खारकीव तबाह, बर्बाद होगा कीव! NATO ने छोड़ा, अमेरिका ने झटके हाथ! पुतिन कब खत्म करेंगे जंग?
यूक्रेन में रूसी आक्रमण के 10 दिन पूरे हो चुके हैं और रूसी सेना, लगातार यूक्रेनी सैन्य ठिकानों को बर्बाद करती हुई आगे बढ़ रही है।
वॉशिंगटन/कीव/मॉस्को, मार्च 05: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन में मौजूद तमाम सैन्य ठिकानों को ध्वस्त करने और हथियारों को खत्म करने का इरादा लेकर आक्रमण कर दिया और रूस बड़े आराम से यूक्रेन को ध्वस्त करता जा रहा है। यूक्रेन के कई शहर मलबों के ढेर में बदल गये हैं, लेकिन, जिन देशों की बदौलत यूक्रेनी राष्ट्रपति मैदान में ताल ठोक रहे थे, वो प्रतिबंधों की बात कर पीछे हट चुके हैं, ऐसे में सवाल ये उठता है, कि आखिर ये लड़ाई कब जाकर खत्म होगी और जब अमेरिका यूक्रेन को बचा नहीं पा रहा है, को फिर वो यूक्रेनी राष्ट्रपति से सच्चाई बयां क्यों नहीं करता है।

दसवें दिन भी भीषण युद्ध जारी
यूक्रेन में रूसी आक्रमण के 10 दिन पूरे हो चुके हैं और रूसी सेना, लगातार यूक्रेनी सैन्य ठिकानों को बर्बाद करती हुई आगे बढ़ रही है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पहले ही "यूक्रेन के तटस्थकरण और निरस्त्रीकरण" के अपने लक्ष्य की घोषणा कर चुके हैं, लेकिन यूक्रेनी सेना की प्रतिरोध की वजह से पुतिन को अपने मिशन को अंजाम देने में थोड़ा वक्त लग रहा है। शुक्रवार को, जर्मन चांसलर ओलाफ स्कोल्ज़ करीब एक घंटे से ज्यादा वक्त तक रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से सैन्य कार्रवाई को रोकने और बातचीत शुरू करने का आग्रह किया। तो फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन और भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी व्लादिमीर पुतिन से बात की। लेकिन, पुतिन अपने इरादे से जरा भी पीछे नहीं हटे हैं। लिहाजा अब ये लड़ाई कब खत्म होगी, कुछ कहा नहीं जा सकता है।

पुतिन करेंगे जेलेंस्की से बात?
यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने व्लादिमीर पुतिन के साथ सीधी बातचीत के लिए तैयार होने का संकेत दिया। लेकिन ऐसा होना संभव नहीं लग रहा है। अतीत में, पुतिन ने यूक्रेनी नेतृत्व पर कटाक्ष किया है और केवल अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ ही सीधी बातचीत के लिए तैयार हुए हैं। कीव में जर्मन फ्रेडरिक एबर्ट फाउंडेशन के ऑफिस के प्रमुख मार्सेल रोथिग ने डीडब्ल्यू न्यूज को बताया कि, "मुझे गहरा विश्वास है कि जल्द या बाद में हम यूक्रेन और रूस के बीच एक समझौते पर पहुंचेंगे, शायद रूस और पश्चिमी देशों के बीच भी।" जर्मनी से बोलते हुए उन्होंने कहा कि, "हर युद्ध समाप्त हो जाता है, और आमतौर पर बातचीत के बाद एक समझौते के साथ समाप्त हो जाता है।" लेकिन, सवाल ये है कि, आखिर पुतिन और जेलेंस्की को बातचीत के टेबल पर कौन ला सकता है? हालांकि, कई देश मध्यस्थता को तैयार हैं, लेकिन उम्मीद कम है।

क्या चीन करवाएगा शांति?
कीव में जर्मन फ्रेडरिक एबर्ट फाउंडेशन के ऑफिस के प्रमुख मार्सेल रोथिग का मानना है कि, चीन एक मध्यस्थ के रूप में उभर सकता है, क्योंकि बीजिंग पुतिन पर कुछ प्रभाव डाल सकता है। उन्होंने कहा कि, "चीन को अस्थिर यूरोप और अस्थिर बाजारों में कोई दिलचस्पी नहीं है। और वे रूस के लिए अंतिम शेष बड़े आर्थिक भागीदार हैं, इसलिए पुतिन को चीनी समर्थन की सख्त जरूरत है।" लेकिन अभी तक पुतिन की शीर्ष स्तरीय वार्ता में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं दिख रही है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (ईसीएफआर) के बर्लिन कार्यालय के एक वरिष्ठ नीति साथी गुस्ताव ग्रेसल ने डीडब्ल्यू न्यूज से कहा कि, "मुझे डर है कि उन्होंने अभी तक अपने युद्ध के उद्देश्य को बदलने की अनुमति देने के लिए पर्याप्त हताहतों की संख्या नहीं देखी है।"

क्या रूसी सेना को हराना मुमकिन है?
लेकिन, रूसी सैनिकों को अभी भी यूक्रेन में बढ़त बनाने में मुश्किल हो रही है और ऐसे में ग्रेसेल ने डीडब्ल्यू को बताया कि, पुतिन पर दबाव बढ़ सकता है। अगर यूक्रेनी सैनिक "एक और सप्ताह के लिए रूक जाते हैं और प्रतिरोध करते हैं, तो फिर हम देखेंगे कि, पुतिन के सामने बातचीत को लेकर जितने विचार रखे गये हैं, वो कैसे नहीं किसी एक विकल्प को चुनते हैं''। लेकिन क्या यह पूरी तरह से अकल्पनीय है कि रूसियों को पीछे हटना पड़ेगा? ग्रेसेल ने कहा कि, "यूक्रेनियों को कभी कम मत समझो"। उन्होंने कहा कि, "उन्होंने (यूक्रेन) 2014 से बहुत कुछ सीखा है। यह एक युद्ध-सिद्ध सेना है और वे अपने देश के अस्तित्व के लिए लड़ने के लिए बहुत दृढ़ हैं।" उन्होंने कहा कि, यदि यूक्रेनी सेना आक्रमणकारियों को भारी नुकसान पहुंचाना जारी रखती है, तो पुतिन को पीछे हटने के लिए मजबूर किया जा सकता है। ग्रेसेल ने कहा कि, "हमें स्टालिन को याद रखना चाहिए और वह ऐसे व्यक्ति नहीं थे जो मानव जीवन के लिए उच्च सम्मान रखते थे, और उन्होंने 40 दिनों के बाद फिनलैंड को छोड़ दिया। इसे सोवियत संघ के लिए बहुत अधिक नुकसान माना गया था, क्योंकि एक महान शक्ति फिनलैंड को नहीं जीतने की वजह से शर्मंदा हो गई थी।"

रूस का होगा आर्थिक पतन?
अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस को प्रतिबंधों में जिस तरह से फंसाया है, उसके बाद संभावित आर्थिक पतन पुतिन को अपने लक्ष्यों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करने वाला एक अन्य कारक बन सकता है। यदि वह राष्ट्र के अभिजात वर्ग के हिस्से का समर्थन खो देते हैं, या दमनकारी उपायों के बावजूद युद्ध-विरोधी आंदोलन को शांत नहीं कर पाते हैं, तो वह अपने सैनिकों को वापस लेने के लिए भी मजबूर हो सकते हैं। दूसरी तरफ, यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने फिर से पश्चिम से अपील की कि वह अपने देश पर नो-फ्लाई ज़ोन लागू करे। फिर भी नाटो के सदस्यों ने जेलेंस्की की बातों को मानने से बार बार इनकार किया और यूक्रेन से साफ कहा... कि वो तभी ऐसा करेंगे, जब नाटो के किसी सदस्य के खिलाफ हमला होता है।

नाटो से टूटा जेलेंस्की का दिल!
वहीं, नाटो ने ना ही यूक्रेन की सैन्य मदद की है और ना ही नाटो ने 'नो फ्लाई जोन' घोषित किया है। उन्होंने कहा कि, "हर कोई जानता है कि, अगर नाटो युद्ध में शामिल होता है, तो फिर ये युद्ध हमें कहा लेकर जाएगा। यदि, नाटो सेना रूसी सेना के साथ सीधे युद्ध गतिविधियों में शामिल हो जाएगी, तो फिर यह हमें उस रास्ते पर ले जाएगा, जो विश्वयुद्ध का मार्ग है और ऐसे में टकराव की स्थिति में परमाणु प्रलय का दिन भी सामने आ सकता है।'' ऐसे में ये जंग कबतक चलेगी, कहना मुश्किल है और इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है, कि दुनिया विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ी नहीं है।












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