कीव जब महानगर था तब मॉस्को एक गांव हुआ करता था
कीव, 08 मार्च। यूक्रेन तेरह दिनों से युद्ध की विभिषिका झेल रहा है। रूसी आक्रमण में उसके कई शहर बर्बाद हो गये। हजारों सैनिक और नागरिक मारे गये। रूस यूक्रेन का वजूद मिटाने की कोशिश में है। लेकिन यूक्रेन का वजूद मिटाना रूस के लिए आसान न होगा। इसकी जड़ें इतिहास में गहरी समायी हुई हैं।

यूक्रेन की राजधानी कीव एक प्राचीन शहर है। इतिहासकार युवाल नोवा हरारी के मुताबिक कीव जब महानगर था तब मॉस्को एक गांव हुआ करता था। यूक्रेन पर आक्रामण करने का फैसला पुतिन के लिए आत्मघाती साबित होगा। वे जीत कर भी हार जाएंगे।

रूस क्या अफगानिस्तान की कड़वी यादें भूल गया ?
इतिहासकार युवाल नोवा हरारी का कहना है कि रूस शायद अफगानिस्तान की कड़वी यादों को भूल गया है। अफगानिस्तान एक छोटा देश है। वह भूमिबंद देश है। फिर भी रूस अफगानिस्तान को पूरी तरह से नहीं जीत पाया था। उसे अपमानजनक परिस्थितियों में अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा था। अगर पुतिन यूक्रेन को जीत भी लेंगे तो क्या वहां के नागरिक उनकी सत्ता को स्वीकार कर लेंगे ? कोई देश चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, वह राष्ट्रवादी नागरिकों पर अधिपत्य नहीं जमा सकता। अमेरिका ने वियतनाम पर आक्रमण किया तो क्या हासिल हुआ ? इराक और अफगानिस्तान में उसका क्या हस्र हुआ ? अरबों डालर झोंकने और सैकड़ों सैनिकों की कुर्बानी के बाद भी अमेरिका को वियतनाम और अफगानिस्तान से हटना पड़ा था।

क्या रूस के मामले में भारत नरम पड़ गया ?
भारत के पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा का कहना है कि यूक्रेन के मामले में रूस की नीयत को समझने में भूल हुई। भारत से भी और दुनिया से भी। सब यही सोच रहे थे कि ये लड़ाई एक दो दिन चलेगी। शक्तिशाली रूस के सामने यूक्रेन तुरंत घुटने टेक देगा। लड़ाई इतने दिनों तक चलेगी ये किसी ने नहीं सोचा था। रूस हमारा मित्र रहा है। सोवियत संघ के जमाने से। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में किसी देश की सम्प्रभुता सबसे अहम होती है। अगर कोई मित्र देश किसी अन्य देश को हड़पने के लिए आक्रमण करता है तो उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। चूंकि भारत रूस का मित्र है इसलिए मेरा मानना है कि इस युद्ध को खत्म कराने में उसकी बड़ी भूमिका हो सकती है। तो क्या भारत रूस के मामले में नरम पड़ गया ? युद्ध के ग्यारहवें- बारहवें दिन भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यूक्रेन का राष्ट्रपति जेलेंस्की और रूस के राष्ट्रपति पुतिन से बात की। लेकिन यह बातचीत मध्यस्थता से अधिक भारतीयों छात्रों की सुरक्षित वापसी पर केन्द्रित थी।

शहरों की गलियों में लड़ना आसान नहीं
क्या तेरह दिनों तक यूक्रेन का युद्ध में डटे रहना, रूस की मनौवैज्ञानिक हार है ? सामरिक जानकारों का कहना है कि इस युद्ध में रूस को उम्मीद के मुताबिक कामयाबी नहीं मिली है। भारत के पूर्व जनरल वी पी मलिका का कहना है कि कोई भी सेना शहर के अंदर लड़ाई नहीं करना चाहती। नागरिकों के बीच गलियों में लड़ाई आसान नहीं होती। सीमा पर लड़ना एक बात है और शहरों की गलियों में लड़ना अलग बात है। शहरों की लड़ाई में आम लोगों पर गोली चलाने से कूटनीतिक नुकसान होता है। छापामार युद्ध जल्द खत्म नहीं होता। लड़ाई लंबी चलती है। इस लड़ाई में ये बात सही साबित हो रही है। युद्ध के बारहवें दिन यूक्रेनी सेना ने छापामार युद्ध का एक वीडियो बनाया कर सार्वजनिक किया है। इस वीडियों में घात लगाये यूक्रेनी सैनिक अचानक रूसी सेना पर गोलियां बरसातो हुए दिख रहे हैं। हमला करना और छिप जाना, इस युद्ध की खास नीति होती है।

अर्थव्यवस्था पर असर शुरू
इस लड़ाई का असर अब रूस-यूक्रेन के साथ-साथ पूरी दुनिया पर दिखने लगा है। रूस की मुद्दा रूबल में तेजी से गिरावट जारी है। रूस की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी तो बैंको ने ब्याज दर 9.5 फीसदी से बढ़ा कर 20 फीसदी कर दिया। पश्चिमी देशों के प्रतिबंध से रूस की युद्धनीति पर तो कोई असर नहीं पड़ रहा। लेकिन उसकी माली हालत तेजी से खराब हो रही है। पश्चिमी देश रूस के तेल आयात पर भी रोक लगा रहे हैं। इसकी वजह से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बहुत तेजी से बढ़ रही है। यह तेजी 14 साल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गयी है। तेल की बढ़ती कीमतें, किसी देश की इकोनॉमी के ध्वस्त करने के लिए काफी हैं। भारत समेत दुनिया के विकासशील देशों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ेगा।
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