‘अपने गिरहेबां में झांककर देखे यूरोप’... नई दिल्ली में भारत और ब्रिटेन की विदेश मंत्री में जमकर ‘बहसबाजी’
भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ एक कार्यक्रम में बैठक के दौरान ब्रिटेन की विदेश मंत्री बार-बार रूसी आक्रामकता के बारे में बात कर रही थीं, जिसपर भारतीय विदेश मंत्री की तरफ से तीखी प्रतिक्रिया दी गई है।
नई दिल्ली, अप्रैल 01: यूक्रेन संकट को लेकर भारत और ब्रिटेन के बीच मतभेद सार्वजनिक हो गये हैं और भारत दौरे पर आई ब्रिटेन की विदेश मंत्री और भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बीच एक कार्यक्रम के दौरान रूस से तेल खरीदने को लेकर बहसबाजी हो गई है।

भिड़ गये भारत- ब्रिटेन के विदेश मंत्री
भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर और उनके समकक्ष ब्रिटिश विदेश मंत्री लिज़ ट्रस के बीच गुरुवार को एक बहसबाजी हो गई, जिसके बाद रूस पर प्रतिबंधों के मुद्दे पर नई दिल्ली और लंदन के बीच मतभेदों को उजागर किया। ब्रिटिश विदेश मंत्री लिज ट्रस की बात सुनकर भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने साफ साफ कहा कि, प्रतिबंधों की बात "एक अभियान की तरह लगती है" और यह यूरोप था, जो युद्ध से पहले रूस से काफी तेल खरीद रहा था। दरअसल, ब्रिटिश विदेश मंत्री लिज ट्रस इन दिनों भारत के दौरे पर हैं और माना जा रहा है, कि वो रूस की आलोचना करने के लिए भारत पर दवाब बनाने के लिए नई दिल्ली आई हैं, लेकिन भारत ने भी ब्रिटेन के सामने साफ कर दिया है, कि पहले वो अपनी गिरहेबां में झांककर देखे, कि रूस के साथ ब्रिटेन के व्यापारिक रिश्ते क्या हैं और फिर भारत के सामने 'चौधरी' बनने की कोशिश करे।

भारत पर दवाब बनाने की कोशिश
दरअसल, भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ एक कार्यक्रम में बैठक के दौरान ब्रिटेन की विदेश मंत्री बार-बार रूसी आक्रामकता के बारे में बात कर रही थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, जयशंकर ने भारतीय विश्व मामलों और नीति विनिमय परिषद द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित पहले भारत-यूके सामरिक फ्यूचर्स फोरम में 45 मिनट की पैनल चर्चा के दौरान, अपने बयानों में एक बार भी रूस का नाम नहीं लिया, जबकि ब्रिटिश विदेश मंत्री बार बार रूस का जिक्र कर रहीं थी। इस कार्यक्रम के बाद भारत और ब्रिटेन के विदेश मंत्रियों के बीच द्विपक्षीय बैठक हुई।
ब्रिटिश विदेश मंत्री ने क्या कहा?
भारत द्वारा रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदने के सवाल के जवाब में ब्रिटेन की विदेश मंत्री लिज ट्रस ने कहा कि, "मैंने रूस के खिलाफ प्रतिबंधों को लेकर ब्रिटिश दृष्टिकोण को रेखांकित किया है कि हम इस साल के अंत तक रूसी तेल पर अपनी निर्भरता समाप्त कर रहे हैं... भारत एक संप्रभु राष्ट्र है। मैं भारत को यह नहीं बताने जा रही हूं, कि क्या करना है। मैंने जो कहा है वह यूके सरकार के एक सदस्य के रूप में है, जिसने बुडापेस्ट ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।' उन्होंने आगे कहा कि, 'मैं यूनाइटेड किंगडम की ओर से यूक्रेन के लोगों का समर्थन करने के लिए सभी कार्रवाई करने के लिए एक मजबूत जिम्मेदारी महसूस करती हूं, लेकिन ऐसा नहीं है दूसरे देशों को यह बताएं कि, क्या करना है"।
भारतीय विदेश मंत्री ने क्या कहा?
ब्रिटिश विदेश मंत्री के इस जवाब पर प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि, 'मार्च में यूरोप ने रूस से एक महीने पहले की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक तेल और गैस खरीदा है।' भारतीय विदेश मंत्री ने आगे कहा कि, "यदि आप रूस से तेल और गैस के प्रमुख खरीदारों को देखते हैं, तो मुझे लगता है कि आप पाएंगे कि उनमें से ज्यादातर यूरोपीय देश हैं। हम स्वयं मध्य पूर्व से अपनी ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा प्राप्त करते हैं, हमारे तेल का लगभग 7.5-8 प्रतिशत अतीत में अमेरिका से आता था, जो शायद रूस के मुकाबले काफी कम था।

‘भारतीय खरीदारी आर्थिक अनिवार्यता’
भारतीय विदेश मंत्री ने ब्रिटिश विदेश मंत्री को आईना दिखाते हुए कहा कि, भारत की खरीदारी आर्थिक अनिवार्यता पर आधारित है। जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो मुझे लगता है कि हर देश के लिए बाजार में जाना और उनके लिए अच्छे सौदों की तलाश करना स्वाभाविक है। लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि, अगर हम दो या तीन महीने प्रतीक्षा करें और वास्तव में देखें कि रूसी गैस और तेल के बड़े खरीदार कौन हैं, तो मुझे संदेह है कि ये सूची पहले की तुलना में बहुत अलग नहीं होगी।' भारतीय विदेश मंत्री ने आगे कहा कि, 'मुझे नहीं लगता है, कि हम उस सूची के शीर्ष 10 में भी शामिल होंगे'।

चीन पर ब्रिटिश विदेश मंत्री का यू-टर्न
वहीं, रूसी आक्रामकता को देखकर चीन कैसे व्यवहार करेगा, इस पर ब्रिटिश विदेश मंत्री ने कहा कि, "मैंने अपने चीनी समकक्ष वांग यी से बात की है। चीन स्पष्ट है कि वह यूक्रेन की संप्रभुता का सम्मान करता है, और यह एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि पी -5 के सदस्य और एक जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में, चीन को उस पर टिके रहने की आवश्यकता है। और इसलिए हमें चीन को यूक्रेन में रूस के कार्यों का समर्थन करते नहीं देखना चाहिए।" वहीं, एक नैतिक स्थिति लेने की अनिवार्यता पर भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पिछले साल अफगानिस्तान की स्थिति के साथ समानताएं खींची और कहा ,कि जिस तरह से पिछले साल अफगानिस्तान की घटना के बाद यूरोप प्रभावित नहीं हुआ था, उसी तरह इस बार यूक्रेन की घटना के बाद भारत प्रभावित नहीं हुआ है।'

‘अफगानिस्तान घटना का भारत पर प्रभाव’
कार्यक्रम में बोलते हुए भारतीय विदेश मंत्री ने कहा कि, "मैं कहूंगा कि इसमें से कुछ देशों की निकटता पर भी निर्भर करता है। इसमें से कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि, जो कुछ हो रहा है उससे कोई विशेष देश या समाज कितनी मजबूती से संबंधित है। और फिर से, मैं जिस उदाहरण का उपयोग करूंगा वह अफगानिस्तान है... मुझे लगता है कि पिछली गर्मियों में हमने अफगानिस्तान में जो कुछ भी देखा था, उसका यहां (भारत में) बहुत, बहुत मजबूत प्रभाव पड़ा। मैं शायद कहूंगा कि, इसका (अफगानिस्तान घटना का) यूरोप में उतना प्रभाव नहीं था। मुझे लगता है कि, जरूरी नहीं कि लोग तालिबान के आने से उसी तरह संबंधित हों। उन्होंने उन लोगों के साथ पहचान नहीं की, जो एक ही तरह से प्रभावित हैं। तो आप जानते हैं, सच्चाई यह है कि, हम में से कई लोगों के समान या साझा विश्वास, मूल्य हैं, और हर घटना पर प्रतिक्रिया एक समान नहीं हो सकती है'।












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