवर्तनों का जिक्र नहीं किया गया''। चीन ने कहा कि ''अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को एक साथ आकर तालिबान को सरकार चलाने को लेकर गाइड करना चाहिए''।

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